Search This Blog
Monday, 21 September 2020
तो आखिर रुक ही गई नीलामी !
- करोड़ों की व्यवसायिक जमीन को आवासीय भूखंडों के रूप में बेचने का गड़बड़झाला
Friday, 18 September 2020
'भाण्डे कली करालो, भाण्डे...'
पगडंडियों के दिन (12)
हमारी विरासत
'दुनिया पीतल दी...' गीत पर भले ही सारा जमाना थिरक लिया हो लेकिन बेबी डॉल को शायद पता ही नहीं, कि एक जमाना था जब इसी 'पीतल' को अपनी कला से चमकाने वाले हुनरमंद लोग भी दुनिया में हुआ करते थे. वो पगडंडियों का जमाना था. इंसान के पैर जमीन पर टिके थे. हवा में उड़ने की फितरत तो हमने इस दौर में ही सीखी है. लेकिन वक्त कब किसी का हुआ है साहब ! जैसे आज बेबी डॉल का नशा उतरा हुआ मालूम पड़ता है ठीक वैसे ही मतलबी जमाने ने पीतल चमकाने वाले कारीगरों को भी जमींदोज़ कर दिया है. तभी तो आज दूर-दूर तक कोई आवाज सुनाई नहीं देती-
'भाण्डडडे कली करा लो भाण्डडडे.., परातां दे पौड़ लवा लो, कली करा लो कली.....!'

मगर उन दिनों बर्तन कली करने वाले कारीगरों की बड़ी पूछ हुआ करती थी जब अधिकांश मध्यमवर्गीय घरों में पीतल या कांसे के बर्तन थे. स्टील के बर्तन आने से पहले टोकणी, लोटा, देगची, कड़ाही, पतीले, कोली, बाटी, गिलास, थालियां, यहां तक कि चमचे भी पीतल के हुआ करते थे. ऐसे बर्तनों को मांजने के बाद इनकी चमक देखने लायक होती थी. दिक्कत सिर्फ एक ही थी कि इन बर्तनों में धात्विक प्रतिक्रिया के कारण मसालेदार और खट्टी चीज़ें ज्यादा समय तक नहीं टिक पाती थी. इस समस्या का समाधान सिर्फ कली वालों के पास था. वे इन बर्तनों की अंदरूनी सतह पर कली और रांगे का एक पतला लेप लगा देते थे जो धात्विक प्रतिक्रिया को रोकता था. चांदी सी चमकदार कली का लेप लगाने के बाद बर्तन अंदर से चमचमा उठते थे.
बर्तन कली करने वाले कारीगरों की अनूठी शान
गली के नुक्कड़ पर लगे शहतूत तले जब कली करने वाला भाई अपनी साइकिल खड़ी कर कैरियर पर बंधी अंगीठी और कोयले की बोरी उतारता तो मोहल्ले के घरों के दरवाजे उसकी आवाज सुन धीरे-धीरे खुलने लगते. वह बड़े दिलकश अंदाज में मुनादी करता-
'नवें बणाके हत्थ फड़ा दयां
भाण्डे दयो पुराणे
मोयां दे विच जान पा दयां
करां सजाखे काणे
'भाण्डडडे कली करा लो भाण्डडडे.....!'
लकड़ी के कोयलों को छोटी सी गोल अंगीठी में सुलगा कर वह मशीनी पंखे से उसे हवा देता तो भट्टी में अंगारे दहकने लगते. मदारी की भांति उसके झोले से संडासी, हथोड़ा, प्लास, नौसादर की डिबिया, रांगा, कली के तार.... और भी न जाने क्या क्या, बाहर निकलने लगते. मैली सी चादर और ढेरों सुराख वाली फटी कमीज पहने कलीवाला भाई होंठों में बीड़ी दबाकर उकडूं बैठ जाता और अपना काम शुरू कर देता. बीच-बीच में मोहल्ले की औरतों से मोल भाव भी चलता रहता.
'दो भाण्डे, इक रपय्या'
ठीक है. पर भाई, इसके ज्यादा बता रहे हो !'
'बिब्बी, देग दा मूं वेख ! पूरा इक रपय्या लग्गू. मरजी है तुहाडी.'
'कळी चोखी करी रे भाई. लारली बिरियां तेरो ई कोई भाई आयो हो, जमां रांगो थेथड़ ग्यो. दो मईना ई को चाली नीं !'
बिब्बी, कम दी गरंटी होऊ, मेरे कोळे बोतया टपटपाई है नीं. साफ कम करीदा है, रोटी हक दी खाइदी है...'

अपने काम में मस्त कली वाला ऐसी बातों पर कान धरता ही नहीं था. वह बर्तन को संडासी से पकड़ भट्टी पर गर्म करता और उसमें कली की तार का एक सिरा रगड़ता जो पिघलकर चमकदार गोल बूंद में बदल जाती. इसके बाद वह नौसादर पाउडर डालता तो गर्म बर्तन से तेज धुआं उठता. कली वाला भाई बड़ी फुर्ती से एक पुराने कपड़े को संडासी से पकड़ उस बर्तन में पड़ी कली को चारों ओर फैला देता. कली के चमकदार लेप से बर्तन की अंदरूनी सतह चमक जाती और गर्म बर्तन छन्न से पानी में.....लो हो गई कली !
इन कली करने वालों की अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पंजाबी लोक संगीत में 'रंगीले जट्ट' द्वारा गाया गया गीत 'भांडे कली करा लो...' कभी गलियों में ठीक वैसे ही गूंजा करता था जैसे बेबी डॉल ने दुनिया को पीतल की बताकर धूम मचा दी थी.
अब न पीतल के बर्तन हैं न कली करने वाले लोग. हमने झूठी चमकदार शान का लबादा ओढ़कर पीतल के बर्तनों को या तो कबाड़ में बेच दिया है या फिर किसी बोरी में बंद कर कहीं लटाण पर पटक रखा है. कभी घर की शान कहे जाने वाले पीतल के बर्तनों में आज हम मेहमानवाजी करने की सोच भी नहीं सकते. और कली वाले, वे जाने कहां गुम हुए, जमाने को खबर ही नहीं. छोटे कारीगरों को दर्ज करने के लिए इतिहास के पास पन्ने कहां होते हैं !
सच पूछिए तो हमें फुर्सत ही नहीं है अपने विरसे को संभालने की. विकास की अंधी दौड़ में अहसानफरामोश होकर हम खुद को ही नहीं संभाल पा रहे हैं तो औरों की बिसात ही क्या !
-रूंख
Thursday, 3 September 2020
विधायकों और सांसदों को खुला पत्र
आदरणीय विधायकों और सांसदों, सादर अभिवादन. आज आप सबको चौक चौराहे पर साधारणजन की ओर से संबोधित करने का विशेष प्रयोजन है.
उस दिन को याद कीजिए जब आपने पहली बार अपने भीतर नेतृत्व क्षमता का गुण खोजा था और राजनीति में उतरने का फैसला किया था. हो सकता है कुछ लोगों को यह सब विरासत में मिला हो लेकिन फिर भी आप सब ने उस वक्त समाजसेवा के साथ खुद को जननेता के रूप में स्थापित करने के सपने तो अवश्य देखे होंगे. उन सपनों को पूरा करने के लिए आपने जीवन यात्रा में कड़ी मेहनत के साथ जबरदस्त संघर्ष भी किया होगा. बहुतों का तो आंदोलनों, भूख हड़ताल, पुलिस की मार और जेल की यातनाओं से भी सामना हुआ होगा. षड्यंत्रों भरी राजनीति में आप कदम-कदम पर जाने कितने छल-छंदों और कुटिल समझौतों से जूझे होंगे. संक्षेप में कहूं तो कुम्हार की निहाई में तप कर जैसे मिट्टी का एक कच्चा घड़ा शीतल जल देने वाले पात्र में बदल जाता है, यकीनन वैसा ही कुछ आपके जीवन में भी घटित हुआ है. इन्हीं अच्छे बुरे अनुभवों के चलते कई लोगों को तो केंद्र और राज्यों के विभिन्न मंत्रालयों को संभालने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ है.
लेकिन क्या मंत्री, सांसद और विधायक बनना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है ! भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में, जहां महज 20% वोट पाने वाला प्रत्याशी जनप्रतिनिधि बन जाता हो, जहां चार हजार से अधिक विधायकों और लगभग आठ सौ सांसदों की भीड़ हो, उनमें आपका कद कैसा है, यह बड़ा सवाल है. आप संघर्ष के शुरुआती दिनों को याद कीजिए. आप तो लोकप्रिय और सर्व सम्मत नेता बनना चाहते थे. परंतु सच कहना, क्या आप बन पाए ! हकीकत तो यह है कि आप में से अधिकांश लोग नेतागिरी की वीआईपी जमात में भटक कर रह गए हैं. बड़ी सी गाड़ी और गनमैन के चक्कर में आपकी नेतृत्व क्षमता सुप्त हो गई और आज घड़ी ज्यादातर जनप्रतिनिधि पिछलग्गू व्यापारी की भूमिका में आ गए हैं. सच तो ये है कि 'आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास' की तर्ज पर आप सत्ता के सुख में अपने सपनों को ही भूल बैठे हैं.
राजनीतिक गलियारों में अक्सर कहा जाता है कि देश में जेपी के बाद कोई जननायक नहीं बन पाया. दरअसल, इतिहास के पन्ने बहुत कीमती होते हैं उनमें जननेता के रूप में दर्ज होने के लिए आपको लीक से हटकर चलना पड़ता है. लेकिन विडंबना यह है कि जेपी से अगली पीढ़ी के अधिकांश नेताओं में नैतिक पतन का एक नया दौर शुरू हुआ जो आज तक बदस्तूर जारी है. प्रजातांत्रिक राजनीति में भ्रष्ट आचरण और आपराधिक लिप्तता सदैव आत्मघाती होती है, यह जानते हुए भी हमारे बहुत से माननीय इस दलदल में आकंठ डूब गए हैं. साम, दाम, दंड, भेद की राजनीति से वे भले ही चुनाव जीत जाते हों, लेकिन लोकप्रिय नेता होने का दम नहीं भर सकते. नि:स्वार्थ भाव से जनता के साथ खड़े होने वाले नेताओं को ही इतिहास तरज़ीह देता है वरना आजादी के बाद कितने ही जनप्रतिनिधि आए और क्षणिक चमक दिखाकर लुप्त हो गए. उनमें से कितने लोग जनता के दिलों में जगह बना पाए, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है.
मुद्दे की बात यह है कि कई बार कुदरत ऐसी विषम परिस्थितियां पैदा कर देती है जब नेतृत्व कर रहे मनुष्यों के समक्ष खुद को साबित करने की चुनौती उठ खड़ी होती है. सही मायने में ऐसी चुनौतियां सूझवान के समक्ष अवसर और कायर के लिए आफत होती हैं. संकट की ऐसी विकट घड़ी में राजनीति की बिसात पर कमजोर मोहरे स्वार्थ लिप्सा में फंस कर दम तोड़ देते हैं जबकि कुछ लोग अपने सर्वस्व योगदान से मानव जाति को आपदा से निकाल ही लाते हैं. इतिहास ऐसे मनुष्यों को ही अपने सुनहरे पन्नों पर दर्ज करता है.
कोविड के संक्रमणकाल में ऐसी ही परिस्थितियां दुनियाभर में उत्पन्न हुई हैं.
हमारे देश में भी आशंका और निराशा का भाव गहराता जा रहा है. लाखों लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है जिसके चलते रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है. एक बड़े वर्ग के काम धंधे चौपट होने के कारण हमारी अर्थव्यवस्था भी डगमगा गई है और खतरे के संकेत दे रही है.
ये सब आप से छिपा हुआ नहीं है. तो फिर उठिए और अपनी कमर कस लीजिए. आप में से अपवाद स्वरूप शायद ही कोई विधायक या सांसद होंगे जो अपने परिवार में करोड़ों की सम्पत्ति के मालिक न हो. संकट की इस घड़ी में संवेदनाओं को महसूस करते हुए आप इस सम्पदा का थोड़ा सा हिस्सा भी जनकल्याण में लगा सकें तो आप इतिहास पुरुष साबित होंगे. यदि इसमें कोई गुरेज हो तो इतना सहयोग अवश्य कीजिए कि अपनी जनसेवाओं के बदले सरकार से मिलने वाले समस्त वेतन और भत्तों का न्यूनतम दो वर्षों के लिए परित्याग कर दीजिए. यह ठीक वैसा ही है जिस ढंग से देश के आम आदमी ने सब्सिडी को छोड़ने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं. सरकारी सुविधाओं और अपनी सुरक्षा का तामझाम निजी खर्चे पर व्यवस्थित कर अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत कीजिए.
आपको बताना चाहता हूं कि आपका यह सामूहिक परित्याग देश की अर्थव्यवस्था में कितना बड़ा योगदान दे सकता है :-
( स्रोत- आरटीआई, सरकारी दस्तावेज)
545 लोकसभा सदस्य @ 71.00 लाख
250 राज्यसभा सदस्य @ 44.00 लाख
4120 विधायक @ औसत 25.00 लाख
प्रति वर्ष के हिसाब से यह राशि 1524.75 करोड़ रूपये बनती है. सुरक्षा व्यवस्था पर खर्च होने वाली राशि इससे अलग है. यदि इसे भी औसतन जोड़ लिया जाए तो सोचिए 2 सालों में आप देश की अर्थव्यवस्था में 5000 करोड़ से अधिक का योगदान दे सकते हैं. आज देश का हर नागरिक अपने खर्चों में कटौती करने की कोशिश कर रहा है. आगे आकर अपने सहयोग की घोषणा कर उसका हौसला बढ़ाइए. आपको याद होगा कि जनसेवा का मार्ग आपने स्वेच्छा से चुना था. उसके लिए वेतन और भत्ते पाने जैसी कोई शर्त नहीं थी.
इस देश को बचाने के लिए साधारणजन की इतनी सी गुजारिश स्वीकार कर लीजिए. लोकतंत्र पर बोझ बनने की बजाय उसे संवारने का काम कीजिए. यदि देश बचेगा तो राजनीति बचेगी. याद रखिए कि प्राकृतिक आपदाएं पार्टी, धर्म और जात नहीं देखती. कुदरत का कहर अमीरी और गरीबी में फर्क नहीं करता. हां, मनुष्य अगर चाहे तो अपनी सूझबूझ से बहुत बड़ा फर्क ला सकता है.
अपने शुरुआती सपने को याद करते हुए जननेता बनने की तरफ कदम बढ़ाइए. इतिहास आपकी प्रतीक्षा कर रहा है....
सादर
डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'
94140-90492
kapurisar@gmail.com
94140-90492
Tuesday, 25 August 2020
करोड़ों की वाणिज्यिक जमीन को आवासीय के रूप में बेचने की तैयारी
- दिन दहाड़े जनता की आंख में धूल झोंकने की साजिश.
- लंबी तान कर सोए हैं विपक्षी पार्षद.
...............................................
सूरतगढ़ नगर पालिका की बेवकूफी कहें या जरूरत से ज्यादा होशियारी, उसके प्रशासक अक्सर खुद की फजीहत करवाने के लिए आमादा रहते हैं. इसका ताजा उदाहरण है बीकानेर रोड पर स्थित बेशकीमती वाणिज्यिक भूमि की आवासीय भूखंडों के रूप में की जा रही नीलामी. पूर्व विधायक हरचंद सिंह सिद्धू के आवास के ठीक सामने स्थित यह है वही जमीन है जहां कुछ दिन पूर्व तक नौजवान वॉलीबॉल खेलते थे. इस जगह की बीकानेर रोड पर खुलती दिशा में सब्जी की रेहड़ियां लगती है और पीछे की तरफ उप पंजीयक कार्यालय वाली सड़क है. तीन तरफ सड़क वाली इस बेशकीमती जमीन के एक हिस्से पर न्यायालय के आदेश से कुछ समय पूर्व ही एक व्यक्ति को कब्जा सौंपा गया है. इसके बाद ही नगरपालिका ने शेष बची भूमि पर अपने स्वामित्व के बोर्ड लगाए हैं. जबकि इससे पूर्व प्रशासकों को शायद पता ही नहीं था कि यह जमीन भी पालिका की है.
उल्लेखनीय यह है कि इस बेशकीमती भूमि की लोकेशन देखकर अनजान आदमी भी बता सकता है कि यह जमीन पूरी तरह से वाणिज्यिक गतिविधियों के काम की है. बाजार के ठीक बीच में स्थित होने के कारण इस जमीन का बाजार भाव करोड़ों रुपए में है लेकिन नगरपालिका ऐसी शानदार जगह को 20 गुणा 50 के आवासीय भूखंडों में काटकर बेचने जा रही है. इसकी सार्वजनिक नीलामी घोषणा भी कर दी गई है.
पालिकाध्यक्ष ओमप्रकाश कालवा का कहना है कि मास्टर प्लान में यह भूमि आवासीय दर्शाई गई है और डीडीआर से इसका प्लान अनुमोदित करवाने के बाद ही नीलामी जारी की गई है.
अधि.अधिकारी मिल्खराज चुघ से पूछा गया तो उन्होंने बड़ा हास्यास्पद बयान दिया कि उन्हें इस बाबत ज्यादा जानकारी नहीं है. वे फाइल देख कर ही बता सकते हैं कि पालिका द्वारा इस जमीन के भू उपयोग परिवर्तन हेतु कोई कार्रवाई की गई है अथवा नहीं. पालिका की बाजार में स्थित करोड़ों रुपए की एक महत्वपूर्ण संपत्ति की नीलामी हो और उसके संबंध में ईओ अपनी अनभिज्ञता जारी करे, यह गले नहीं उतरती. यदि वाकई उन्हें जानकारी नहीं है तो फिर इस शहर का भगवान ही मालिक है.
इसीलिए इस नीलामी पर कई महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं जो पालिका प्रशासन की कार्यशैली को भ्रष्टाचार के कटघरे में खड़ा करते हैं :-
1. क्या पालिका ने डीडीआर और सरकार को इस भूमि के वाणिज्यिक होने और उसके राजस्व मूल्य की उपयोगिता से अवगत करवाया था ?
2. यदि मास्टर प्लान में कोई खाली जगह वर्षों पूर्व आवासीय दर्शाई गई है और वर्तमान में वह वाणिज्यिक उपयोग की है तो करोड़ों की राजस्व प्राप्ति को ध्यान में रखते हुए उसके भू परिवर्तन हेतु नगर पालिका ने अब तक क्या कार्यवाही की ?
3.पूर्व में भी सरकारों द्वारा जनहित और राजस्व प्राप्ति को ध्यान में रखते हुए मास्टर प्लान के कई हिस्सों को डिनोटिफाइड किया गया है तो फिर इस जमीन के संबंध में पालिका द्वारा प्रयास क्यों नहीं किए गए ?
4. नीलामी के पश्चात इन आवासीय भूखंडों का वाणिज्यिक उपयोग नहीं होगा, इसे नगरपालिका कैसे सुनिश्चित कर पाएगी ?
5. भूखंड आवंटित होने के बाद यदि कोई आवंटी उसे वाणिज्यिक करवाना चाहेगा तो क्या नगरपालिका उसे रोक पाएगी ? यदि रोकेगी तो क्या वह आवंटी न्यायिक प्रक्रिया से अपने हितों की रक्षा नहीं करेगा ? उस समय नगरपालिका को सिर्फ शुल्क के रूप में मिलने वाली भू रूपांतरण राशि पर संतोष करना होगा.
6. और सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस नीलामी से नगर पालिका को होने वाले करोड़ों रुपए के राजस्व नुकसान की जवाबदेही किसकी होगी ?
नगरपालिका मंडल में विपक्ष की भूमिका निभा रहे भाजपा के पार्षदों की चुप्पी भी संदेह के घेरे में है. यदि समय रहते विपक्ष अपनी भूमिका निभाता तो यह संभव ही नहीं था कि पालिका इस जमीन की आवासीय नीलामी घोषणा जारी कर दे. इस मामले में विधानसभा सत्र से लौट रहे विधायक रामप्रताप कासनिया का कहना था कि वास्तव में यह जमीन तो वाणिज्यिक है. लेकिन नगरपालिका ऐसा क्यों कर रही है, इसकी गहन पड़ताल की जाएगी.
गौरतलब है कि पूर्व पालिकाध्यक्ष काजल छाबड़ा के कार्यकाल के अंतिम दिनों में इंदिरा सर्किल पर स्थित वाणिज्यिक भूमि को आवासीय के रूप में बेचने की ऐसी ही कवायद की गई थी जिसे न्यायालय के आदेश द्वारा रुकवा दिया गया था. यह जमीन भी करोड़ों रुपए मूल्य की थी जिसे पालिका मिलीभगत के साथ औने-पोने दामों में आवासीय भूखंडों में बेचना चाहती थी.
होना तो यह चाहिए कि नगरपालिका इस जमीन का भू उपयोग परिवर्तन करवाए और उसके बाद इसे वाणिज्यिक भूखंडों के रूप में नीलाम करें. विकल्प के रूप में शहर के बीचोबीच स्थित इस भूमि पर यदि पालिका खुद का व्यवसायिक कांपलेक्स खड़ा करे तो उसे प्रतिमाह लाखों रुपए की आय किराये के रूप में हो सकती है. शहर के भीड़ भरे क्षेत्रों में स्थित सारे बैंक इस कॉम्पलेक्स में लाए जा सकते हैं और वहां यातायात की समस्या का भी समाधान हो सकता है.
देश में जहां भाजपा सरकार द्वारा सरकारी उपक्रमों के किए जा रहे निजीकरण की कांग्रेस आलोचना कर रही है वहीं स्थानीय स्तर पर खुद उसका पालिका बोर्ड इस ढंग से सरकारी संपत्तियों का निस्तारण करने में लगा हैं तो बदलाव की उम्मीद करना बेमानी है.
डॉ. हरिमोहन सारस्वत
Sunday, 23 August 2020
लोकहित की अवधारणा को धूमिल करता है निजीकरण
वित्तीय प्रबंधन प्रत्येक राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण होता है जो उसके विकास को गति और दिशा देता है. लेकिन यह कॉरपोरेट सेक्टर के वित्तीय प्रबंधन से पूर्णतया भिन्न है. देश की बैलेंस शीट में जहां लाभ की बजाय जनकल्याण महत्वपूर्ण होता है वहीं व्यवसायिक उपक्रम हमेशा लाभ की अवधारणा पर काम करते हैं. वास्तव में किसी देश की अर्थव्यवस्था में लाभ जैसा तत्व होता ही नहीं है बल्कि वहां तो सामाजिक विकास को केंद्र में रखते हुए 'आय या खर्चों का आधिक्य' ही विकास का पैमाना माना जाता है. कॉरपोरेट और राष्ट्र की बेलेन्स शीट का यही मुख्य भेद सरकारों को उपलब्ध संसाधनों के निजीकरण की ओर खींचता है. इससे पूंजीगत संसाधन एक वर्ग विशेष के हाथों में इकट्ठे होने लगते हैं जो अंततः सत्ता का रूप धर लेते हैं. ऐसी स्थिति में आर्थिक विषमताओं को कम करने और राष्ट्रीय विकास के दिव्य स्वप्न धूमिल होने लगते हैं.
निजीकरण का सीधा अर्थ है 'कॉरपोरेट' के हाथों में अर्थव्यवस्था की कमान. वही कॉर्पोरेट, जिसका अस्तित्व लाभ के उद्देश्य पर टिका है. उसे सामाजिक दायित्वों की पूर्ति से ज्यादा मतलब नहीं होता. ऐसे बड़े व्यवसायिक उपक्रम सिर्फ विधिक रूप से थोपे गए सामाजिक दायित्वों को पूरा करने की कवायद करते हैं. इसके विपरीत लोकतांत्रिक सत्ता हमेशा सामाजिक विकास की अवधारणा के सिद्धांत पर काम करती है. किसी भी क्षेत्र के सरकारी उपक्रमों की नीतियों को देख लीजिए. उनमें हमेशा सार्वजनिक हितों को ध्यान में रखते हुए नियोजन किया जाता है. इसका सीधा सा कारण है कि सरकारों के लिए लाभ कमाने से पहले जनकल्याण मुख्य लक्ष्य होता है.
आजादी के बाद का आरम्भिक परिदृश्य
आजादी के बाद के पहले दो दशकों की बात करें तो तत्कालीन कांग्रेस सरकार का अपना राष्ट्रवाद हुआ करता था जिसके चलते उन्होंने निजीकरण को प्रोत्साहन देने की बजाय आधारभूत ढांचे से जुड़े सभी उपक्रमों के राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया शुरू की. रेलवे, बीमा, उड्डयन, टेलीफोन, सड़क परिवहन, जहाजरानी और इस्पात उद्योगों को सरकार ने पूरी तरह से राष्ट्रीयकृत कर दिया था. 1969 में 19 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण इस बात का द्योतक था कि सरकार लाभ की बजाए जनकल्याण की नीतियों पर काम करना चाहती है. इसी का परिणाम था कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों में लीड बैंकों द्वारा लाखों शाखाएं खोली गई. इन शाखाओं का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं था बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए बैंकों को समग्र विकास का सामाजिक दायित्व सौंपा गया था. 70 के दशक की हरित क्रांति के दौरान भी सरकारी क्षेत्र में ही खाद का पहला कारखाना खोला गया था. इसी समय रूस के सहयोग से सरकारी क्षेत्र में ही देश के सबसे बड़े कृषि फार्म की स्थापना हुई थी जिसे बाद में राष्ट्रीय बीज निगम को सौंप दिया गया. इन तथ्यों से पता चलता है कि उस दौर में सरकार की सामाजिक विकास अवधारणा के चलते निजी क्षेत्र अपने पांव पसार नहीं पाया था. हालांकि यह भी सच है कि लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के बोलबाले के कारण राष्ट्रीयकरण की व्यवस्था अपेक्षित परिणाम देने में पूरी तरह सफल नहीं हुई. लेकिन इन खामियों के बावजूद भी सामाजिक विकास की अवधारणा पर आधारित नियोजन को नकारा नहीं जा सकता.
भूमंडलीकरण के दौर का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा
90 के दशक में शुरू हुए विश्वव्यापी भूमंडलीकरण से भारत भी अछूता नहीं रहा. विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष व अन्य अंतरराष्ट्रीय व्यवसायिक दबावों के चलते सरकार को अपनी नीतियां बदलनी पड़ी. इस दौर में निजी क्षेत्र को अपनी लाभकारी नीतियों के साथ न सिर्फ नए उपक्रम स्थापित करने का मौका मिला बल्कि सरकारी क्षेत्र की लाभकारी कंपनियों में भी निवेश का अवसर दिया गया. विनिवेश की इस प्रक्रिया के शुरुआती दौर में 5 से 26% विदेशी पूंजी को कड़े प्रावधानों के तहत अनुमति दी जाती थी. विदेशी निवेशकों को पूंजी और लाभ के 'रिपेट्रिएशन', अर्थात घरवापसी की अनुमति नहीं थी. इसके बावजूद विदेशी संस्थागत निवेशकों ने अपने पैर पसारने शुरू किए क्योंकि व्यवसायिक भाषा में जोखिम ही लाभ का आधार है. निजीकरण के इस दौर का नतीजा यह हुआ कि भारतीय बाजारों में अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड नजर आने लगे और अधिकांश स्वदेशी कंपनियां व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में पिछड़कर लुट-पिट गई और बंद हुई. इलेक्ट्रिक होम अप्लायंसेज इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जहां आज अमेरिकी, कोरियाई और जापानी कंपनियों का वर्चस्व है. सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की ज्यादातर कंपनियों का तो और बुरा हाल हुआ. अप्रत्याशित घाटा दिखा रही उनकी बैलेंस शीट को आधार बनाकर सरकारों ने ऐसी कंपनियों को बेचने के पक्ष में तर्क दिए और निजी करण का मार्ग प्रशस्त किया. जबकि वास्तविकता यह है कि आर्थिक वर्चस्व हासिल करने के लिए पूंजीगत ताकतें पर्दे के पीछे अपना काम कर रही थी.
आज परिस्थितियां पूरी तरह से बदल चुकी हैं. हालात यह है कि आधारभूत ढांचे से जुड़े उद्योगों में शत प्रतिशत विदेशी पूंजी निवेश की छूट है. यहां तक कि सुरक्षा से जुड़े उपक्रमों में भी अंबानी समूह की सेंध लग चुकी है. आजादी के दौर में जहां सामाजिक सुरक्षा और जनकल्याण को ध्यान में रखते हुए रेलवे, उड्डयन, जहाजरानी, बैंक, बीमा आदि महत्वपूर्ण क्षेत्रों का राष्ट्रीयकरण किया गया था, वहीं आज के दौर में ये सारे निजी क्षेत्र के लिए खोल दिए गए हैं. बेहतर प्रबंधन और उपभोक्ताओं को अच्छी सुविधाएं मिलने के तर्क देकर सरकारें पूरी तरह से पूंजीगत संस्थानों की तरफदारी करती दिखाई दे रही है.
संपत्तियों को बेचकर अर्थव्यवस्था चलाने की कवायद
जब किसी घर-परिवार का आर्थिक नियोजन घर की संपत्तियों को बेचने से किया जा रहा हो तो निश्चित रूप से उस परिवार का भविष्य अच्छा नहीं कहा जा सकता. यदि समय रहते इसे नहीं सुधारा जाता तो एक वक्त ऐसा भी आ सकता है जब आपके पास संपत्तियां बचे ही नहीं. अर्थशास्त्र का यही सिद्धांत देश पर भी लागू होता है. कहने को तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण दावा करती हैं कि निजीकरण से उपलब्ध वित्तीय संसाधनों को राष्ट्रीय विकास में लगाया जाएगा लेकिन भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के दृष्टिगत कैसा विकास हो पाएगा, यह देश के जनसाधारण से छिपा हुआ नहीं है.
सरकार के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि आखिर रेलवे और हवाई अड्डों के निजीकरण का क्या औचित्य है. बिजली और टेलीफोन जैसी आधारभूत सुविधाओं में तो पहले ही निजी क्षेत्र का बोलबाला है जिसके चलते बीएसएनएल, एमटीएनएल और प्रादेशिक विद्युत कंपनियां हथियार डाल चुकी हैं. देर सवेर इनका हाल भी एयर इंडिया की तरह होने वाला है. इन संस्थानों की संपत्तियों को बेचकर आर्थिक नियोजन करना कोई बुद्धिमानी नहीं है.
बेचने की बजाय बचाने के हों प्रयास
राष्ट्रीयकृत संस्थानों के वित्तीय हालत सुधारने के लिए निजीकरण कोई बेहतर समाधान नहीं कहा जा सकता. सवाल यह है कि कभी नवरत्न कहे जाने वाले उपक्रमों को ऐसी हालात में पहुंचाने का जिम्मेदार कौन है. दरअसल, भाई-भतीजावाद, राजनीतिक भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के चलते सार्वजनिक हित के इन व्यवसायिक संगठनों को सुनियोजित तरीके से घाटे की स्थिति में पहुंचाया गया है. इन उपक्रमों पर घाटे का ठप्पा ही सरकारों के लिए निजीकरण की राह आसान करता है. जरा सोचिए जो उपक्रम घाटे में चल रहे हैं वह निजी हाथों में पहुंचते ही लाभकारी कैसे हो जाते हैं !
आवश्यकता तो इस बात की है कि घाटे में चल रहे सरकारी संस्थानों के आर्थिक ढांचे का पुनर्गठन किया जाए और उनमें वही सुधारात्मक उपाय लागू किए जाए जो निजी क्षेत्र द्वारा अपनाए जाते हैं. भारतीय प्रबंधन संस्थानों के विद्यार्थी आज पूरी दुनिया में अपना डंका बजा रहे हैं. गूगल जैसे अंतरराष्ट्रीय दिग्गज का व्यवसायिक दायित्व भी एक भारतीय के हाथों में है. इन प्रबंधन विशेषज्ञों की सेवाएं जब दूसरे देशों द्वारा ली जा रही है तो हमारी सरकारें उन पर भरोसा क्यों नहीं करती. इस दिशा में नई सोच के साथ कदम बढ़ाने की आवश्यकता है.
सरकार यदि भ्रष्ट व्यवस्था पर अंकुश लगाने के लिए कमर कस ले तो हमारे सार्वजनिक उपक्रम अंतरराष्ट्रीय व्यवसायिक संस्थानों की टक्कर में पुनः खड़े हो सकते हैं. सामाजिक दायित्वों की पूर्ति के साथ गुणवत्तपूर्ण वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है.
-रूंख
Tuesday, 21 July 2020
सीमांत क्षेत्र का भूमि आंदोलन - 1970 (4)
आंदोलन के बावजूद बड़ी मछलियां निगल गई हजारों बीघा जमीनें
लोकतंत्र का एक कलुषित चेहरा यह भी होता है कि यहां कमजोर और दबे कुचले लोगों को पगोथिये (सीढियां) बनाकर चतुर चालाक कारीगर ऊपर पहुंच जाते हैं. सीमांत क्षेत्र का भूमि आंदोलन 1969-70 भी इससे अछूता नहीं रहा. प्रदेश सरकार ने जनाक्रोश और उग्र आंदोलन के चलते राजस्थान नहर से सिंचित होने वाली अनूपगढ़ घड़साना क्षेत्र की सरकारी जमीनों की नीलामी को रद्द तो कर दिया लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से होने वाली जमीनों की सौदेबाजी पर लगाम नहीं लगा सकी. लगाती भी कैसे ! आखिर, भूमाफिया किस्म के सफेदपोश लोग तो सरकार के भीतर और बाहर पैर पसार कर बैठे थे.
सन 1951 से लेकर 1967 तक राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में पांच लाख साठ हजार भूमिहीन किसानों को पैंतीस लाख एकड़ भूमि आवंटित की गई थी. इसमें अनुसूचित जाति और जनजाति के दो लाख तीस हजार काश्तकार शामिल थे. देखने और पढ़ने में तो ये आंकड़े बहुत प्रभावी लगते हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि इन भूमिहीनों में से कितने लोग इस ढंग से आवंटित भूमि पर काबिज हो सके ? वास्तविकता यह है कि आवंटित की गई अधिकांश जमीनों पर समर्थ और प्रभावशाली लोगों के कब्जे थे. उनसे पंगा कौन लेता. लिहाजा उन्होंने जमीन के आवंटियों से औने-पौने दामों में ये जमीनें अपने नाम हस्तांतरित करवा ली. नतीजा वही ढाक के तीन पात. आंदोलन काल के एक आलेख में एडवोकेट हरिशंकर गोयल लिखते हैं कि इन बेशकीमती जमीनों पर बड़े नेता और धनिक व्यापारी काबिज़ हैं. कुछ दलित लोगों की जमीनों पर तो खूंखार और शक्तिशाली लोगों ने जबरदस्ती कब्जे कर रखे हैं. उनके अनुसार गंगानगर जिले में किसानों के 3 वर्ग है. पहला संपन्न किसान, दूसरा तस्करी और व्यापार में लिप्त सफेदपोश व तीसरा साधारण किसान. उनकी मानें तो पहला और दूसरा वर्ग गंगानगर जिले ज्यादातर उपजाऊ भूमि पर कानूनन और गैरकानूनी ढंग से कब्जा जमा चुका है. गोयल यहीं बस नहीं करते बल्कि उस वक्त सत्ताधारी कांग्रेस के सांसदों, विधायकों, प्रधानों और कुछ मंत्रियों पर भी बाकायदा कब्जे करने और करवाने के आरोप लगाते हैं.
गौरतलब है कि आंदोलन में राजस्थान नहर से सिंचित होने वाली जिन जमीनों के सरकारी आवंटन की बात कही जा रही थी वह पाकिस्तान सीमा से लगता हुआ क्षेत्र है. वहां सीमा पर तस्करी में जुटे भूमाफियाओं ने भी सत्ताधारी नेताओं के साथ मिलकर सैंकड़ों बीघा जमीनों पर कब्जे किए. सरकार द्वारा की जाने वाली भूमि नीलामी में दरों को नियंत्रित करने के रास्ते भी इन लोगों ने पहले से निकाल रखे थे. भूमि चाहे नीलामी से आए या किसी दलित को होने वाले आवंटन से, हर हाल में जमीन उन्हीं की होनी थी, जिनके हाथ में लाठी थी. प्रत्यक्षत: दिखाई दे रहे इस पक्षपात पूर्ण भ्रष्टाचार के आचरण ने ही आम जनता में सरकार और उनके समर्थकों के विरुद्ध जनमानस तैयार किया जिसकी परिणति बड़े आंदोलन के रूप में हुई.
आंदोलन समाप्ति के बाद सरकार द्वारा विभिन्न आरक्षित श्रेणियों में इन जमीनों का आवंटन शुरू किया गया. अधिकांश आवंटन दस्तावेजों में जमीनों के स्वामी भूमिहीन और छोटे किसान नजर आते थे लेकिन भू माफिया और कुछ प्रशासनिक अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत के चलते अधिकांश बेशकीमती जमीनें देखते ही देखते प्रभावशाली लोगों के स्वामित्व में चली गई. विकास की इस बहती गंगा में सत्ता और विपक्ष के बड़े नेताओं सहित अनेक अधिकारियों और पटवारियों ने वारे न्यारे किए. आज भी इस क्षेत्र में ऐसे सफेदपोशों की हजारों बीघा जमीनें हैं जो सोना उगलती हैं.
लेकिन इस सब के बावजूद यह भी उतना ही सच है कि इस ऐतिहासिक भूमि आंदोलन की बदौलत ही प्रदेश के लाखों छोटे किसानों को भी जमींदार बनने का हक प्राप्त हुआ. आंदोलन के 50 साल बाद आज ऐसे दबे कुचले काश्तकारों की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक प्रगति को देखकर उस वक्त के आंदोलनकारियों और जमीन से जुड़े नेताओं के प्रति स्वत: ही श्रद्धा का भाव उमड़ आता है. कामरेड श्योपत सिंह, कामरेड योगेंद्र नाथ पांडा, प्रो. केदार, राम चंद्र आर्य, कुंभाराम आर्य, सेवा सिंह, कॉमरेड हेतराम बेनीवाल, गुरदयाल सिंह, महावीर प्रसाद कंदोई सरीखे नेताओं में जनता के हक- हुक़ूक़ के लिए संघर्ष का जो माद्दा था वो किसी भी दृष्टि में आजादी के आंदोलन से कमतर नहीं था. वस्तुत: सत्ता के विरुद्ध यह हक की लड़ाई ही थी जिसमें गांव-गांव से गिरफ्तार हो रहे हजारों लोगों को ग्रामीण महिलाओं ने संघर्ष गीत गाकर खुशी खुशी पुलिस के साथ विदा किया था. यही कारण है कि सीमांत क्षेत्र के आंदोलनों की जब कहीं बात चलती है लोग बड़े गर्व के साथ इन नेताओं को याद करते हैं.
-रूंख
( जानकारी का स्रोत - तत्कालीन समाचार पत्रों की रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शियों के वक्तव्य, सत्याग्रह स्मारिका, आंदोलन के संबंध में लिखे गए लेख और पुलिस रिपोर्ट)
सीमांत क्षेत्र का भूमि आंदोलन -1970 (3)
अलवर जेल में बंद गंगानगर के आंदोलनकारियों ने हड़ताल कर सुधरवाई थी जेल व्यवस्थाएं
1969-70 के गंगानगर भूमि आंदोलन को देश के बड़े आंदोलनों में शुमार किया जाता है. सरकार अपना खजाना भरने के लिए राजस्थान नहर से सिंचित होने वाली बेशकीमती जमीनों को अपने चहेतों और पूंजी पतियों के हाथों बेचने पर तुली थी जबकि यहां का भूमिहीन किसान इन जमीनों के सरकारी आवंटन की मांग कर रहा था. प्रदेश की सत्ता के विरुद्ध आमजन के हक की लड़ाई लड़ रहे इस आंदोलन को बिना किसी जात-पांत और वर्ग भेद के जनता का साथ मिला. यही कारण था कि इस आंदोलन के चलते समूचे बीकानेर संभाग की कानून व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई थी. गंगानगर जिले में तो सेना, आरएसी और मध्य प्रदेश पुलिस भी तैनात की गई थी.
दस्तावेजी आंकड़ों के अनुसार 7 जनवरी 1970 को संगरिया और भादरा मैं हुए गोलीकांड के बाद यह आंदोलन प्रदेश भर में फैल गया. इस आंदोलन में 15,000 से अधिक लोगों ने सामूहिक गिरफ्तारियां दी. इन्हें दूरदराज स्थित अलवर, सिरोही, बीकानेर, नागौर, जोधपुर और भरतपुर की विभिन्न जेलों में रखा गया. पुलिस द्वारा आंदोलन के अगुआ नेताओं को भी गिरफ्तार कर अलग-अलग जेलों में ठूंस दिया गया.
गंगानगर जिले के अधिकांश बंदियों को अलवर और सिरोही जेल में रखा गया था. अलवर जेल में इन बंदियों ने तो भूमि आंदोलन के बीच जेल सुधार आंदोलन और शुरू कर दिया. जिसने सरकार की परेशानी बढ़ाई और अंततः सरकार को जेल व्यवस्थाओं में सुधार के लिए मजबूर होना पड़ा.
उपलब्ध तथ्यों के अनुसार घटनाक्रम कुछ इस ढंग से चलता है. अलवर जेल में 19 जनवरी 1970 तक इस आंदोलन में सामूहिक गिरफ्तारी देने वाले 140 सत्याग्रही लोगों को भेजा गया था. 25 और 26 जनवरी को गंगानगर जिले में विभिन्न स्थानों से गिरफ्तार हुए 187 और लोगों को भी यहां भेजा गया. 28 जनवरी को नोहर से गिरफ्तार 300 राजनैतिक कार्यकर्ताओं को अलवर जेल में शिफ्ट किया गया जिसमें संसोपा नेता महावीर प्रसाद कंदोई भी शामिल थे. इस प्रकार कुल मिलाकर 627 आंदोलनकारी में बंद थे.
इस जेल की हालत अत्यंत दयनीय थी. कैदियों की आवास समस्या तो थी ही, शौचालयों की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी. सफाईकर्मी भी नहीं आता था. भोजन व्यवस्था तो और ज्यादा खराब थी. न तो राशन पूरा मिलता था न ही भोजन की कोई गुणवत्ता थी. जेल में चिकित्सकीय सुविधाओं का भी अभाव था. इन व्यवस्थाओं को दुरुस्त करवाने के लिए जेल में एक संघर्ष समिति बनाई गई जिसमें सूरतगढ़ के गंगाजल जाखड़ को अध्यक्ष, मन्नी वाली के लादूराम तरड़ को मंत्री, और नोहर के संसोपा नेता महावीर प्रसाद कंदोई को कोषाध्यक्ष बनाया गया.
26 सदस्यीय इस समिति ने गठन के तुरंत बाद जेल अधीक्षक को व्यवस्थाओं में सुधार और नए मैनुअल के हिसाब से प्रति बंदी को 6.25 पैसे प्रतिदिन की दर से खाने हेतु दिए जाने का नोटिस दिया. संयोगवश उसी दिन शाम को प्रथम श्रेणी दंडनायक वेद प्रकाश गोयल और अन्य अधिकारी जेल में आए. समिति के सदस्यों और अन्य कार्यकर्ताओं ने उन्हें जेल के भीतर ही घेर लिया. मांगों के संबंध में पहले तो उनसे कोई बात नहीं की गई लेकिन अचानक समिति अध्यक्ष गंगाजल जाखड़ द्वारा कह दिया गया कि समाधान होने तक आपको बाहर नहीं जाने दिया जाएगा. स्थिति बिगड़ती देख दंड नायक ने जिलाधीश से फोन पर बात की और उसके बाद जेल अधीक्षक को सभी मांगे मान लेने के निर्देश दिए. देर रात्रि 12 बजे घेराव समाप्त कर दिया गया. सत्याग्रहियो का जेल में यह पहला कदम सफल रहा.
इस जेल में 263 बंदियों को 3 घुड़सालों में रखा गया था जो चारों तरफ से खुली थी. जनवरी की सर्दी में वहां बंदी बहुत परेशान थे. संघर्ष समिति की एक मांग पर उन्हें तुरंत सरिस्का जेल में शिफ्ट कर दिया गया. समिति के कोषाध्यक्ष महावीर प्रसाद कंदोई ने जेल अधीक्षक को अखबार और खेलों का सामान उपलब्ध करवाने का ज्ञापन अलग से सौंपा जिस पर त्वरित कार्रवाई हुई.
इसी बीच बीकानेर जेल में बंद विधायक प्रो. केदार के आह्वान पर राजस्थान की समस्त जेलों में बंद आंदोलनकारियों द्वारा व्यवस्थाओं को सुधारने हेतु जेल में ही धरना आयोजित किया गया. इस धरना प्रदर्शन में निम्न मांगें उठाई गई :-
1. जयपुर केंद्रीय कारावास की समस्त महिला सत्याग्रहियों को बी श्रेणी की सुविधा प्रदान की जाए.
2. जिन राजनीतिक कार्यकर्ताओं को उनके घरों से बाहर गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है, उन्हें पहनने के कपड़े और रोजमर्रा की जरूरत का सामान उपलब्ध करवाया जाए.
3. गंगानगर जिले से सेना आरएसी और मध्य प्रदेश पुलिस को तुरंत हटाया जाए.
4. गिरफ्तारी के स्थान से लेकर जेल तक के रास्ते का खर्च नियमानुसार दिया जाए.
5. आंदोलनकारियों की तारीख पेशी बार-बार न बदली जाए.
प्रदेशभर की जेलों में हुए इस धरना प्रदर्शन के चलते आंदोलनकारियों की सभी मांगें मान ली गई. अलवर जेल में बंद आंदोलनकारियों से उसी दिन संसद सदस्य मधु लिमए मिलने के लिए पहुंचे.
उन्होंने इस ऐतिहासिक आंदोलन को सफल बनाने के लिए सभी लोगों का आभार व्यक्त किया.
सूरतगढ़ नगरपालिका में लगातार सात बार पार्षद बनने वाले सत्यनारायण छिंपा इसी जेल में बंद थे. वे बताते हैं कि उनके पिता को सिरोही जेल में रखा गया था. दोनों के जेल चले जाने से घर और खेत को संभालने वाला कोई नहीं था. लेकिन एक आश्चर्यजनक तथ्य वह बताते हैं कि उस साल हमारे खेत में सबसे ज्यादा अनाज हुआ था. अलवर जेल में ही सूरतगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार माल चंद जैन भी आंदोलनकारियों के साथ बंद थे. मजेदार वाकया देखिए कि जैनसाहब की शादी की तारीख तय की हुई थी लेकिन उनके अचानक गिरफ्तार होने से गड़बड़ हो गई. परिजनों द्वारा भागादौड़ी कर जैनसाहब के विवाह का निमंत्रण पत्र प्रस्तुत किया गया और बड़ी मुश्किल से जमानत करवाई गई. जेल में ही महावीर प्रसाद कंदोई ने गंगानगर किसान आंदोलन पर एक सत्याग्रह स्मारिका प्रकाशित करवाने का प्रस्ताव रखा था जिसे सब ने स्वीकार किया. आंदोलनकारियों के साथ ही जेल में बंद सूरतगढ़ के एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार दिलात्म प्रकाश जैन को स्मारिका के संपादन का दायित्व सौंपा गया. यह स्मारिका आज भी आंदोलन के इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है.
इस ऐतिहासिक भूमि आंदोलन के जाने कितने किस्से हैं जो समय की फाइलों में बंद हैं. जरा सोचिए, अनूपगढ़ क्षेत्र की जमीनों के लिए रायसिंहनगर से आंदोलन शुरू होता है. संगरिया में गोलियां चलती है. भादरा में नौजवान मरते हैं सूरतगढ़ के कार्यकर्ता गिरफ्तारी देते हैं. अलवर जेल में उन्हें बंद किया जाता है. जयपुर में बैठी सरकार झुकती है और दिल्ली से आदेश आता है. यह आंदोलन की ताकत होती है जिसमें कभी-कभी व्यक्ति ही समूचा देश बन जाता है.
-रूंख
( जानकारी का स्रोत - तत्कालीन समाचार पत्रों की रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शियों के वक्तव्य, सत्याग्रह स्मारिका, आंदोलन के संबंध में लिखे गए लेख और पुलिस रिपोर्ट)
सीमांत क्षेत्र का भूमि आंदोलन - 1970 (2)
रायसिंहनगर में लाठीचार्ज के बाद नीलामी स्थगित, सरकार सकते में !
( सितंबर 1969 के मध्य में शुरू हुई हल्की ठंड के बीच)
सुबह सवेरे सुरजाराम किसी काम से मंडी आया था. बाजार में स्थित तहसील के पास जब उसने बैरीकेड्स और चूने की लाइनिंग देखी तो उत्सुकतावश वह भी वहां खड़ी भीड़ का हिस्सा बन गया. भीड़ में अधिकांश लोग काश्तकार और मजदूर थे जो आस-पास के गांवों से आए थे. सरकारी आदेश के मुताबिक आज रायसिंहनगर तहसील परिसर में राजस्थान नहर से सिंचित होने वाली कमांड जमीनों की खुली बोली की जानी थी. पड़ोसी राज्यों के अनेक पूंजीपति और जमींदार बड़ी-बड़ी गाड़ियों में इन बेशकीमती जमीनों की बोली देने पहुंचे थे. वहीं बोली का विरोध कर रहे प्रोफेसर केदार, कामरेड श्योपत सिंह, कामरेड हेतराम बेनीवाल, राम चंद्र आर्य, योगेंद्रनाथ हांडा, सांसद कुंभाराम आर्य, गुरदयाल सिंह, दौलत राम और हरचंदसिंह सिधू आदि खाड़कू नेता भी बैरीकेड्स के पास खड़े मंत्रणा कर रहे थे. ठेठ देहाती अंदाज में सुरजा राम ने कुछ आगे बढ़ कर हरचंद सिंह से पूछा-
'थे के तोड़न तूड़ाण गी बात कर रया हो ?'
युवा वकील हरचंदसिंह ने बताया कि आज सरकार राजस्थान नहर से सिंचित होने वाली जमीनों की नीलामी करने जा रही है. बैरिकेट्स के उस तरफ धारा 144 लगी हुई है. यदि यह नहीं टूटी तो सरकार जीत जाएगी और हमारी हार होगी. बरसों से काश्त कर रहे किसानों की जमीनें पूंजी पतियों के हाथ में चली जाएंगी.
यह सुनकर सुरजा राम ने वहां खड़े सभी नेताओं को गाली निकाली और साइड में जाकर अपनी जूती और कंबल उतार कर रख दिया. प्रोफेसर केदार ने हरचंदसिंह से पूछा यह आदमी क्या कह रहा है. हरचंद ने हंसते हुए कहा कि यह हम सबको 'गंडमरा' बता रहा है.
अचानक सब ने देखा कि सुरजाराम कबड्डी खेलने के अंदाज में अपनी जांघ पर थाप देकर बैरीकेड्स पर जा चढ़ा और ललकारते हुए तहसील परिसर तरफ कूद गया जहां धारा 144 लगी हुई थी. उसे कूदते देख पुलिस के जवान दौड़े और एक लाठी उसके सिर में जचाकर ठोकी. यह देख नेताओं सहित उपस्थित भीड़ को भी जोश आ गया और सब ने बैरिकेड्स तोड़ते हुए पुलिस घेराबंदी को ध्वस्त कर दिया. अब पुलिस लाठियां भांज रही थी और लोग चीखते चिल्लाते हुए इधर उधर दौड़ रहे थे. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि बिना प्लान किए यह सब कैसे हो गया. सुरजाराम के सिर से बहुत ज्यादा खून बह रहा था. हरचंद सिंह ने जब पास जाकर उसे संभालना चाहा तो उसने अनदेखी करते हुए पूछा-
'रै सरदार, सिर की छोड, आ बता तेरी धारा धूरा टूटगी के, या कोई सी बचगी !'
हरचंद ने उसे बताया कि सब कुछ टूट गया है, बस किसी भी ढंग से यहां से निकलो. जैसे ही हरचंद ने उसका हाथ पकड़ कर उठाने की कोशिश की तो एक पुलिस वाले ने सुरजा राम की पीठ में लाठी का जोरदार वार किया. इस अफरातफरी में हाय तौबा मच गई. जिसको जहां जगह मिली, वहीं भाग छूटा. तहसील परिसर की पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्थाएं ध्वस्त हो चुकी थी.
सितंबर 1969 ! राजस्थान की सुखाड़िया सरकार ने राजस्थान नहर के नक्शे में स्थित अनूपगढ़-घड़साना क्षेत्र की कमांड अनकमांड जमीनों को खुली नीलामी के जरिए बेचकर अपना खजाना भरने का मानस बना रखा था. उसी संबंध में आज रायसिंहनगर तहसील में नीलामी रखी गई थी जिसका क्षेत्र के किसान और जागरूक नेता लगातार विरोध कर रहे थे. यही कारण था कि सरकार ने नीलामी स्थल पर पुलिस की चाक चौबंद व्यवस्था की थी.
सुरजाराम के देहाती दुस्साहस ने पल भर में ही इस व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया और पुलिस को लाठीचार्ज करने के लिए मजबूर कर दिया. इस उपद्रव का परिणाम यह हुआ कि सरकार को नीलामी स्थगित करनी पड़ी. लेकिन सरकार ने अपना सख्त रवैया दिखाया और 03 नवंबर 1969 को अनूपगढ़ में फिर नीलामी करने की घोषणा जारी कर दी.
वस्तुतः स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह प्रदेश का सबसे बड़ा किसान आंदोलन था जो रायसिंहनगर से शुरू होकर पूरे प्रदेश में फैल गया था. आंदोलन के समर्थन में संभाग के चारों जिलों से हजारों लोगों ने अपनी गिरफ्तारियां दी थी. इस आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वालों में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा,), भारतीय क्रांति दल, दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां, किसान यूनियन और आंदोलन के दौरान गठित की गई किसान संघर्ष समिति शामिल थी.
उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक सरकार द्वारा इन जमीनों की नीलामी घोषणा के बाद असाधारण ढंग से लगभग 96 हजार दरख्वास्तें लगी थी. लोगों में भूमि खरीद के प्रति जबरदस्त रुझान को देखते हुए सरकार का उत्साह बढ़ गया था. प्रोफेसर केदार, जो उस समय संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के विधायक थे, ने भारतीय क्रांति दल के विधायक रामचंद्र आर्य के साथ मिलकर सरकार के इस निंदनीय कार्य का घोर विरोध किया. इन दोनों ने अपने डेरे रायसिंहनगर में लगा लिए और नीलामी को येन केन प्रकरेण रोकने के लिए गंगानगर किसान संघर्ष समिति का गठन करने में अहम भूमिका निभाई.
राम चंद्र आर्य को समिति का अध्यक्ष बनाया गया. श्रीनिवास थीरानी, उपाध्यक्ष और सेवा सिंह किसान संघर्ष समिति के संचालक बने. समिति में जमीन से जुड़े 11 बड़े नेताओं को भी शामिल किया गया. समिति द्वारा अपनी 33 सूत्री मांगों का ज्ञापन सरकार को सौंपा गया. दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा संचालित किसान सभा ने भी अपनी मांगों के समर्थन में संघर्ष समिति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस आंदोलन की लड़ाई लड़ी. कम्युनिस्ट इन मांगों में सीलिंग एक्ट को लागू किए जाने पर जोर दे रहे थे. तत्कालीन सांसद कुंभाराम आर्य ने सत्याग्रह का आह्वान करते हुए प्रतिदिन सांकेतिक गिरफ्तारियां देने की बात की लेकिन कामरेडों ने सामूहिक गिरफ्तारियों का आह्वान कर संघर्ष को तेज कर दिया. इस निर्णय से जनमानस में अपूर्व जोश का संचार हुआ और आंदोलन को नई गति मिली. कामरेड श्योपतसिंह, योगेंद्रनाथ हांडा, हेतराम बेनीवाल सरीखे अगुआ नेताओं की समर्पित कार्य शैली का परिणाम था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को इस आंदोलन में हस्तक्षेप करना पड़ा. प्रदेशभर में हो रही गिरफ्तारियां और उग्र ढंग से फैलते जा रहे आंदोलन को समाप्त करवाने के लिए इन नेताओं को वार्ता के लिए दिल्ली बुलाया गया. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद आंदोलनकारियों के नेताओं से बातचीत की और तुरंत प्रदेश सरकार को भूमि नीलामी प्रक्रिया बंद करने के निर्देश दिए.
इस आंदोलन के दौरान संगरिया और भादरा गोलीकांड में हुए शहीदों के अलावा सैकड़ों लोग पुलिस गोलाबारी और लाठीचार्ज में घायल हुए. हजारों लोगों को महीनों जेल में बंद रहना पड़ा. प्रदेश की पुलिस और प्रशासन व्यवस्था पूरी तरह से अस्त-व्यस्त रही लेकिन एक लंबे संघर्ष के बाद अंततः इस जन आंदोलन की जीत हुई. इस जीत के लिए चुकाई गई बड़ी कीमत का ही परिणाम है कि आज इंदिरा गांधी नहर द्वारा सिंचित यह जमीनें प्रदेश के काश्तकारों के स्वामित्व में है.
-रूंख
( जानकारी का स्रोत - तत्कालीन समाचार पत्रों की रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शियों के वक्तव्य, सत्याग्रह स्मारिका, आंदोलन के संबंध में लिखे गए लेख और पुलिस रिपोर्ट)
-
Subscribe to:
Posts (Atom)
शहर के बीचों-बीच शाहरुख खान बांट रहा कैंसर
- नशे के प्रचार में सहयोगी बना शहर का प्रशासन सूरतगढ़, 07 अक्टूबर। एक तरफ जहां जिले भर में पुलिस प्रशासन द्वारा नशामुक्ति अभियान चलाने की ...
Popular Posts
-
- पुलिस अधिकारियों की डीपी लगे व्हाट्सएप नम्बरों से आती है कॉल - साइबर क्राइम मामलों पर पुलिस और गृह मंत्रालय की बेबसी 'हैलो' कौ...
-
(ग तांक से आगे...) सीता चलकर राम के पास आयीं। राम के मुखचन्द्र का दर्शन किया और विनयपूर्वक उनके पास खड़ी हो गयीं। अब यहां से वह कथा प्रारम्भ...
-
प्रोफेसर रजनीरमण झा हिंदी और संस्कृत साहित्य के उद्भट विद्वान हैं। वैदिक साहित्य का विश्लेषण और उस पर सारगर्भित टीकाएं उनके अध्ययन -लेखन की...















