Search This Blog

Thursday, 30 April 2020

बिमला अबार कठै होयसी ! (कहानी - जनकराज पारीक)

मूल कहानी-जनकराज पारीक
राजस्थानी अनुवाद- डाॅ. हरिमोहन सारस्वत ‘रूंख’ 

अबार ई सरला री मौत रो समचार पूग्यो है. म्हानै इंयां लागै जाणै रमेस पचैरी सूं बेस्सी म्हूं बींरी हत्या रो दोसी हूं. म्हूं जार्णूं इं हत्या नै दायजै रो मामलो बणा’र सरला रै सासरलां पर मुकदमो चलाइजसी. मन्नै दुनिया री कोई कोरट कचेड़ी हत्यारो बणा’र हथकड़ी नीं घाल सकै अर रमेस पचैरी अबै रयो कोनी. साची बात आ है कै सरला री हत्या होवण रै लारै म्है अर रमेस पचैरी दोनूं हां. म्हानै इंयां भी लागै जाणै सरला रा सासरला इण हत्या सारू इत्ता दोसी नीं है जित्तो म्हूं.

ईं बात नै सावळ समझणै सारू आपां नै आठ बरस लारै बीं सागी दिन तांई पूगणो पड़सी जद रमेस पचैरी मरयो अर बिंरी ल्हास सारै बैठ’र म्हूं,, सरला अर बिमला अेक लाम्बी सीक काळी रात रो अेक अेक छिण छुलतां-छुलतां काढ्यो हो. बगत रो चकरियो जिंया कै थमग्यो होवै. अनिश्चय अर संका रै गैरै अन्धारै रो दुशालो ओढयां म्है तीनूं रमेस पचैरी री ल्हास खन्नै बैठ्या हा, मूरत बण्या, डाफाचूक सा, सोचां मांय गम्योड़ा.

रमेस पचैरी मेरो कोई सगो-समधी नीं हो, लंगोटियो भायलो भी नीं. बीं रै साथै बस इत्ती मिलगत ही कै म्हे दोनूं रसद विभाग मांय साथै काम करया करता. बींरो ओर कठई बेलिपो नीं हो इण सारू फगत म्हूं ई बींरो भायलो हो. बो फक्कड़ अर आपो आप मांय मस्त रैवणियो जीव हो, अर आपई बो मरग्यो. म्हारी मिलगत बींरै साथै इंया भी फिट कोनी बैठी कै बो दारूड़ियो हो अर म्हनै दारू रै नांव सूं ई चिड़. दारू री बांस सूं ई  मेरै नास्यां मांय बळत लाग जांवती, अर रमेस तो लुगाई रै चल्यां पछै बेथाग पिवण लाग्यो. मैं घणोई केवंतो ‘अबै भौजाई नीं रई. सरला अर विमला रो भविख ना बिगाड़. इंया हर घड़ी नसै मांय टुल्ल रैसी तो आं रा हाथ पीळा कुण करसी ?’ बो सदांई लड़खड़ांवती जबान सूं केवंतो ‘थूं है नीं मेरो भाई, तेरै थकां म्हानै क्यांरी चिन्ता? तन्नै छोड़ अठै दूजो है कुण? अेक भैन ही, बा कैन्सर सूं मरी गई, निपुतरी, बनेई दूसरो ब्या कर लियो, काका -बाबा, भाई भतीजा है ई कोनी, लुगाई अधबिच्चाळै दगो देयगी, अबै पीळीभीत सूं हजारूं कोसां रै आंतरै तेरै खन्नै बैठ्यो हूं.’

बीं री बातां सुण‘र म्हूं अबोलो रैय जांवतो अर आपरी जिंया तियां ठरड़ीजती गिरस्ती मांय पाछो बावड़ जांवतो जठै म्हूं हो, म्हारा थुड़पणां हा, अबखायां ही अर भाडै़ सट्टै री लियोड़ी जूण ही.

फरवरी री अेक काळीसीक रात नै लगैटगै नौ बज्यां सरला घबरायोड़ी सी म्हारै घर रो आडो खुड़कायो अर डरयोड़ी सीक बोली ‘ अंकलजी, म्हारै पापा रै कांई ठाह कांई हुग्यो, लोई री उल्टी होई है अर बै बेचेत पड़या है’.

रात नै नौ बज्यां म्हूं रमेस पचैरी नै ले’र सरकारी अस्पताल गयो हो अर इग्यारा बज्यां बींरी लास ले’र बावड़यो, बीं घड़ी घर मांय फगत म्है तीन जणा हा. ते’रा बरसां री सरला, दस बरसां री बिमला अर उमर रै बरसां बिच्चाळै जूझतो म्हूं. म्हूं पैली बिरियां देख्यो कै चाळीस वाट रै लट्टू रै च्यानणै  मांय बाप री मौत सूं अनाथ होई बेट्यां किंयां धीरज सूं बैठै. सरला अर विमला री आंख्यां मांय आंसू कोनी, अेक अणजाण सो डर हो. चैरै पर रोणो नीं अेक जड़ता ही अर होठां पर कोई किरळाटो, कोई हेलो, कोई बात नीं, अेक गैरो मून पसरयोड़ो हो. 

अबै के होसी अंकल? मून मांय डूबी सरला आखी रात मांय फगत इत्ती बात बोली ही कै बींरा पापा बतांवता कै दूर रै रिस्तै रो म्हारो अेक मामो फर्रूखाबाद रैवै.

अर म्हे तीनूं रमेस पचैरी री ल्हास रै असवाड़ै पसवाडै बैठ्या हा, पूरी रात अबोला, मून मांय.

सुबै भेळा होया- थोड़ा घणा लोग दफ्तर रा, गळी बास रा अर ई अणजाण सै’र रा. बोल-बतळावण रै मांय सगळा आप आप रै हिसाब सूं लेखो करै.

‘भोत माड़ो होयो भई, मईनै पैली मां अर अबै बाप रो आसरो ई बापड़ै टाबरां सूं खुसग्यो.’

‘ईं आदमी रै तो कोई कडूम्बो ई न्याड़-नैडास कोनी, अबै आं टाबरां रो कांई होसी?’

‘इसी मौत तो भगवान बैरी दुसमण नै ई नीं देवै’
‘मौत नीं भई, इण नै तो आत्महत्या ई केवणो चाइजै, पीळीयो होयोड़ो हो पण पीवणो नीं छोड्यो.‘

‘बातां छोड़ो यार, खापण तो देवणो पड़सी, आओ कीं  इन्तजाम करां.’

‘ठीक बात है, आपां नै ई करणो पड़सी, रिस्तेदारां तो कोई आंवता दिस्या कोनी पछै किनै उडीकणो है.’

जिंयां तिंयां किरिया करम पूरा सूरा करता थकां रमेस पचैरी रो बारो होयो. बेई सागी लोग भेळा होया जिका दाग री घड़ी हा, हां  रमेस पचैरी रै दूर रै रिस्तै मांय लागतो साळो गणेसी फर्रूखाबाद सूं आयग्यो हो. गंठीजेड़ै ठींगणै डील रै गणेसी रा  दांत कोडी सूं पीळा पड़योड़ा हा, पक्कै रंग रो गणेसी देखण मांय रेल्वे रो पेटवान लागतो हो अर बो हो ई. जरदै खैणी अर तास रो चासकू. मून मांय मस्त.

गरूड़ पुराण रो पाठ पूरो होग्यो अबै सवाल उठ्यो रमेस पचैरी रै मकान रो कांई हुवै? सरला अर विमला रै भविस रो के बणसी?

लोग गणेसी रै मुण्डै साम्ही जोवै हा,  सरला अर विमला डरयोड़ी हिरणी ज्यूं मन्नै तकै ही, म्हूं बान्नै देेखतां थकां देख्यो. सारो तकती अेक अबोली,  टाबरपणै री स्याणप सूं आस लगायोड़ी दीठ. बां दोनां रै बाई सागण ड्रेस पैरण नै ही जिकी बीं काळी अन्धारी रात ही, जद म्है तीनूं रमेस पचैरी री लास सारै आठ घण्टा तांई साथै बैठ्या रया हा. आभै वरणी कुड़ती अर धोळी सलवार, बिन्ध्योड़ै कानां मांय पतळी सींक अर छोटी-छोटी चोट्यां मांय लाल रिबन, पगां मांय काळी चपलां अर बस.., ओई बांरो हार सिणगार अर आई सज धज.

‘अबै तो मामै रै साथै ई जावणो पड़सी, क्यूं भाईजी ? और चारो ई के है ?’ अेक जणो सीधो ई मन्नै बोल्यो.

‘और करां भी के ?’ म्हारै सुर मांय उदासी सूं बेस्सी अणबस्सी ही.

‘अर ईं मकान रो कांई होसी ?’ कुण ई पूछ्यो, जिण रो ऊथळो मामै दियो अर जरदै री पिचकारी सी छूटगी ही ‘ इन्नै तो मन्नै बेचणो ई पड़सी’.

चाणचकै ई कुण ई सीधो म्हारै साम्ही सवाल राख्यो ‘सुभास, भाड़ै रै मकान  नै छोड’र तूं आं’रै साथै क्यूं नीं रैवै ? जित्तो भाड़ौ बठै देवै बीत्तै सूं आं छोरयां रो गुजारो हो जिसी.’

‘नीं नीं भई....., ओ नीं हो सकै..., म्हूं किंया..... कद तांई साम्ह सूं.....? मेरी आपरी गिरस्ती है, दुख दरद है.’

‘रमेस पचैरी थारो भायलो हो यार, पछै बींरी छोरियां थारी छोरी हुई का नीं ?’

‘ अर बेटी बणा’र नीं राख सकै तो भगवान री मैर सूं थारै  बरस चऊदा रो छोरो भी है अर सरला थारी जाणी पिछाणी है’

‘ ओ किंया....... नीं यार, ओ किंया हो सकै ? अेे सनाढ्य ब्राह्मण अर म्हे सरयूपारीण गोस्वामी, ओ नीं हो सकै.’

‘अंकल, म्हे कठैई को जावां नी, म्हानै थै राख लो, थारै खन्नै.’ सरला री आवाज जाणै किणी आंधै कुवै सूं आई ही जिकी म्है सुणी अर बड़ी मुस्किल सूं अणसुणी करदी.

म्हारै मांयलो डरयोड़ो आदमी साम्ही दीसतै बोझ सूं छुटकारो पावणो चांवतो कै चाणचकै सरला बोली ‘ अंकल पापा केवंता......कै बांरी नौकरी म्हानै मिल जिसी.’

‘ ना बेटी, ईं रै मांय तो भोत लम्बो बगत लागसी, अबार थूं आठवीं मांय पढै अर थान्नै अठा’रा बरस आंवता अजै पांच बरस और लागसी अर म्हारै सारू ओ पाॅसिबल नीं है कै पांच बरस तांई म्है....... पांच साल ताणी थारी निगै......., अर फेरूं मामोजी किसा पराया है ? आपणा है, थान्नै साम्ह ई सी.’

आस रा सगळा आडा ढकीजतां देख सरला रै मुण्डै सूं निसरयो ‘ ठीक है अंकल, म्है उड़ जिस्यां, मामोजी साथै उड़ जिस्यां.’ अर घर रै ताळो लगा’र सरला चाबी मामै नै झलाय दी जाणै आपणो भवीस बींरै हाथ सूंप्यो हुवै. ते’रा बरसां री टाबर इत्ती स्याणी कियां हो जावै, ओ म्हानै आठ बरस पैली ठाह लाग्यो हो. गणेसी री मुळक अर सरला री उदासी म्हूं आज तांइ नीं बिसरा सक्यो हूं.

अर आज सरला री मौत रो समचार पूग्यो है, अर म्हैं सोचूं हूं कै बींरी हत्या कुण करी ? रमेस पचैरी, का गणेसी अर का पछै बींरै सासरलां ? दुनिया री कोई कचेड़ी म्हानै हत्यारो बता’र हथकड़ी नीं पैराय सकै पण म्है सरला रो हत्यारो, आज भोत गैराई सूं सोच रयो हूं कै विमला अबार कठै होयसी ? कठैई बींरी हत्या रो इल्जाम ई म्हारै माथै नीं आवण आळो है ?
                                                                   *****


Wednesday, 29 April 2020

शिक्षक का ख़त

....सर, हमें हमारे बच्चों से कविता नहीं करवानी है हम तो बस यही चाहते हैं वह अपने पैरों के ऊपर खड़े हो जाएं. आप तो उन्हें बस खींचकर पढ़ाइए. कक्षा में टॉप होने चाहिए हमारे बच्चे. जरूरत पड़े तो दो लगाने में भी संकोच न करें, हम कोई उलाहना नहीं देंगे.

‘... माफ कीजिए, आपके बच्चे कविता कर भी नहीं कर पाएंगे.’
‘क्यों सर... ?‘
‘सुनने का समय हो, तो बताता हूं.’
‘कविता करने के लिए एक स्वच्छ और निर्मल ह्रदय चाहिए जबकि आप बच्चों में ऐसा मन विकसित होने ही नहीं देना चाहते. आपको भले ही अटपटा लगे लेकिन आप अपने बच्चों को एक इन्वेस्टमेंट के रूप में देख रहे हैं. अधिकांश मां बाप यही चाहते हैं कि उनके बच्चे बड़े होकर उनका आर्थिक सहयोग करें यानी इन्वेस्टमेंट के बदले उन्हें पूरी रिटर्न मिले. आपने अपना पूरा ध्यान बच्चे के नैसर्गिक विकास की बजाय अर्थ से जोड़ लिया है.

आप की यही सोच बच्चों का बचपन खा रही है. सच पूछो तो आपकी उम्मीद ने बच्चों के चेहरों से हंसी, आंखों से सपने, और मन से विश्वास छीन लिया है. आपके सपनों को पूरा करने के लिए उसे एक ऐसी अंधी दौड़ में धकेल दिया गया है जिसका अंत क्या होगा कोई नहीं जानता. आपके द्वारा अनायास ही किए जा रहे ऐसे व्यवहार से बच्चों में कर्कशता, कठोरता, कुटिलता और छल, छंद के साथ द्वंद की वृत्ति पनप रही है. इस वृत्ति ने बच्चों से कोमलता, मित्रवत व्यवहार और संवेदनशीलता को छिनने का काम किया है. यदि स्पष्ट शब्दों में कहूं तो आपका बच्चा एक उत्पाद बनने की ओर अग्रसर है जिस पर आप येन केन प्रकेरेण तथाकथित सफलता का टैग लगा हुआ देखना चाहते हैं.

खिलखिलाते, मुस्कुराते बच्चे सबको अच्छे लगते हैं लेकिन जरा सोचिए क्या हम अपने बच्चों को खुलकर हंसने का वातावरण दे पा रहे हैं ? क्या हम बच्चों को उनके प्राकृतिक स्वरूप के साथ आगे बढ़ने के अवसर प्रदान कर रहे हैं ? क्या हम बच्चों के मन को टटोलने का प्रयास करते हैं ?

कहने को आप हां भर सकते हैं लेकिन आप भी जानते हैं यथार्थ कोसों दूर है. सच्चाई तो यह है कि आपके पास इतना समय ही नहीं है कि बच्चे से उसके मन की बात कर लें. आपने बच्चों को सिर्फ वे सपने देखने की आजादी दी है जो कभी आपने अपने मन में पाले थे. आप यह भूल जाते हैं कि आपके सपने यदि पूरे न हो सके तो इसमें बच्चे का कुसूर नहीं है. प्राकृतिक रूप से उसे भी सपने देखने और उन्हें पूरे करने के भरपूर अवसर मिलने चाहिए. आपको तो उसका सहयोग करना चाहिए ना कि अपनी सोच और अपने सपने उस पर थोपने चाहिए. कभी खुद को उस बच्चे के स्थान पर रख कर देखेंगे तो आपको शायद एहसास होगा कि बालमन कैसा होता है. लेकिन व्यवसायिक आपाधापी के दौर में आप में ऐसा करने की हिम्मत बची ही नहीं है.

श्रीमान जी, एक शिक्षक का काम यह नहीं होता कि वह अपने विद्यार्थियों को रटंत तोता बना दे और किसी भी ढंग से शैक्षिक परीक्षाओं में 90ः से अधिक अंक लाने की कुटिल कला सिखा दें. यदि आपका बच्चा किसी नौसिखिए के सानिध्य में ये दोनों कलाएं सीख जाता है तो यकीन जानिए कि वह आपके सपने तो पूरे कर देगा लेकिन जिंदगी में सफलता से कोसों दूर हो जभेजिए. परन्तु उत्पाद सरीखे बच्चे बड़े होकर आपकी उम्मीदों पर खरे उतरें, इस उम्मीद को तो त्यागना ही पड़ेगा.ाएगा. सफलता के मायने सिर्फ रुपया पैसा और भौतिक संपदा अर्जित करना नहीं होता बल्कि एक ऐसा जीवन जीना है जो अपनी व्यवहार कुशलता और सादगी से सबके लिए प्रेरणादायी बने. माना कि रुपया पैसा जिंदगी के लिए जरूरी है लेकिन खुशियों के लिए तो मन के भाव स्वतः ही उमड़ते हैं जो किसी रुपए पैसे के मोहताज नहीं होते.

एक शिक्षक का काम शैक्षिक विषयों के साथ अपने विद्यार्थियों को जीवन जीने की कला सिखाना होता है. कदम-कदम पर उसका हौसला बढ़ाना और उसे प्राकृतिक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना शिक्षक का नियमित कार्य होता है. इसमें भी सबसे बड़ा काम उसे अपने विद्यार्थियों को संवेदना से भर देने का होता है जो उन्हें पशुता से मनुष्यता की ओर ले जाता है. इसी संवेदना से कविता जन्मती है जिसे गुनगुनाता तो पूरा संसार हैं लेकिन उसके सृजन का सुख बिरलों को नसीब होता है.

इसलिए माफ कीजिए श्रीमान, आपके बच्चे आपकी व्यवसायिक सोच के रहते कविता नहीं कर पाएंगे. हां उन्हें बेहतर उत्पाद बनाने के लिए स्कूल अवश्य भेजिए !

 -रूंख

Tuesday, 28 April 2020

फेसबुकिया सब्जी मंडी में चलिए ना !

फेसबुक एक सब्जी मंडी है जहां कभी-कभी आलू-प्याज भी डेढ़ सौ रुपए किलो बिक जाते हैं और कभी सेव संतरे धरे रह जाते हैं. इस बाजार का नियम है सब्जी हो या फल, बड़ी जल्दी बासी हो जाते है. बासी सब्जी और सड़े हुए फल खाना कौन पसंद करता है भला !

चैबीसों घंटे खुली रहने वाली इस फेसबुकिया सब्जी मंडी में आवारा पशुओं का होना भी स्वाभाविक है जो सब्जी और फलों की टोकरियों के साथ बाजार की गंदगी में मुंह मारते नजर आते हैं. इनमें गाय, गोधे, कुत्ते, बिल्लों के साथ गधे और खच्चर भी शामिल है. इनसे दुकानदार और ग्राहक दोनों परेशान रहते हैं. इस बाजार में कोई म्युनिसिपालिटी इन आवारा पशुओं को नहीं पकड़ सकती, उन्हें झेलना ही बाजार की मजबूरी है. 


इस मण्डी की एक और खासियत है. जब आम, संतरा, केला, किन्नू या फिर गोभी और मटर का सीजन होता है तो यहां चारों और एक जैसी चीजें दिखाई देती हैं. केले बिक रहे हैं तो सिर्फ केले ही केले, बैंगन आए हैं तो सिर्फ बैंगन ही बैंगन. 


इस बाजार में घूमते हुए शर्मा जी की मुलाकात वर्मा जी से हो जाती है तो अरोड़ा आंटी बाजार में ही मिसेज जैन से अपने सुख-दुख बांट लेती है. सिद्धार्थ और राहुल जैसे नौजवान भी अक्सर सब्जियों के थैले लिए दिख जाते हैं परंतु ये युवा चेहरे सब्जी मंडी में आई रिंकी और पिंकी द्वारा खरीदी जा रही चीजों की ओर ज्यादा ध्यान देते हैं, भले ही वो बेमौसम की ककड़ियां खरीद रही हों. मां ने सिद्धार्थ से भले ही भिण्डियां मंगवाई हो लेकिन वो बाबू तो ककड़ियों को बेहतर बताने के लिए कमर कस चुके हैं. कसे भी क्यों ना, आखिर रिंकिया की पसंद का सवाल है !


यहां कुछ लोग रोज मण्डी जाते हैं तो कई महीनों तक दिखाई ही नहीं देते. कुछ ऐसे भी है जो बाजार की भीड़भाड़ के कारण दूर से ही हाथ हिला कर बड़ी जल्दी निकलने की कोशिश करते हैं तो कई पकड़ कर ही बैठ जाते हैं, लाख छुड़ाने पर भी हाथ नहीं छोड़ते. 

कई रेहडी वाले इस बाजार की व्यवस्था बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ते और शाम ढलने से पहले चिल्ला-चिल्लाकर अपना माल बेच ही जाते हैं. कई चतुर खिलाड़ी साधुवाली के किन्नुओं को नागपुर के संतरे बताकर बेच देते हैं तो कई अपने आमों को मलिहाबादी साबित करने के लिए ग्राहकों से झगड़ा कर बैठते हैं. 

कभी-कभी लड़ाई इस कदर बढ़ जाती है कि बरसों पुराना ग्राहक एक झटके में संबंध तोड़ लेता है और उसकी दुकान पर कभी न चढ़ने की कसम खा लेता है. इस बाजार के कुछ दुकानदार डंडी मार कर तोलने से नहीं चूकते तो कई ग्राहक सब्जी के साथ धनिया और मिर्च मुफ्त उठाना अपना अधिकार समझते हैं. 


कुल मिलाकर इस सब्जी मंडी के नजारे देखने लायक हैं. आप और मैं चाहें तो अपना चेहरा भी इस मंडी में घूम रहे मनुष्य और पशुओं के किरदारों में ढूंढ सकते हैं. कोशिश कीजिए ना !

 -रूंख


Saturday, 25 April 2020

"आनंद थियेटर और एक साठ की टिकट"



पगडंडियों के दिन (8) - रूंख भायला

'किताबों में छपते हैं चाहत के किस्से
हकीकत की दुनिया में चाहत नहीं है
जमाने के बाजार में ये वो शह है 
कि जिसकी किसी को जरूरत नहीं...'

आनंद सिनेमा हनुमानगढ़

आनंद थिएटर ! जिसमें बजने वाले इस पहले गीत ने कस्बे के युवा दिलों को सपनों की रंगीनियों में जीने के अंदाज सिखाए थे. उसकी चर्चा कभी हर नुक्कड़ पर हुआ करती थी. मनोरंजन की दुनिया का बेताज बादशाह बना 'आनंद सिनेमा' हनुमानगढ़ जंक्शन में वाकई आनंद का सागर बन अवतरित हुआ था. हालांकि थिएटर तो 'दिनार सिनेमा' और 'विजय टॉकीज' पहले से ही खुले हुए थे लेकिन वे हनुमानगढ़ टाऊन में थे जो किसी दूसरे कस्बे की तरह 5 किलोमीटर दूर स्थित था.

1978 में रिलीज हुई त्रिशूल फिल्म का यह गीत जब आनंद थिएटर के सिनेमास्कोप पर्दे पर पहले दिन, पहले शो में चल रहा रहा था तो पूरे टाउन-जंक्शन में उस दिन चारों ओर एक ही चर्चा थी- 'आनंद थेटर चालू होग्यो.' बॉलीवुड के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के जलवे उन दिनों चरम पर थे लिहाजा आनंद थिएटर के शुभारंभ के लिए उनकी नई रिलीज हुई फिल्म 'त्रिशूल' लगाई गई. थिएटर संचालकों द्वारा पहले दिन के पहले शो की पहली टिकट खरीदने वाले दर्शक को पुरस्कार स्वरूप हाथ घड़ी भी पहनाई गई थी. उन दिनों टिकट खिड़की में हाथ डालकर टिकट लेना भी जंग जीतने के बराबर हुआ करता था. पहली बार फिल्म देखने आए नौसिखियों के हौंसले तो टिकट खिड़की के आगे लगी लंबी-लंबी कतारों से ही पस्त हो जाते थे. उस समय टिकटों के ब्लैक का माहौल कम ही देखने को मिलता था.

उन दिनों डॉल्बी सिस्टम और डिजिटल पीवीआर का जमाना नहीं था बल्कि फिल्में कैमरा रीलों पर बना करती थी. फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर द्वारा इन कैमरा रीलों के बड़े-बड़े रोल लोहे के एक बक्से में रखे जाते जिसे फिल्म की पेटी कहा जाता था. एक फिल्म में छ: से नौ रोल तक हुआ करते थे. आज के दौर में जब हम एक पेन ड्राइव में 10 फिल्में इकट्ठी डाल सकते हैं तो कल्पना कीजिए कि वह कैसा दौर रहा होगा जब फिल्म की एक पेटी में 40 से 50 किलो तक का वजन होता था. इन सीलबंद पेटियों को रेलवे की माल परिवहन सेवा द्वारा पूरे देश में भिजवाया जाता था जहां से ये थिएटर तक पहुंचती थी. ह3नुमानगढ़ जंक्शन रेलवे स्टेशन पर जब नई फिल्म की पेटी उतरती तो हमें ही सबसे पहले पता चलता कि कौन सी फिल्म लगने वाली है. 

...तो आनंद सिनेमा खुलने से हनुमानगढ़ जंक्शन वालों के पास भी अकड़ने का एक मुद्दा हो गया जो टाऊन वालों को समय-समय पर नीचा दिखा ही देता. जब कभी रिलीज होने वाली कोई चर्चित फिल्म दिनार सिनेमा और विजय टॉकीज की बजाए आनंद थिएटर में लगती तो टाऊन वाले फिल्मी रसियों को जंक्शन आना ही पड़ता. आनंद थिएटर के निकट भट्टा कॉलोनी, लोको, रेलवे कॉलोनी और पुरानी खुंजा पड़ती है जहां से लोग पैदल ही फिल्म देखने आ जाते थे. बाकी लोगों को आनंद थिएटर पहुंचने के लिए टैंपू का सहारा लेना पड़ता था. निजी वाहन कहां हुआ करते थे उन दिनों !

थियेटर में बजती सीटियां
 
थिएटर में फिल्म शुरू होने के बाद जब कोई दरवाजा खोलता तो पूरा थिएटर एक साथ चिल्लाता- 'बंद करो, टैम सर कोनी आइजै के.' गेटमैन अंधेरे हॉल में अपनी टॉर्च के सहारे देरी से आने वालों को सीट पर बिठा देता. परदे पर चल रही फिल्म में मारधाड़ वाले सीन पर पूरा हॉल पब्लिक की सीटियों से गूंज उठता. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच हीरो जब विलेन को पछाड़ता तो सबमें तेज सिटी बजाने की होड़ लग जाती. उंगलियों को मुंह में दबाकर सीटी बजाने की यह कला सबके पास नहीं थी. इसे सीखने के लिए हम जैसे नौसिखिए उस जमाने के महारथी गुरुओं के चरणों में बैठा करते थे. सीखने की प्रक्रिया में लगन न होने के कारण हमारे होठों से अक्सर फूंक ही निकला करती थी. जीवन के लंबे रास्ते पर ठोकरें खाने के बाद आज गुरुओं की सीख समझ आई है कि हर काम में मन की लगन जरूरी है.

हाई स्कूल में पढ़ने वाले हम दोस्त अक्सर आनंद थिएटर में फिल्म देखने जाया करते थे. कई बारी यह सौभाग्य हेडमास्टर भंवरु खान जी की मार से बचने के लिए या फिर राम नारायण गुरु जी के विशेष अनुग्रह से भी प्राप्त होता था. 10:00 से 4:00 के स्कूल टाइम में फरार होकर 12:00 से 3:00 का शो देखने का आनंद सिर्फ आनंद थिएटर में ही मिल सकता था. उन दिनों टिकट भी क्या लगती थी. एक रूपया 40 पैसे और एक रूपया 60 पैसे. आपको पता ही है कि बालकनी और बॉक्स में बाल सुलभ चंचल मन कहां बैठ पाता है ! 

ऐसी ही एक फिल्म 'तुम पर हम कुर्बान' स्कूल टाइम में दोस्तों के साथ देखी थी जिनमें संजय गुप्ता, राधेश्याम सोनी, आनंद तिवाड़ी, कुलविंदर, तेजेंद्रपाल, जाकिर, बलजीत पन्नू, सुभाष आदि शामिल थे. बिना वर्दी पहने स्कूल आने के कारण हेडमास्टर भंवरुखां जी सब को पहले मुर्गा बनाया और फिर दो-दो तल्लड़ का प्रसाद देकर घर रवाना कर दिया था. और हम पढ़ेसरी घर पहुंचने की बजाय जा पहुंचे थे आनंद थिएटर ! सब ने बड़ी मुश्किल से पैसे इकट्ठे कर टिकट खरीदी थी. टिकट खिड़की वाले ने शायद तरस खाकर स्टूडेंट कंसेशन भी दे दिया था. विद्यार्थियों की जेब में पैसे कहां हुआ करते थे उन दिनों ! संजय गुप्ता तो बहुत दिन तक इस फिल्म में लड़की द्वारा बोले जाने वाला डायलॉग स्कूल में बोलता रहता था - 'तो वो तुम थे !' 

स्कूल के दिनों में एक नियम और हुआ करता था. परीक्षा समाप्त होने वाले दिन सारे विद्यार्थी थिएटर में मिला करते थे. उन्हीं दिनों टाऊन-जंक्शन के बीच में आशीष थिएटर भी शुरू हो गया था. परीक्षा देने से पूर्व ही तय कर लिया जाता कि कौन सी फिल्म देखेंगे. घर पर भी पता होता कि आज लाडेसर फिल्म देखने गए हैं. बहुत बार ऐसा भी हुआ कि आज फिल्म विजय थिएटर में देखेंगे. और देखते ही देखते मित्रों का समूह भगत सिंह चौक से विजय थिएटर की तरफ पैदल ही दौड़ रहा होता. मस्ती का आनंद लेने के लिए दुर्गा कॉलोनी के मित्र भी जेब में पैसे होने के बावजूद इस पैदल दौड़ में शामिल हो जाते. रास्ते में कोई ऊंट गाडा या ट्रैक्टर मिल जाए तो आपकी किस्मत, नहीं तो खेतों के नजारे देखते हुए बात ही बात में थिएटर पहुंच जाते. 

उन दिनों एयर कंडीशनर का तो नाम भी पता नहीं था. हां, थिएटर्स में कूलर हुआ करते थे. मुझे याद है कि भट्टा कॉलोनी के बहुत से मित्र और उनके बड़े भाई तो गर्मियों के उमस भरे दिनों में एक साठ की टिकट खरीद कर आनंद थिएटर के रात के शो में कूलर के आगे सोने के लिए जाया करते थे. इनमें अशोक भाईसाहब, भगवानदास भाईसाहब, राजेंद्र भाईसाहब, राधेश्याम, विनोद, जगमाल, और राजू आदि शामिल थे.

जगमाल भाई, जिनका कुछ दिनों पहले एक दुर्घटना में देहांत हो गया, की एक बात अक्सर मुझे याद आती है. वे फिल्मों के बड़े रसिया थे और आनंद सिनेमा में लगने वाली हर फिल्म देखते थे. गर्मियों के दिनों में तो रात 9 से 12 का शो लगभग पक्का था. मैं उनसे जब किसी फिल्म के बारे में पूछता-

'भाई फिल्म कैसी है ?'

उनका जवाब होता-

'एक बार देखने लायक तो है.'

मैं जब इस बात पर हंसता तो वे दार्शनिक अंदाज में कहते-

'यार टोनी, फिल्म बनाने वाले ने कितनी मेहनत और रूपया लगाकर फिल्म बनाई है, क्या हमारा फर्ज नहीं बनता कि हम सिर्फ एक रूपया साठ पैसा खर्च कर उस फिल्म को देखने तो जाएं.'

और मैं निरुत्तर हो जाता. उत्तर तो मुझे आज भी नहीं मिलता जब मैं समय के प्रहार से उजड़कर वीरान हुए आनंद थिएटर के आगे से कभी गुजरता हूं. एक पल को लगता है कि खचाखच भरे हुए इस हॉल में गूंजती सीटियों को सुन सिनेमास्कोप परदे पर थिरकते सारे किरदार जीवंत हो उठेंगे लेकिन अगले ही पल दिमाग के किसी कोने में गीत भरता है-

कल चमन था, आज एक सहरा हुआ 
देखते ही देखते हुए क्या हुआ.....!
-रूंख

Thursday, 16 April 2020

मिसेज कोरोनी ( व्यंग्य कथा)


( व्यंग्य कथा)
'खबरदार, जो घर में पैर रखा, जहां से आए हो वही चले जाओ.'

मिसेज कोरोनी ने तमतमा कर कहा.

'डार्लिंग, दरवाजा तो खोलो'.

कोरोना रिरियाता हुआ बोला.

'मर गई तुम्हारी डार्लिंग, दगाबाज वायरस, चार दिन आदमी के साथ क्या रह लिए, रंग दिखाने लगे.'

कोरोनी के स्वर में बहुत ज्यादा गुस्सा झलक रहा था.

'मेरी प्यारी कोरोनी, आखिर बात क्या है ? मैं इतने दिन बाद घर लौटा हूं. प्रिये, मुझे भीतर तो आने दो.'

बेचारे मिस्टर कोरोना घर के बाहर लाचार खड़े थे. आधी रात को मि. कोरोना के घर से आ रही आवाजों को सुनकर 'वायरस सोसायटी' के लोग जाग गए थे. मिसेज एनाफिलीज ने सबसे पहले अपना दरवाजा खोला था. उसके बाद दूसरे घरों के दरवाजे भी खुलने लग गए थे और सब मि. कोरोना की दुबली हालत देख रहे थे. दो पैग लगाकर अभी-अभी सोए स्वाइन फ्लू वायरस ने तो मन ही मन मि. कोरोना को दो गालियां दे डाली जिसकी वजह से सारा नशा काफूर हो गया था.

"डार्लिंग, दरवाजा खोलो ना प्लीज ! देखो, सोसाइटी के दूसरे लोग देख रहे हैं, मेरा तमाशा बन रहा है.'

मि. कोरोना की हालत देखने लायक थी.

अचानक दरवाजे की सिटकनी सरकने की आवाज सुनाई दी तो मि. कोरोना की जान में जान आई.

'मुझसे बात मत करो.' मिसेज कोरोनी ने दरवाजा खोलते हुए कहा. उनके गाउन की डोरियां भी गुस्से से अकड़ी हुई थी.

सॉरी, मुझे आने में देर हो गई. जूनियर सो गया क्या ? और बताओ, तुम नाराज क्यों हो डार्लिग ? कोरोना ने उखड़ी हुई पत्नी के मक्खन लगाते हुए भारी सा बैग एक तरफ रख दिया.

कोरोनी मुंह फुला कर धम्म से सोफे पर बैठ गई.

"ये देखो, तुम्हारा पति पूरी दुनिया में डंका बजाकर आया है. क्या अखबार, क्या टीवी, क्या अमेरिका और क्या चाइना ! सबकी वाट लगा दी है मैंने.'

कोरोना ने बैग से कुछ नामी-गिरामी अखबार निकाल कर कोरोनी के सामने टेबल पर फैला दिए. सारे अखबारों में कोरोना का नाम छाया हुआ था.

कोरोनी ने सरसरी नजर अखबारों पर डाली और गुस्से से तमतमाती हुई रसोई में घुस गई. कोरोना उम्मीद कर रहा था कि वह पानी का गिलास लाने गई है. कोरोनी लौटी तो उसके हाथ में चिमटा था. कोरोना को लगा वह मजाक कर रही है. वह खिसियानी सी हंसी हंसता हुआ बोला-

'डार्लिंग, अब गुस्सा थूक भी दो.'

कोरोनी में अचानक उसकी गर्दन को दबोच लिया और चिमटे से कोरोना की नाक पकड़ ली.

'तुम्हें शर्म तो नहीं आई अकेले अपना नाम टीवी और अखबार में देखकर ? मेरे बिना तुम्हारा डंका कैसे बज गया  ? आज मैं तुम्हे दिखाऊंगी डंका कैसे बजता है !'

कोरोनी ने गुस्से में चिमटे को दो-तीन बार जोर से झटका दिया. बेचारा कोरोना अपनी गर्दन और नाक छुड़वाने की कोशिश कर रहा था लेकिन शेरनी बनी कोरोनी ने उसे नीचे पटक लिया और उसकी छाती पर बैठ गई. दो घूंसे खाने के बाद अब कोरोना पूरी तरह से उसके कब्जे में था.

'ओ हो, अरे, मुझे छोड़ो तो सही, क्या करती हो मेरा दम घुटा जा रहा है. भई, मैंने कौन सा इंटरव्यू दिया है, किसी चैनल या अखबार वाले को ! तुम्हें तो पता ही है मीडिया आजकल कितना झूठ बोलता है. हाय, कमबख्तों ने मुझे बिना बात पिटवा दिया.'

कोरोना के दबे हुए नाक के कारण बड़ी मुश्किल से बोल फूटे.

कोरोनी ने उसके मुंह पर दो घूंसे और जड़ दिए.

"मिसेज एनाफिलीज ठीक ही कहती थी. 'बहन, काम अपने करें और नाम इनका हो' ये इन पुरुषों की घटिया मानसिकता है.' एनाफिलीज तो चतुर निकली जो समय रहते उसने मलेरिया में अपना नाम रोशन कर लिया. मुझे देखो कहीं एक जगह पर भी मेरा नाम आया है जबकि मैैं तुम से कहीं दुुगुना काम करती हूं ?'

कोरोनी ने चिमटे से कोरोना का नाक फिर चंचेड़ा. कोरोना की हालत देखने लायक थी। नाक बंद और गर्दन बीवी की मुट्ठी में. मुंह से सांंस लेेते हुए उसे साक्षात रौरव नरक के दर्शन हो गए थे. आखिर कोरोनी ने एक झटके से उसे पटक दिया. अब वह.फर्श पर पड़ा दर्द केे मारे कराह रहा था.

'... सुनो, चुपचाप ये मुकुट भी उतार दो. तुम इसके लायक ही नहीं हो'.


कोरोनी का गुस्सा सातवें आसमान पर था. बेचारा कोरोना समझ ही नहीं पा रहा था कि वह अपनी गर्दन सहलाए या नाक से बहता खून पौंछे. उसे नारी शक्ति का पता लग चुका था. उसे पक्का भरोसा था कि जरूर मिसेज एनाफिलीज ने ही सीधी-सादी कोरोनी के कान भरे हैं. लेकिन आज कोरोनी अपना बदला लेने पर उतारू थी. इसलिए उसने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी.

'हूं, तो तुमने इंटरव्यू नहीं दिया था किसी को. वो खुद ही धड़ाधड़ तुम्हारा नाम छाप रहे थे, है ना ! घाघ आदमी, तुमने इस खबर का खंडन क्यों नहीं किया, मीडिया को बताया क्यों नहीं कि मैं तुम से कहीं ज्यादा खतरनाक हूं.' कोरोनी ने चिमटा बजाते हुए कहा.

'मुझे मौका ही कहां मिला, मैं तो अपने काम में व्यस्त था. तुम अगर कहो तो मैं अभी विज्ञप्ति जारी कर सबको भिजवा देता हूं और कोविड-19 का पूरा श्रेय तुम्हारे नाम कर देता हूं.' कोरोना लहूलुहान नाक को सहलाते हुए दबी जबान में बोला.

'वो तो तुम्हें करना ही होगा. आज के बाद तुम्हारा मुकुट भी मैं ही पहनूंगी और तुम विज्ञप्ति देने के बाद सीधे लौट कर घर आओगे. अब से घर के साथ-साथ जूनियर को संभालने की जिम्मेदारी भी तुम्हारी है. दुनिया को मैं संभालूंगी.' कोरोनी ने अपना आदेश सुनाया.

'ठीक है मेरी मां ! तुम जीती और मैं हारा.'
कोरोना ने हथियार डाल दिए.

'...और सुनो, विज्ञप्ति में साफ-साफ लिख दो कि अब पृथ्वी पर मिसेज कोरोनी आ रही है. मुझे सारे आदमी घर पर काम करते हुए दिखने चाहिए अगर कोई सड़क पर घूमता दिखा तो उसे वहीं इतना पीटूंगी कि पुलिसिया मार भूल जाएगा.'

घायल नागिन सी फुफकारती हुई मिसेज कोरोनी फैसला कर चुकी थी. मार खाए हुए मि. कोरोना ने रसोई में जाकर खूद पानी पिया और मीडिया को कोसते हुए एक बार फिर मीडिया के लिए ही लेटर पैड पर विज्ञप्ति बनाने बैठ गए.

- 'रूंख'









रेलवे रामलीला क्लब के रंग


पगडंडियों के दिन (7 ) - रूंख भायला

'बोल सियापति रामचंद्र की जय'

जय.....' . दर्शकों की आवाज गूंजती.

'पांच रूपये लीलाशंकर, दो रूपये हरनेक सिंह, पांच रूपये गुलाम नबी रावण के रोल पर खुश होकर रामलीला को भेंट करते हैं, भगवान उनकी मनोकामना पूरी करें.

चिरंजी परमार ! रेलवे रामलीला क्लब के स्थाई एंकर, जब स्टेज पर माइक थामे अगले सीन की उद्घोषणा करते तो पूरा दर्शक समूह क्लब के प्रांगण को तालियों से गुंजायमान कर देता. चिरंजी चाचा जी के पास कार्यक्रम संचालन का शानदार अनुभव था जो उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाता था. आज जब भी भीड़ भरे किसी आंदोलन अथवा स्टेज पर मुझे मंच संचालन करना पड़ता है तो मेरे भीतर कहीं ना कहीं चाचाजी से प्रेरित आत्मविश्वास का रंग स्वतः ही जाग उठता है. रेलवे के छोटे क्वार्टर्स में वे हमारे पड़ोसी हुआ करते थे. उनका लड़का प्रद्युमन परमार, जो बार संघ हनुमानगढ़ का अध्यक्ष रह चुका है, मेरे बचपन के मित्रों में सबसे मस्त-मौलड़ हुआ करता था, .

रेलवे अथॉरिटी द्वारा स्टेशन और लोको शेड के बीच में रेलवे क्लब बनाया गया था जो उस समय रेलकर्मियों के मनोरंजन का एकमात्र केंद्र हुआ करता था. क्लब में रामलीला स्टेज के अलावा दो बड़े लॉन थे जिनकी पश्चिमी दिशा में गुलाबी कनेर लगी हुई थी. इन लॉन में बच्चों के झूले और फिसलनी भी थी. स्कूल से आने के बाद रेलवे कॉलोनी के अधिकांश बच्चे क्लब में खेलते और झूलते रहते. शाम के वक्त क्लब में ताश खेलने वाले रेलकर्मियों का जमावड़ा रहता. 'सीप' उन दिनों ताश का प्रसिद्ध खेल था जो शायद आज भी अपना प्रभाव बनाए हुए है. सुरापान के बाद गाली गलौज के अनोखे दृश्य मैंने पहली बार क्लब में ही देखे थे. क्लब की पूर्वी दीवार से सटा हुआ एक बेरी का पेड़ हुआ करता था जिस पर भूत होने की बात उन दिनों चर्चा में होती थी. रामलीला के दिनों में बच्चे सांझ ढलने के साथ ही बैठने के लिए बोरियां और लकड़ी के पट्टे लेकर रामलीला क्लब की तरफ चल पड़ते. पहले पहुंचने वाले अग्रिम पंक्ति में सीट रोक कर बैठ जाते और लेटलतीफों को पीछे खड़ा रहना पड़ता.

आइए, इस रामलीला क्लब के किरदारों से कुछ परिचय कर लें. फायरमैन श्री इंदरसेन वालिया, जब रावण के रोल में स्टेज पर सीता हरण का सीन करने उतरते तो स्टेज थरथराने लगता. इतना जीवंत अभिनय कि दर्शक बंध कर रह जाते. रामजी का किरदार श्री चंद्रभान निभाते और श्री जगदीशचंद्र लक्ष्मणजी बना करते थे. राम बने चंद्रभान जी की मुस्कुराहट के सामने मुझे अरुण गोविल की मुस्कान भी फीकी लगती है. श्री बनवारी लाल दशरथजी का अभिनय किया करते थे. रामलीला मंचन के दौरान हुई एक दुर्घटना भी कुछ-कुछ याद आती है जब देवी का रोल कर रहे छाजू राम अंकल जी के करंट लगा और उनका असामयिक निधन हो गया. इस हृदय विदारक दुर्घटना के अगले साल रामलीला का मंचन नहीं हुआ. अगले कुछ सालों तक श्री मुलखराज भी राम का शानदार अभिनय करते रहे. उनके साथ श्री प्रेम दायमा, जो प्रथम श्रेणी के ड्राइवर बन गए थे, ने कुछ साल हनुमान जी और उसके बाद लक्ष्मणजी की भूमिका निभाई. उनके पिता श्री बृज लाल दायमा कलाकारों का मेकअप किया करते थे और स्टेज साज-सज्जा का जिम्मा संभालते थे.

रामलीला के इसी स्टेज से उभरने वाले दो कलाकारों का जिक्र किए बिना बात पूरी हो ही नहीं सकती. गोविंद अकेला और बिल्ला भाई साहब ! कहने को तो 'नकलिए' थे लेकिन सच पूछिए तो पूरी रामलीला का आकर्षण और तालियां तो गोविंद और बिल्ला भाई साहब के छोटे-छोटे कॉमेडी से भरपूर नाटक ही लूट कर ले जाते. सीमांत अंचल के साहित्यिक फलक पर मुक्तिबोध से चमकते अग्रज प्रमोद कुमार शर्मा भी उन दिनों गोमदिया भाई साहब की टीम के चिर परिचित नकलिए थे. गोविंद भाई साहब राजस्थानी के कॉमेडी किंग हुआ करते तो बिल्ला भाई साहब अपनी शानदार पंजाबी कॉमेडी से दर्शकों को लोटपोट कर डालते. मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि कपिल शर्मा, राजू श्रीवास्तव जैसे फूहड़ लाफ्टर अभिनेता उनकी जूती की भी होड़ नहीं कर सकते.

रेलवे क्लब रामलीला के कुछ सीन तो दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे. ताड़का वध, सीता स्वयंवर, लंका दहन और देवी का सीन देखने तो पूरा लोको, गांधीनगर, आरसीपी कॉलोनी के साथ दुर्गा कॉलोनी के लोग भी पहुंचते. दुर्गा कॉलोनी में भी उन दिनों रामलीला मंचन हुआ करता था लेकिन रोमांच हमेशा कल्ब की रामलीला में ही बना रहता. अहिरावण के पाताललोक में जब देवी का सीन होता तो माहौल अत्यंत डरावना लगता. राम-लक्ष्मण जी पाश में बंधे हुए देवी के आगे पड़े हैं और राक्षस मदिरापान कर नृत्य के साथ देवी रिझा रहे हैं. 1980 में आई शान फिल्म का गीत
'यम्मा यम्मा, यम्मा, यम्मा, ये खूबसूरत समां, बस आज की रात है जिंदगी, कल हम कहां, तुम कहां...' जब अंधेरे और मध्यम प्रकाश के बीच बजता तो दर्शक सांस रोक कर बैठ जाते.

आज जब कोरोना लॉकडाउन के चलते रामानंद सागर की रामायण देशभर में प्रसारित हो रही है तो मुझे बचपन के राम आनंद के सागर किनारे लेकर खड़े हैं. क्लब की रामलीला के किरदारों की उपस्थिति में राम की वेशभूषा धरे चंद्रभान अंकल जी बार-बार मुझसे पूछते हैं -

'क्या टिकटोक और आभासी दुनिया के बीच तुम भी नहीं लिखोगे हमारी राम कथा !

'रूंख'


बड़ा स्कूल, बड़ी-बड़ी बातें !



पगडंडियों के दिन (6) - रूंख भायला

हाई स्कूल के दिन भुलाए नहीं भूलते. जिन लोगों ने हाई स्कूल में नियमित विद्यार्थी के रूप में कक्षाएं लगाई हैं, उनके जेहन में आनंद और अनुभव का दरिया निरंतर बहता है. मस्ती भरे माहौल में यह वह दौर होता है जब आदमी में सीखने की प्रक्रिया और ललक सर्वाधिक होती है.

किशोरावस्था की आनंददायक स्मृतियों में डुबकी लगाना खजाना पाने से कम कहां ! 
तो आज एक बार फिर, मैं पाठक मित्रों को यादों के बहते दरिया में डूबोने के लिए ले चलता हूं.

'हे प्रभु आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए शीघ्र सारे 'गुरुजनों...सॉरी दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए..'

हाई स्कूल में प्रार्थना बोलने का जिम्मा हमारे ऊपर था. मैं, राधेश्याम सोनी, छोटेलाल राही, संजय गुप्ता और जसपाल उर्फ 'पाला' में से कोई तीन छात्र स्टेज पर होते तथा सामने लगभग 800-900 विद्यार्थियों की फौज खड़ी रहती. प्रार्थना स्थल पर कई दोस्त मजाकिया अंदाज में प्रार्थना में प्रयुक्त शब्द 'दुर्गुणों' की जगह 'गुरुजनों' का प्रयोग करते थे जिसकी गूंज सिर्फ़ स्कूल के सदाबहार पीटीआई मिराजुद्दीन जी सुन सकते थे. सुनने के बावजूद उसे अनसुना कर देना उनकी खासियत थी.

80 के दशक में हनुमानगढ़ जंक्शन के इस एकमात्र गवर्नमेंट बॉयज सेकेंडरी स्कूल, जो 'बड़ा स्कूल' और 'हाई स्कूल' के नाम से प्रसिद्ध था, में शहर के लगभग 75% विद्यार्थी पढ़ते थे. यहां मक्कासर, जंडांवाली और सतीपुरा आदि गांवों से भी विद्यार्थी आते थे जिनमें से कईयों की कद काठी गुरूजनों के समान ही थी. छठी कक्षा से प्रारंभ होने वाले इस हाई स्कूल में कला विज्ञान और वाणिज्य के तीनों संकाय थे. शहर की लड़कियां बाजार में स्थित राजकीय बालिका सेकेंडरी स्कूल तथा नेहरू स्मृति स्कूल में पढ़ा करती थी. नेहरू स्कूल सह शिक्षा का था लेकिन उसके बावजूद दुर्गा कॉलोनी स्थित व्यापारी वर्ग के ज्यादातर लड़के बड़े स्कूल में ही आते थे. सीधा सा कारण था बड़े स्कूल जैसी मस्ती और कहां !

हमारी पढ़ाई के दौरान बड़े स्कूल में श्री भंवरू खां जी हेड मास्टर थे. जब वह प्रार्थना स्थल पर होते तो सबकी घिग्गी बंधी रहती. विद्यालय स्टाफ भी अलर्ट रहता. मिराजुद्दीनजी प्रार्थना शुरू होने से पहले ड्रम बजाते और पुरजोर आवाज में आदेश देते- 'लेट कमर्स अलग लाइन'. विदाउट ड्रेस भी बाहर आ जाएं.' सफेद शर्ट और खाकी पेंट जिस दिन भूल जाते, नानी याद आना स्वाभाविक था. प्रार्थना खत्म होते ही हेड मास्टर साहब की आवाज गूंजती- 'भूरा....'
और विद्यालय का सबसे खतरनाक आदमी तुरंत उत्तर देता- 'जी साहब !'
चफरासी भूराराम हेडमास्टर साहब का खास आदमी था और सारी खबरें रखता था. वह हेड मास्टर साहब के सांकेतिक आदेशानुसार तुरंत उन्हें छड़ी थमा देता. हेड मास्टर साहब की फिर आवाज गूंजती- 'लेट कमर्स और विदाउट ड्रेस वाले सारे मुर्गे बन जाओ'.
मुर्गा बनने के बाद कमबख्त दुनिया उल्टी दिखने लगती थी. कुछ अनुभवी मुर्गों के लिए तो यह हंसी खेल था लेकिन कभी-कभी मुझ जैसे नए मुर्गे फंस जाते तब जान गले में आ जाती. 
'हरपाल जी, डूडी जी, प्रसाद शुरू करो.'
...और एक तरफ से हेड मास्टर साहब खुद शुरू हो जाते. सबको कमोबेश दो-दो फदीड़ का प्रसाद मिलता जिसकी मिठास लगभग पहले पीरियड तक चलती. 

विद्यालय के सबसे मस्त शिक्षकों में मदन लाल जी पुरोहित थे जो चूंठिए का प्रसाद देते थे. उनके साथ भावनात्मक जुड़ाव तो आज की श्रद्धा के साथ कायम है. अन्य गुरुजनों रामनारायण जी, उग्रसेन जी, जसवंत सिंह जी, हरपाल सिंह जी, डूडी जी, भूषण लाल जी, श्यामसुंदर जी बवेजा और नए आए स्वयंप्रकाश जी के पढ़ाने का अंदाज भी निराला था. हिंदी पढ़ाने वाले राम नारायण जी जब मूड में होते तो आधी छुट्टी बाद बच्चों को कहते -

'लाडी, आनंद सिनेमा में धर्मेंद्र गी फिल्म लागेड़ी है. देख आओ, पढ़ तो फेर ई लेया.' 
ऐसा कहकर एक बच्चे को बैग समेत कमरे के दरवाजे पर भेजते. परंतु उस बच्चे के गेट पर पहुंचने से पहले ही आवाज लगाते 
'अरे रुक, एक नै सागै और लेज्या, टैम भोत खराब है. फिर कहते- एक'र रुक. मैं देखूं गैलरी में भूरो तो कोनी.'

उस समय हाईस्कूल के चारदीवारी नहीं थी. रामनारायण जी एक-एक कर पूरी क्लास को खाली करवाने की कला जानते थे. मन होने पर कभी-कभी कहते-
'आज भई, पढस्यां.'

पीटीआई मिराजुद्दीन जी बड़े रसिया आदमी थे. एक लंबे समय तक उन्होंने 15 अगस्त और 26 जनवरी के सरकारी आयोजनों में पीटीआई और संचालक की भूमिका निभाई थी. उन दिनों पूरे हनुमानगढ़ में राष्ट्रीय दिवस पर एक ही आयोजन होता था जो अक्सर राजकीय बालिका विद्यालय में हुआ करता था. शहर के हर विद्यालय के विद्यार्थी इस अवसर पर पीटी, परेड और सांस्कृतिक आयोजनों में भाग लेते थे. ऐसे कार्यक्रम ऐसे कार्यक्रमों के लिए मिराजुद्दीन जी स्कूल की टीम को हारमोनियम पर गीत संगीत की तैयारी करवाते थे. इस आयोजन में स्टेज पर अक्सर एक लड़के को बीच में खड़ा कर दिया जाता और दोनों तरफ चार-चार लड़कों को खड़ा कर दिया जाता. हमें गाने के मुताबिक एक्शन करने होते. एक्शन मैं गलती होने पर मिराजुद्दीन जी सबको 'नालायकों' कहकर बहुत चिल्लाते. गाने में प्लेबैक सिंगिंग का काम छोटेलाल राही, राधेश्याम सोनी व जसपाल का होता. उन्हीं दिनों मिथुन चक्रवर्ती की फिल्म 'प्यार झुकता नहीं' आई थी जिसके हिट गीतों की तर्ज पर छोटे लाल के भाई वेद राही ने कुछ देशभक्ति गीत लिखकर दिए थे. उनमें से एक गीत 'चाहे लाख तूफान आए, चाहे जान भी अब जाए, देश पे होंगे कुर्बान ..' हमनें स्वतंत्रता दिवस पर चिल्ड्रन स्कूल, हनुमानगढ़ टाउन में प्रस्तुत कर प्रथम पुरस्कार जीता था. उस दिन हमारे साथ-साथ मिराजुद्दीन जी बहुत खुश हुए थे. इसका कारण था कि प्राइवेट स्कूलों की प्रतिस्पर्धा के बीच में हमने अपने हाईस्कूल की धाक जमाई थी.
आज जब बच्चों को पीली बसों और टैक्सियों में स्कूल जाते देखता हूं तो मुझे हाई स्कूल का कैंपस याद आता है जहां अधिकतर बच्चे पैदल या कुछ एक साइकिलों पर आया करते थे. अब तो कुछ स्कूल्स में कैंटीन भी खुल गई है लेकिन हाई स्कूल में तो आधी छुट्टी के समय रेहड़ी वाले की मोठ चाट या गुड़ की पापड़ी सबसे बढ़िया स्नैक्स हुआ करते थे.

ऐसी यादों को संजोने वाला हनुमानगढ़ का 'हाई स्कूल' आज आईटी सेंटर और सीनियर सेकेंडरी स्कूल बन चुका है. इस स्कूल के चारों और विशालकाय चारदीवारी भी बन गई है जहां बड़े-बड़े पेड़ झूमते हुए नजर आते हैं. मैं जब भी वहां से गुजरता हूं स्वत: ही मेरा सिर इस अनूठे शिक्षा मंदिर की ओर झुक जाता है.




अखबार के ज़माने में दसवीं का रिजल्ट !


पगडंडियों के दिन (5)

आज गुजरे जमाने में दसवीं का रिजल्ट और उसे अखबार में ढूंढने की कला पर बात करते हैं.

... आज भले ही दसवीं बोर्ड का एग्जाम आसान लगता हो लेकिन 80 के दशक में इसे पास करना विद्यार्थियों के लिए एक चुनौती हुआ करता था. आज स्कूल द्वारा दिए जाने वाले 20 प्रतिशत सेशनल मार्क्स की वजह से बच्चों के नंबर 80-90% के करीब पहुंच ही जाते हैं लेकिन उस समय 60% से पास होना ही स्कूल और दोस्तों में आपकी इज्जत बढ़ा देता था. पास होना आपकी योग्यता का प्रमाण था तो फर्स्ट डिवीजन आने का मतलब आप में कुछ खास काबिलियत थी.

आजकल तो परीक्षा परिणाम आने के चंद मिनट बाद ही आप अपना परिणाम इंटरनेट पर देख सकते हैं लेकिन उन दिनों परिणाम घोषणा के बाद भी लंबा इंतजार करना पड़ता था. अगले दिन का अखबार ही एकमात्र माध्यम था जिसमें परीक्षा परिणाम प्रकाशित होता था. इसमें अपना परिणाम ढूंढना भी महाभारत से कम नहीं होता था. चींटी से भी बारीक अक्षरों में रोल नंबर ढूंढने की यह कला मोहल्ले के दो-चार सीनियर विद्यार्थियों के पास ही हुआ करती थी.
उन दिनों संप्रेषण के साधन इतने विकसित नहीं थे. टेलीविजन के आगमन के बावजूद प्रादेशिक सूचनाओं के आदान-प्रदान का माध्यम रेडियो और अखबार ही हुआ करते थे. राजस्थान में तो श्री कर्पूरचंद कुलिश के संपादन में निकलने वाली राजस्थान पत्रिका का एकाधिकार सा था जो उन दिनों सिर्फ जयपुर से प्रकाशित हुआ करती थी. हालांकि राष्ट्रदूत और दैनिक नवज्योति जैसे समाचार पत्र भी छपा करते थे लेकिन उनकी उपलब्धता सीमित क्षेत्र में थी. पूरे प्रदेश में राजस्थान पत्रिका का एक ही संस्करण पढ़ने को मिलता था. जयपुर से 400 किलोमीटर दूर स्थित हनुमानगढ़ में यह अखबार आने का एकमात्र साधन श्रीगंगानगर एक्सप्रेस थी जो प्रातः 7:15 बजे हनुमानगढ़ पहुंचती थी. इसी ट्रेन में राजस्थान पत्रिका आती थी. हनुमानगढ़ में पत्रिका के एजेंट जगन्नाथ जी जोशी थे और बस स्टैंड के अखबार विक्रेताओं को वही बंडल दिया करते थे. उन दिनों अखबार भी सबके घर कहां आया करते थे. सरकारी दफ्तरों के अलावा चंद गिनती के लोग अखबार मंगवाया करते थे. ऐसे में दसवीं के रिजल्ट वाले दिन अखबार की बहुत मारामारी होती थी एजेंट भी उस दिन बड़ी संख्या में अखबार मंगवाया करते थे.

रेडियो के सायंकालीन प्रादेशिक समाचारों में जब बोर्ड का परीक्षा परिणाम जारी होने की घोषणा होती चारों ओर खलबली सी मच जाती. सही मायने में दसवीं के विद्यार्थियों के लिए वह सरपंची के चुनाव जैसी कत्ल की रात होती. 'सुबह क्या होगा' इसी उधेड़बुन में विद्यार्थी पूरी रात सो नहीं पाते. यहां तक कि पढ़ाकू विद्यार्थियों की हालत भी दुबली होती. इसका सीधा सा कारण यह था कि एक अज्ञात भय सबके मन में बैठा हुआ रहता था कि बोर्ड की परीक्षा पास करना आसान नहीं होता. फिर घर-परिवार और अड़ोस-पड़ोस में इस बात के जीवंत प्रमाण रहते थे जो दसवीं कक्षा में चार-चार साल से डटे हुए थे. हमारे पड़ोस में भी बिंदर भाईसाहब, प्रवीण भैय्या, डॉली दीदी, रानी दीदी, झिंदर दीदी आदि ऐसे ही अनुभवी चेहरे थे जो हर घड़ी डराते थे.

खुद मेरे परिवार में तीन बड़े भाई ( ताऊ जी के लड़के) दसवीं में दो-दो साल का अनुभव ले चुके थे और ननिहाल में तो सभी खेती-खड़ थे जिनमें 10वीं तो दूर, आठवीं तक भी कोई नहीं पहुंच पाया था. मेरी बड़ी दीदी भी पहली बार इस परीक्षा में फेल हो गई थी. ऐसे में यह तथ्य कि हमारे खानदान में पहली बार में कोई दसवीं पास कर ही नहीं पाया तो तुम कौन से तुर्रम खां हो, ने भी डरा रखा था. कुछ ऐसी ही स्थिति मेरे सहपाठी दोस्त राधेश्याम के संयुक्त परिवार की थी जहां सभी मेहनत-मजदूरी करने वाले बड़े भाई थे. दसवीं की परीक्षा हम दोनों के लिए जी का जंजाल थी कि अब क्या होगा. परीक्षा के दिनों में शाम के वक्त हम दोनों भाई मूड फ्रेश करने के लिए फुटबॉल खेलने बड़े स्कूल जाया करते थे. तब देखने वाले कहते थे कि इनका तो रिजल्ट आया ही हुआ है.

खैर, जिस दिन परीक्षा परिणाम घोषित हुआ था मैं अपने ननिहाल आया हुआ था. मुझे पता भी नहीं चला था. दो-तीन दिन बाद जब मैं वापस लौट रहा था तो पीलीबंगा बस स्टैंड पर बस रुकी. अचानक मेरी निगाह बुक स्टॉल पर गई. मैं उतर कर स्टॉल पर गया और वहां दसवीं के रिजल्ट के बारे में पूछा. दुकानदार ने तीन दिन पुराना पेपर मेरे आगे रख दिया. मैंने डरे हुए मन और कांपते हाथों से अपने रोल नंबर 5,04,691 को परीक्षा परिणाम में टटोलना शुरू किया. पूरे 3 पृष्ठों पर छपे इस परिणाम में प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी, तृतीय श्रेणी और उत्तीर्ण होने वाले विद्यार्थियों का क्रम था. उसके बाद पूरक यानी सप्लीमेंट्री वालों का विवरण था. मन में उहापोह थी कि कौन सी श्रेणी में परिणाम ढूंढा जाए. इसी उधेड़बुन में मन ने कहा 'यार, तुम द्वितीय श्रेणी मे पास होने के लायक तो हो ही'. बस तुरंत उसी श्रेणी को टटोलना शुरू किया. पर ये क्या, मेरे सहपाठी आनंद प्रकाश तिवाड़ी, संजय गुप्ता, कुलविंदर, दिनेश आदि के रोल नंबर तो दिखे परंतु मेरा नहीं दिखा. बड़ी तेजी के साथ तृतीय श्रेणी को भी छान मारा. बुझे हुए मन से उत्तीर्ण वर्ग वाला बड़ा सा पृष्ठ भी जल्दी-जल्दी देख डाला लेकिन निराशा हाथ लगी. द्वितीय श्रेणी को दोबारा देखना चाहता था लेकिन तभी बस ने होर्न दे दिया. मुझे उदास मन सेअखबार छोड़कर भागना पड़ा.

बस में बैठकर मुझे रोना आने लगा. ऐसा लगा सारी सवारियां मुझे ही घूर रही हैं. मुझे वे सारी बातें याद आने लगी जो दसवीं की परीक्षा के बारे में कही गई थी. मसलन, हमारे खानदान में ही किसी ने पहली बार में दसवीं पास नहीं की तो तेरे कौनसे सुर्खाब के पर लगे हैं, गणित का पेपर भी थोड़ा सा ठीक नहीं हुआ था, और विज्ञान ! शायद ये दोनों ही मुझे लेकर बैठ गए, आदि ख्याल बड़ी तेजी से चलचित्र की तरह दिमाग में आ जा रहे थे. पीलीबंगा से हनुमानगढ़ का वह 25 किलोमीटर का सफर जीवन की अविस्मरणीय घटनाओं में से एक था जब दिल दिमाग पूरी तरह से परास्त हो गए थे. अब गली मोहल्ले में क्या मुंह दिखाऊंगा, यही डर मन को खाए जा रहा था. बिंदर भैया और डॉली दीदी के दिलासा देते चेहरे भी जेहन में आए जिनके पास इस परीक्षा में फेल होने का का पुराना अनुभव था.

हनुमानगढ़ रोडवेज बस डिपो पर जब बस से उतरा तो कदम लड़खड़ा रहे थे. अपना छोटा सा बैग लिए पैदल ही चल पड़ा. हमारा घर बस डिपो के ठीक पीछे था. घर का दरवाजा खटखटाते समय भी एक बार डर लगा कि कहीं पापा जी घर पर न हों. दरवाजा दीदी ने खोला और मुझे देखते ही बोली 'टोनिया, तू पास होग्यो.' मैं हक्का-बक्का रह गया. सामने कमरे के दरवाजे में पापा जी खड़े थे मैंने आगे बढ़ कर उनके पैर छुए तो उन्होंने मुझे गले लगाया और बताया कि मेरी फर्स्ट डिवीजन आई है. रसोई में मां भी बड़ी खुश नजर आ रही थी. पापा जी ने बताया कि राधेश्याम भी फर्स्ट डिवीजन से पास हुआ है. मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ. पापा जी ने परीक्षा परिणाम वाला अखबार मेरे सामने रख दिया जिसमें प्रथम श्रेणी वाले वर्ग में मेरा रोल नंबर था. कमाल देखिए, मुझ नालायक ने तो इस वर्ग में अपना रोल नंबर ढूंढने की हिम्मत ही नहीं जुटाई थी.
थोड़ी देर बाद राधेश्याम दौड़ा-दौड़ा घर आया और मुझे गले लगा कर बोला. 'यार, हम फर्स्ट आए हैं. मदनलाल गुरु जी ने बताया है कि बड़े स्कूल में इस बार कॉमर्स में पहली बार 4 फर्स्ट डिवीजन आई है जिनमें राजेश आचार्य और ओमप्रकाश भी शामिल हैं.'

उस दिन हम दोनों दोस्त जिंदगी में पहली बार बहुत खुश हुए थे. आखिर हम भी उन विद्यार्थियों की उस जमात में शामिल हो गए थे जिन्हें थोड़ी बहुत इज्जत की नजर से देखा जाता था.

वैसी खुशी के अवसर जिंदगी में बहुत कम मिलते हैं. इंसान उन्हें सुखद पलों को साथ लेकर जीवन पथ पर आगे बढ़ता है.



शहर के बीचों-बीच शाहरुख खान बांट रहा कैंसर

  - नशे के प्रचार में सहयोगी बना शहर का प्रशासन सूरतगढ़, 07 अक्टूबर। एक तरफ जहां जिले भर में पुलिस प्रशासन द्वारा नशामुक्ति अभियान चलाने की ...

Popular Posts