Search This Blog

Tuesday, 18 July 2023

पृथ्वी मील बदल सकते हैं सूरतगढ़ के समीकरण

- जेजेपी और भाजपा के राष्ट्रीय गठबंधन से उड़ी स्थानीय भाजपा नेताओं की नींद


- व्यक्तिगत लोकप्रियता के मामले में सबसे आगे हैं पृथ्वी मील


कहावत है, कभी-कभी चींटी भी हाथी पर भारी पड़ जाती है और देखते ही देखते संभावित परिणाम बदल जाते हैं. जननायक जनता पार्टी के प्रवेश के बाद सूरतगढ़ की राजनीति में भी यदि ऐसा कुछ हो जाए तो ज्यादा आश्चर्य नहीं होना चाहिए. राजनीति में छोटे क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व को आप भले ही हवा में उड़ाने की कोशिश करें लेकिन हकीकत यह है कि भारतीय राजनीति में इन दलों का महत्व निरंतर बढ़ रहा है. बंगाल और दक्षिण की राजनीति तो क्षेत्रीय दल ही तय करते रहे हैं. पड़ोसी राज्य हरियाणा और पंजाब में भी शिरोमणि अकाली दल और जेजेपी का अपना वोट बैंक है जो सत्ता को प्रभावित करता है.

भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने जिस हिसाब से छोटे क्षेत्रीय दलों को 2024 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर रणनीति तैयार करने के लिए आमंत्रित किया है उससे यह स्पष्ट है कि भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का महत्व कम नहीं आंका जा सकता. विपक्ष तो अधिकांशत: क्षेत्रीय दलों का ही गठजोड़ हैं. भारत की विविधता को देखते हुए क्षेत्रीय दलों के यह गठजोड़ समय की आवश्यकता कहे जा सकते हैं.

सूरतगढ़ की राजनीति में जननायक जनता पार्टी ने पूर्व जिला प्रमुख पृथ्वी मील का नाम उछाल कर सभी संभावित प्रत्याशियों के खलबली मचा दी है. पार्टी ने उन्हें न सिर्फ प्रदेशाध्यक्ष घोषित किया है बल्कि उनके समर्थन में 24 जुलाई को पुरानी धान मंडी में किसान महापंचायत भी आयोजित कर रही है. इस सभा में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अजय सिंह चौटाला और हरियाणा के उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला समेत कई दिग्गज नेताओं के आने की उम्मीद है. संभावनाएं जताई जा रही है कि जेजेपी और पृथ्वी मील का यह शक्ति प्रदर्शन सूरतगढ़ के समीकरण बदल सकता है.


सूरतगढ़ विधानसभा क्षेत्र में यदि किसी विधायक की व्यक्तिगत लोकप्रियता की बात करें तो विजयलक्ष्मी विश्नोई का नाम सबसे ऊपर आता है. उनके बाद जितने भी विधायक बने उन सबकी लोकप्रियता एक वर्ग विशेष तक सीमित रही, कभी भी वे साधारण जनमानस में अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाए. यही कारण है कि पार्टियां उन पर अगले चुनाव में दांव लगाने से बचती रही. जहां तक पृथ्वी मील की बात है, उन्हें भले ही विधायक बनने का मौका ना मिला हो लेकिन उनकी लोकप्रियता दूसरे प्रत्याशियों के मुकाबले कहीं बेहतर है. जिला प्रमुख के रूप में उनका कार्यकाल आज भी लोग याद करते हैं. बच्चे हों या बड़े बूढ़े, स्त्री हो या पुरूष, नौजवानों से लेकर सभी आयु वर्गों और जातियों में उनकी बराबर पैठ है. उनकी मिलनसारिता और व्यवहार कुशलता सबको प्रभावित करती है. सबसे बड़ी बात आमजन की सहानुभूति उनके प्रति हमेशा रही है जिसका सीधा फायदा उन्हें मिल सकता है. उनकी ग्रामीण जन सभाओं में उमड़ रही भीड़ यही संकेत देती है.

राजनीति में किसी भी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. सभी राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि नरेंद्र मोदी 2024 के चुनाव में अपनी पार्टी को जीतने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. लोकसभा चुनाव से पूर्व होने वाले बड़े राज्यों के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी क्षेत्रीय दलों से गठजोड़ की कोई संभावना नहीं छोड़ना चाहती. फिर जेजेपी के साथ तो हरियाणा में उनका पुराना गठबंधन है, लिहाजा राजस्थान चुनाव में समझौते के तौर पर भाजपा यदि दो तीन सीटें छोड़ भी दे तो बदले में उन्हें लोकसभा चुनाव में फायदा मिल सकता है. जेजेपी के लिहाज से सूरतगढ़ सीट सर्वाधिक उपयुक्त भी है जहां कांग्रेस और भाजपा दोनों को साधना अधिक आसान है. यहां कांग्रेस में कमजोर संगठनात्मक ढांचे के चलते नगरपालिका मंडल भी उनके हाथ से निकल चुका है वहीं भाजपा में एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति है. ऐसी स्थिति में पृथ्वी मील जेजेपी के लिए एक उपयुक्त प्रत्याशी हैं जो राजस्थान विधानसभा में उनका खाता खोल सकते हैं.

चुनाव परिणाम चाहे कुछ भी रहे लेकिन इतना तय है कि पृथ्वी मील की उपस्थिति ने सूरतगढ़ विधानसभा क्षेत्र के समीकरण बदल दिए हैं.

-डॉ.हरिमोहन सारस्वत

Thursday, 6 July 2023

चारण के राजस्थानी काव्य संग्रह ‘अगनसिनान’ के हिंदी अनुवाद का लोकार्पण


विख्यात समालोचक डॉ. नीरज दइया ने किया है अनुवाद

बीकानेर, 6 जुलाई। राजस्थानी के महत्त्वपूर्ण कवि डॉ. अर्जुन देव चारण की कविताओं को अनुवाद के माध्यम से हिंदी के समृद्ध पाठक वर्ग तक पहुंचाने का डॉ. नीरज दइया ने सराहनीय कार्य किया है। अनुवाद दो भाषाओं के मध्य सेतु का कार्य करता है, यह प्रक्रिया निरंतर गतिशील रहनी चाहिए।

प्रतिष्ठित कवि-चिंतक डॉ. नंदकिशोर आचार्य ने ये उद्गार सुपरिचित कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया द्वारा डॉ. अर्जुन देव चारण के राजस्थानी काव्य संग्रह ‘अगनसिनान’ के हिंदी अनुवाद-कृति के लोकार्पण कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए।

डॉ. आचार्य ने कहा कि साहित्यिक रूप से राजस्थानी को मान्यता मिली हुई है। साहित्य अकादमी प्रतिवर्ष राजस्थानी कृतियों को पुरस्कृत करती रही है किंतु संवैधानिक मान्यता के लिए राजस्थानी साहित्यकार वर्षों से संघर्षरत हैं। उन्होंने कहा कि कविता, कहानी आदि साहित्यिक विधाओं में निरंतर सृजन करने के साथ-साथ राजस्थानी लेखकों को विज्ञान, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, आर्थिकशास्त्र आदि विभिन्न विषयों पर भी मौलिक लेखन करना चाहिए तथा अनुवाद के माध्यम से भी इन विषयों की पुस्तकें राजस्थानी पाठकों तक पहुंचाने के प्रयास करने चाहिए।

नेगचार संस्था की ओर से आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि सरल विशारद ने कहा डॉ. नीरज दइया प्रतिभाशाली साहित्यकार हैं जो मौलिक लेखन के साथ-साथ अनुवाद कार्यों को भी गंभीरतापूर्वक करते रहे हैं। आपने नंदकिशोर जी की कविताओं का हिंदी में राजस्थानी में अनुवाद किया है जो एक बहुत बड़ा कार्य है इसी प्रकार अर्जुन देव चारण की कविताओं का हिंदी में आना एक बड़ा कार्य है।

विशिष्ट अतिथि पंडित जवाहर लाल नेहरू बाल साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष बुलाकी शर्मा ने कहा कि  डॉ नीरज दइया वर्षों से अनुवाद कार्य में संलग्न हैं। उन्होंने राजस्थानी और हिंदी में परस्पर अनुवाद से देश में जहां राजस्थानी साहित्य को दूर दूर तक पहुंचाया है वहीं भारतीय साहित्य को राजस्थानी में लाकर अनुवाद को सृजनात्मकता के अनेक आयाम प्रस्तुत किए हैं। अगनसिनान की लंबी कविताएं हिंदी के माध्यम से अन्य भारतीय भाषाओं में जाएगी तब निसंदेह यह प्रमाणित होगा कि राजस्थानी में श्रेष्ठतम साहित्य सृजन हो रहा है।

डॉ नीरज दइया ने अनुवाद-कार्य के अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि इस संग्रह में डॉ. अर्जुन देव चारण की पौराणिक और ऐतिहासिक स्त्री चरित्रों के मनोभावों को लेकर सृजित लंबी कविताएं हैं। इनका अनुवाद करते यूं लगता रहा जैसे ये स्त्री चरित्र साक्षात उपस्थित होकर अपनी व्यथा-कथा बता रहीं हैं। ये कविताएं हिंदी पाठकों को निःसंदेह गहरे तक संवेदित और उद्वेलित करेंगी।

युवा आलोचक डॉ ब्रज रतन जोशी ने कहा कि डॉ. अर्जुन देव चारण को प्रमुखत एक नाटककार के रूप में जाना-पहचाना जाता है किंतु वे बड़े कवि और आलोचक के साथ चिंतक के रूप में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। अगनसिनान की कविताएं उनके कवि रूप को दूर दूर तक ले जाने में सहयोग कर राजस्थानी कविता की कीर्ति में श्रीवृद्धि करेगी। आभार प्रदर्शन सूर्यप्रकाशन मंदिर के निदेशक डॉ प्रशांत बिस्सा ने व्यक्त किया।

Monday, 15 May 2023

'मंडी गैंग' : सपनों की रिंग रोड का सुहाना सफर


(प्रेमलता के उपन्यास को पढ़ते हुए...)


जब किसी रचना में कथ्य और बिंब सहज होने के साथ परिचित से लगने लगें तो उसमें पाठकीय उत्सुकता जागना स्वाभाविक है। ऐसे कथानक साधारण होने के बावजूद पाठक को बांधने की क्षमता रखते हैं। यूं भी कहा जा सकता है कि साधारण चीजों में ही विशिष्टता छिपी रहती है। बात लेखन की हो तो यह तथ्य और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

प्रेमलता सोनी का नया उपन्यास 'मंडी गैंग' इसी बात की साख भरता है। अपने पहले उपन्यास में ही प्रेमलता जी ने लेखकीय कौशल का परिचय दिया है। उपन्यास की भाषा और शिल्प सरल होने के साथ सुग्राह्य है तथा अनावश्यक जटिलता से बचा गया है। जरूरत के अनुसार 'बोल्ड' शब्द भी काम में लिए गए हैं। उपन्यास का कथानक कहीं भी टूटता नहीं है और मंथर गति से पाठक को साथ बहा ले जाता है।


सब्जी मंडी से शेयरबाजार तक की महत्वाकांक्षी उड़ान भरते इस उपन्यास के किरदारों को बेहद खूबसूरती के साथ गढ़ा गया है। हर पात्र का अपना एक अलग अंदाज है, स्वतंत्र अभिव्यक्ति है जो किसी दूसरे पर आश्रित नहीं है। कथानक में एक ओर सब्जी मंडी का आंतरिक वातावरण प्रस्तुत किया गया है तो वहीं ब्याज का धंधा करने वाले छोटे फायनेंसर्स की चाल और चरित्र को उभारा गया है। सामाजिक रूप से कमोबेश हर शहर में ऐसे किरदार देखे जा सकते हैं।

उपन्यास का नायक जितेश है जिसकी जिंदगी को रिंग रोड के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस रोड पर उसे मंचन, गीता, इंदिरा, ओमी, इरशाद, रूपेश और पंकज सरीखे किरदार मिलते हैं जिनके साथ कथानक आगे बढ़ता है। पैसा कमाने की लालसा किसे नहीं होती लेकिन उसके लिए जुनून पैदा करना पड़ता है। इस जुनून का एक रास्ता अति महत्वाकांक्षा के रूप में बर्बादी की तरफ भी जाता है। जितेश का किरदार इसका जीवंत उदाहरण है। जितेश की पत्नी बरखा के रूप में लेखिका ने मध्यमवर्गीय भारतीय परिवारों में महिलाओं की स्थिति का बखूबी चित्रण किया है। सब्जी मंडी में मजदूरी करने वाली महिलाओं के चरित्र भी रोचक ढंग से प्रस्तुत किए गए हैं । उनके जीवन संघर्ष को बेहतर ढंग से उभारा गया है।

इस उपन्यास को पढ़ते समय पाठक अनायास ही जयपुर के माहौल से परिचित हो जाता है। चांदपोल, नाहरी का नाका, गोविंद देव जी मंदिर और आमेर महज शब्द भर नहीं हैं बल्कि एक पूरी सांस्कृतिक विरासत को समेटे हुए हैं। उनके आसपास पसरे हुए यथार्थ और संवेदनाओं को इस उपन्यास के ताने-बाने में बखूबी पिरोया गया है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जयपुर के कलमकार मंच द्वारा प्रकाशित यह उपन्यास महिला लेखन के क्षेत्र में नई उम्मीद जगाता है। प्रेमलता जी ने इस उपन्यास के माध्यम से अपनी लेखन प्रतिभा परिचय दिया है। उम्मीद की जानी चाहिए आने वाले दिनों में उनकी कलम से और बेहतर रचाव पढ़ने को मिलेगा।

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Saturday, 15 April 2023

मानवीय व्यवहार का बखूबी परीक्षण करती हैं पटियालवी की लघु कथाएं


( दविंदर पटियालवी के नए लघुकथा संग्रह 'उड़ान' के बहाने...)


दविंदर पटियालवी पंजाबी के सुपरिचित लघुकथाकार है। एक समर्पित रचनाकार के तौर पर वे लघु कथा के क्षेत्र में पिछले 30 सालों से काम कर रहे हैं। 'उड़ान' उनका दूसरा लघु कथा संग्रह है। ये कहानियां मूलत: पंजाबी में कही गई हैं, जिनका हिंदी अनुवाद हरदीप सब्बरवाल ने किया है। इससे पूर्व इसी विधा में 'छोटे लोग' शीर्षक से उनका एक और लघु कथा संग्रह प्रकाशित है। उनकी रचनाएं विभिन्न समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रहती हैं । रेडियो और टीवी पर भी पटयालवी की उपस्थिति रहती है। पंजाबी साहित्य सभा, पटियाला के सक्रिय सदस्य के रूप में 'कलम काफिला' और 'कलम शक्ति' का उन्होंने संपादन किया है । वर्ष 2012 से वे पंजाबी की प्रतिष्ठित लघुकथा पत्रिका 'छिण' का संपादन कर रहे हैं।

कम शब्दों में सार्थक अभिव्यक्ति लेखक को विशिष्ट पहचान देती है। लोक में कहा भी जाता है कि 'बात रा तो दो ई टप्पा होवै...।' लघु कथा इसी दृष्टि से उपजी एक साहित्यिक विधा है जिसमें लेखक किसी एक संदर्भ को पकड़ कर पाठक की संवेदना तक पहुंचना चाहता है। जीवन की आपाधापी में पल- प्रतिपल हम अनेक ऐसी बातों, घटनाओं, और तथ्यों से गुजरते हैं जो घड़ी भर के लिए हमारी संवेदना को छूती है, हमें विचलित करती है। अगले ही पल जीवन आगे बढ़ जाता है लेकिन इन घटनाओं और तथ्यों में छिपी किसी एक बिंदू को अपनी तीक्ष्ण दृष्टि से पकड़कर कलमबद्ध करना ही लघुकथा का आधार है। आज के दौर में लघु कथाएं आधुनिक साहित्य की पसंदीदा विधा बन चुकी हैं।

पाकिस्तान के लघु कथाकार और वरिष्ठ पत्रकार मुब्बशिर जैदी इस विधा को व्यक्ति की तात्कालिक संवेदना से जोड़ने की बात कहते हैं जो दिलो दिमाग पर देर तक छाई रहती है । उनके अनुसार यूरोप में तो पचपन शब्दों की लघुकथाओं के प्रयोग बेहद सफल रहे हैं और इस विधा में बेहतर सृजन हुआ है।

एक उपन्यास में घटनाओं और तथ्यों की श्रंखला का विस्तार रहता है जबकि कहानी विधा इस विस्तार को सीमित दायरे में बांधती है। लघुकथा तो इस सीमित दायरे को भी छोटा बनाकर देखने में यकीन रखती है। इस विधा की खूबी यह है कि एक समय में व्यक्ति अपनी अभिव्यक्ति और संवेदनाएं किसी एक खास बिंदु अथवा घटना पर केंद्रित कर पाने में सफल होता है।

दविंदर पटियालवी
'उड़ान' संग्रह की लघु कथाओं की बात करें तो इसमें कुल 51 लघु कथाएं सम्मिलित हैं। इन कथाओं को पढ़ते हुए पाठक का अनायास ही लेखकीय दृष्टि से परिचय हो जाता है जो सरल, संयमित और समर्पित है। इसी दृष्टिकोण के चलते ये लघुकथाएं भौतिक यथार्थ को अभिव्यक्त कर पाने में सफल हुई हैं। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, एलिंग भेद और माननीय व्यवहार के विभिन्न पहलुओं को लेकर रची गई इन कथाओं से पाठक स्वत: ही जुड़ता चला जाता है। बानगी के तौर पर उनकी लघुकथा 'फर्क' को देखिए -

देश के प्रसिद्ध नेताजी हेलीकॉप्टर उड़ान के वक्त अचानक खराब हुए मौसम की वजह से लापता हो गए। प्रदेश की पुलिस फौज और सारा प्रशासनिक अमला हेलीकॉप्टर की तलाश में जी जान से जुट गया ।चारों और इस बात को लेकर हाहाकार मच गई ।

इतने में खबर आई कि पास ही उफनती नदी की चपेट में 2 गांव डूब चुके हैं। शाम हो चुकी थी, लिहाजा प्रशासन ने अगले दिन सुबह कार्यवाही करने का आदेश दिया और खुद रात के अंधेरे में पीड़ितों को मौत के मुंह में छोड़कर गायब हो गया।

इसी प्रकार खिलौने, हिसाब-किताब, सबक, कंस, आदर, प्रश्न, एक नई शुरुआत और अपशकुन लघु कथाएं पाठक के समक्ष बेहतर बिंब खड़ा करती हैं। लघु कथा 'पछतावा' में माननीय व्यवहार को बेहद शानदार ढंग से प्रस्तुत किया गया है तो वहीं 'उड़ान' शीर्षक की कथा एक पिता की अपनी बेटी के प्रति दोघाचिंती से रूबरू करवाती है।

चूंकि पटियालवी खुद लंबे समय से लघु कथाओं का संपादन करते रहे हैं, इसलिए वे साहित्यिक बारीकियों को बखूबी जानते हैं। उनका यह लेखकीय अनुभव इस संग्रह में झलकता है। सुकून देने वाली बात यह है कि इस संग्रह के माध्यम से हिंदी का पाठक पंजाब की लघुकथाओं से परिचित हो रहा है। अनुवादक हरदीप सब्बरवाल भी इस मायने में बधाई के पात्र हैं।

बोधी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'उड़ान' लघु कथा संग्रह अपनी विशिष्ट पहचान बनाएगा, यही कामना है उम्मीद की जानी चाहिए, आने वाले दिनों में दविंदर पटियालवी और बेहतर रचाव से साहित्य संसार को समृद्ध करेंगे।

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Monday, 10 April 2023

बीड़ी जलई ले जिगर से पिया, जिगर में बड़ी आग है !


(मीडिया के आइने में चेहरा देख बौखलाए विधायक के नाम चिट्ठी)


शुक्रिया कासनिया जी !

आपने प्रेस क्लब के उपाध्यक्ष राजेंद्र पटावरी को पढ़ा तो सही, पढ़कर तिलमिलाना तो स्वाभाविक है। इतनी खरी-खरी सुनने के बाद, वजूद और जमीर रखने वाले हर आदमी को कीड़ियां सी चढ़नी चाहिए, आपको चढ़ी, भाई राजेंद्र का लिखना सार्थक हुआ।

आपकी उम्र और राजनीतिक अनुभव का सम्मान अवश्य होना चाहिए, यही हमारे संस्कार हैं। लेकिन विधायक के रूप में आपके इस कार्यकाल की कमियां सबको अखरती हैं। सच्चाई यह है कि विपक्षी विधायक के तौर पर आप खरे उतर ही नहीं पाए। जिले के लिए चल रहे संघर्ष में एक विधायक यदि पत्थर मारकर लाठीचार्ज करवाने की बात करे तो उसे नौसिखिया बयान ही कहा जाएगा। यदि वाकई आप में कुछ करने का माद्दा होता तो 19 जिलों की घोषणा के वक्त विधानसभा में ही सत्ता के मुंह पर अपना त्यागपत्र दे मारते और जनता के बीच संघर्ष की हूंकार भरते। कम से कम सूरतगढ़ की आवाज बुलंद होती और इलाके की जनता आपको सर आंखों पर बिठा लेती। लेकिन आप जाने किस अज्ञात भय के चलते निर्णय ले ही नहीं पाए। दूसरों के वक्तव्य को आप छींट पाड़ने की उपमा देते हैं, खुद आप लट्ठा भी नहीं पाड़ पाए, लट्ठ ही पाड़ लेते !


इसी मंच से कुछ रोज पहले आपने कहा था कि आपको कांग्रेस में शामिल होने की शर्त पर सूरतगढ़ को जिला बनाने का न्योता दिया गया था। यदि यह वाकई सच है तो आपने सूरतगढ़ का वो नुकसान कर दिया, जो सदियों तक याद रखा जाएगा। आज लोग निजी स्वार्थों के लिए पार्टियां बदल रहे हैं लेकिन आप इलाके के लिए ऐसा अनूठा त्याग करते तो नया इतिहास लिखा जाता। अफसोस, आपने पार्टी हितों के लिए अपने विधानसभा क्षेत्र की अनदेखी करते हुए एक बेहतरीन मौका गंवा दिया।

यदि आप प्रेस की आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकते तो आपको विधायकी त्याग कर कपड़े की दुकान खोल लेनी चाहिए या नरमा बीज लेना चाहिए। जिस जनता ने आपको सिर माथे पर बिठाकर विधानसभा में भेजा है उसे आप बेवकूफ बनाने की कोशिश करेंगे तब सुनना तो पड़ेगा ! समझना भी पड़ेगा कि -

तुमसे पहले जो शख्स यहां तख्तानशीं था
उसे भी अपने खुदा होने का इतना ही यकीं था.

एक बात और, मौके के विधायक आप हैं न कि राजेंद्र भादू, अशोक नागपाल, या गंगाजल मील। कहा तो आपको ही जाएगा क्योंकि आपका दायित्व इन सबसे कहीं बड़ा है। अपने कद को मजबूत करने के लिए कुछ ठोस निर्णय लेने की सोचिए।

संघर्ष के इस दौर में होना तो यह चाहिए था कि आप सबसे बड़े जनप्रतिनिधि होने के नाते आंदोलन का नेतृत्व करते, उसे सही दिशा प्रदान करते लेकिन आप अपना वोट बैंक को बचाने की जुगत में लगे रहे जबकि सच्चाई यह है कि आपका वोट बैंक कब खिसक गया आपको पता ही नहीं चला। खुद आपकी पार्टी में इतने गुट बन गए कि आप गिनती नहीं कर सकते।

मीडिया ने अपना काम कैसा किया है, उसे किसी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है। आज भी इस देश की जनता आप नेताओं से कहीं अधिक, खबरनवीसों की बात पर यकीन करती है। आपने राजेंद्र पटावरी को गोदी मीडिया मानने की भूल कर दी है, जो ना काबिले बर्दाश्त है।

खुद सक्षम होने के बावजूद आप आयोजन समिति का मुंह ताकते हैं। उनसे बचकाना सवाल पूछते हैं, 'कितने आदमी, कितने दिन लाने हैं।' आप खुद तय क्यों नहीं करते ? संघर्षशील लोगों को जयपुर ले जाकर सरकार से सीधे मुद्दे की बात क्यों नहीं करते ? याद रखिए, जयपुर का विधायक निवास आपका नहीं, इस इलाके की जनता का है, यदि वहां 10 दिन रुकना भी पड़े, तो कहां दिक्कत है ! अमराराम जैसे संघर्षशील विधायकों से सीख लीजिए जिन्हें उनके इलाके के लोग आंखों का तारा बनाकर रखते हैं। सूरतगढ़ जिला बनाओ के संघर्ष में लगे मुट्ठी भर लोगों का मार्गदर्शन तो ठीक ढंग से कर दीजिए।

अगर कुछ ज्यादा कह दिया है तो दिल पर ना लें। जिस दिन आप वाकई जिम्मेदार जनप्रतिनिधि होने का दायित्व निभाएंगे, यही प्रेस आप के सम्मान में खड़ी होगी। प्रेस का मुंह खुलवाने की बजाय यथार्थ के धरातल पर काम करना शुरू कीजिए। सूरतगढ़ जिला बनेगा या नहीं, यह भविष्य के गर्भ में है लेकिन इतना जान लें-

समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध.

सादर
डॉ. हरिमोहन सारस्वत
अध्यक्ष,
प्रेस क्लब, सूरतगढ़

Saturday, 1 April 2023

जिंदा हो तो जिंदा नजर आना जरूरी है !


(सूरतगढ़ जिला बनाओ संघर्ष)

कल अपेक्स मीटिंग हॉल में जिला बनाओ संघर्ष समिति की स्टेयरिंग कमेटी की बैठक में प्रेस क्लब की ओर से सूरतगढ़ के सभी नेताओं को मर्यादित ढंग से समझाने की कोशिश की थी. उस चेतना का असर यह हुआ कि शाम होते होते आंदोलन का स्वरूप बदल गया. कुछ युवा और जुझारू लोग पुराने हाउसिंग बोर्ड की टंकी पर जा चढ़े और सूरतगढ़ को जिला बनाने की मांग का नारा बुलंद किया.


प्रशासन और पुलिस इस घटनाक्रम से एक बार तो सकते में आ गए. आनन-फानन में फायर ब्रिगेड की गाड़ी, एंबुलेंस, नागरिक सुरक्षा के सेवा कर्मी, पुलिस जाब्ता सभी चुस्त-दुरुस्त होकर घटनास्थल पर पहुंच गए. टंकी पर छात्र नेता रामू छिंपा, टिब्बा क्षेत्र के जुझारू नौजवान राकेश बिश्नोई, शक्ति सिंह भाटी, सुमित चौधरी अशोक कड़वासरा, अजय सारण, कमल रेगर 100 फुट ऊंची टंकी पर चढे नारे बुलंद कर रहे थे. इन युवाओं के इस कदम ने आंदोलन को एक नया रूप दिया है.

देखते ही देखते वार्ड नंबर 25-26 सूरतगढ़ जिला बनाओ आंदोलन का एक नया केंद्र बन गया जहां भीड़ जुटने लगी. वार्ड के लोगों ने आंदोलनकारियों के लिए चाय नाश्ते की व्यवस्था की. रात को इंद्र भगवान ने भी अपने रंग दिखाए, तेज बारिश के साथ सर्द हवाएं भी चली लेकिन नौजवानों ने सूरतगढ़ को जिला बनाने के आंदोलन में गर्मी ला दी है.

इस आंदोलन में अब 4 केंद्र बन चुके हैं. बीकानेर पीबीएम अस्पताल में पूजा छाबड़ा लगातार आमरण अनशन पर है. सूरतगढ़ के ट्रॉमा सेंटर में जुझारू उमेश मुद्गल की भूख हड़ताल दसवे दिन पहुंच गई है. प्रताप चौक पर संघर्षशील नेता बलराम वर्मा ने कमाल संभाल रखी है. चौथा और मजबूत केंद्र नौजवानों ने बना दिया है. युवाओं की इच्छा शक्ति को देखते हुए लगता है कि आंदोलन का यह केंद्र आने वाले दिनों में और मजबूत होगा.

देखना यह है कि सूरतगढ़ में विधायक बनने का सपना देख रहे दूसरे नेता और अन्य जनप्रतिनिधि इस आंदोलन में अपनी कैसी भागीदारी निभाते हैं. इस यज्ञ में सभी जागरूक लोगों को अपना योगदान देने की जरूरत है. चुनावी साल में कांग्रेस सरकार जन भावनाओं को कितना महत्व देती है उनका यह निर्णय आगामी सरकार बनाने में होगा. अशोक गहलोत लोकप्रिय और जन नेता के रूप में जाने जाते हैं, उन्हें सूरतगढ़ के मामले में संवेदनशील होकर निर्णय लेना चाहिए. 

Thursday, 30 March 2023

उसूलों पर आंच आए तो टकराना जरूरी है !


(जिला बनाओ अभियान का संघर्ष )

आज का घटनाक्रम कुछ यूं चला कि रात्रि लगभग 3:00 बजे 8 दिन से 'सूरतगढ़ जिला बनाओ' अभियान के अंतर्गत आमरण अनशन कर रहे उमेश मुद्गल और विष्णु तरड़ को पुलिस ने उठा लिया. संवेदनहीन प्रशासन ने उन्हें जिला चिकित्सालय, श्रीगंगानगर रैफर कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली. इन योद्धाओं को गाड़ी में बिठाकर भगवान भरोसे छोड़ दिया गया. यहां तक कि उनकी देखरेख के लिए कोई पुलिसकर्मी भी मौजूद नहीं था. जिला चिकित्सालय में वे दोनों अव्यवस्था के मारे अकेले बैठे रहे. नर्सिंग स्टाफ ने उनकी सुध तक नहीं ली और थक हार कर वे रोडवेज बस में बैठकर आठ बजे सूरतगढ़ लौट आए.



घटना की जानकारी मिलते ही शहर के संघर्षशील लोग, विधायक पूर्व विधायक और अन्य जनप्रतिनिधि धरना स्थल पर पहुंचे और प्रशासन को बैकफुट पर ला दिया. जिला कलेक्टर से लेकर एसडीएम, तहसीलदार और पुलिस प्रशासन सबको इस घोर लापरवाही के लिए लताड़ा गया. गुस्साए साथियों ने प्रताप चौक पर जैसे ही जाम लगाया अधिकारी और पुलिस सभी दौड़े आए और अपनी गलती स्वीकारने लगे. जनाक्रोश को देखकर मौके पर उपस्थित उपखंड अधिकारी ने माफी मांगते हुए दोषी तहसीलदार और कर्मचारियों की लापरवाही के खिलाफ विभागीय जांच का भरोसा दिलाया और भविष्य में ऐसी घटना की पुनरावृत्ति ना होने की बात कही.

परिणाम यह रहा कि पुलिस ने दोनों आंदोलनकारियों को पूरी जिम्मेदारी के साथ अब सूरतगढ़ ट्रॉमा सेंटर में भर्ती करवा दिया है जहां इलाज के साथ-साथ उनका अनशन भी जारी है. सूरतगढ़ जिला बनेगा या नहीं, मुझे नहीं पता, लेकिन इतना तय है कि उसूलों पर आंच आए तो टकराना जरूरी है. अन्याय और संवेदनहीन प्रशासन को चेताने के लिए संभावनाओं के शहर में योद्धाओं की कमी नहीं है. इस संघर्ष में खड़े हर व्यक्ति को सादर प्रणाम, जिसने अपना योगदान दिया, और लगातार दे रहे हैं. अब आमरण अनशन की डोर जुझारू नेता बलराम वर्मा ने संभाली है अपनी घोषणा के मुताबिक उन्होंने आज से भूख हड़ताल शुरू की है. पूजा छाबड़ा द्वारा जगाई गई इस अलख में उमेश मुद्गल और विष्णु तरड़ सहित चार लोग आमरण अनशन पर हैं और धरना स्थल पर क्रमिक अनशन भी जारी है. देखें आगे क्या होता है !

Wednesday, 29 March 2023

राइट टू हेल्थ कानून पर आक्रोशित है डॉक्टर्स, सरकार करे पुनर्विचार


राजस्थान में चिकित्सक और सरकार राइट टू हेल्थ बिल को लेकर आमने-सामने हैं. डॉक्टरों की हड़ताल से आम आदमी की परेशानी बढ़ती ही जा रही है लेकिन चुनावी साल के मद्देनजर सरकार सुनने को ही तैयार नहीं है. इस बिल में अनेक ऐसे प्रावधान हैं जिनकी पालना हो पाना संभव ही नहीं है. इन प्रावधानों के चलते चिकित्सा व्यवस्था में विवाद और लड़ाई झगड़े बढ़ने तय हैं. एक ओर जहां सरकार के मंत्री चिकित्सकों को कसाई बता रहे हैं वहीं दूसरी और आरटीएच के नाम पर जनता को बेवकूफ बना कर वाहवाही लूट रहे हैं.


आईएमए की सूरतगढ़ शाखा ने कल इसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर अपनी भावनाएं और परेशानियां लोगों के सामने रखी. वरिष्ठ चिकित्सकों ने इस कानून को लेकर अनेक शंकाएं व्यक्त की और सरकार से यह कानून वापस लेने की मांग की. आइए, इस बिल और विवाद को समझने की कोशिश करते हैं.

राइट टू हेल्थ (RTH) बिल में प्रावधान है कि कोई भी हॉस्पिटल या डॉक्टर मरीज को इलाज के लिए मना नहीं कर सकता है। इमरजेंसी में आए मरीज का सबसे पहले इलाज करना होगा। ये बिल कानून बनने के बाद बिना किसी तरह का पैसा डिपॉजिट किए ही मरीज को पूरा इलाज मिल सकेगा। एक्ट के बाद डॉक्टर या प्राइवेट हॉस्पिटल मरीज को भर्ती करने या उसका इलाज करने से मना नहीं कर सकेंगे। ये कानून सरकारी के साथ ही निजी अस्पतालों और हेल्थ केयर सेंटर पर भी लागू होगा।

'इमरजेंसी' परिभाषित में होना सबसे बड़ा विवाद

सबसे बड़ा विवाद 'इमरजेंसी' शब्द को लेकर है। डॉक्टर्स की चिंता है कि इमरजेंसी को परिभाषित नहीं किया गया है। इमरजेंसी के नाम पर कोई भी मरीज या उसका परिजन किसी भी प्राइवेट हॉस्पिटल में आकर मुफ्त इलाज की मांग कर सकता है। इससे मरीज, उनके परिजनों से अस्पतालों के स्टाफ और डॉक्टर्स के बीच विवाद बढ़ेंगे। पुलिस एफआईआर, कोर्ट-कचहरी मुकदमेबाजी और सरकारी कार्रवाई में डॉक्टर्स और अस्पताल उलझ कर रह जाएंगे।

ये हैं बिल के प्रावधान

- हॉस्पिटल या डॉक्टर मरीज को इमरजेंसी में फ्री इलाज उपलब्ध करवाएंगे।

- मरीज या उसके परिजनों से कोई फीस नहीं ली जाएगी।

- इलाज के बाद ही मरीज या उसके परिजनों से फीस ली जा सकती है।

- अगर मरीज या परिजन फीस देने में असमर्थ रहते हैं, तो बकाया फीस और चार्जेज़ सरकार चुकाएगी।

- मरीज को किसी दूसरे अस्पताल में भी शिफ्ट किया जा सकता है।

- इलाज करने से इनकार किया, तो अस्पताल पर जुर्माना लगेगा

- मरीज का इलाज करने से इनकार करने पर पहली बार में 10 हजार रुपये जुर्माना लगाया जाएगा, दूसरी बार मना करने पर जुर्माना 25 हजार रुपये वसूला जाएगा। 

चिकित्सकों का पक्ष जानना भी जरूरी

कानून वापस नहीं होने तक आंदोलन और विरोध प्रदर्शन पर डॉक्टर्स अड़े हैं। चिकित्सकों का आरोप है कि यह बिल लागू होने पर प्राइवेट अस्पतालों में भी सरकारी अस्पतालों जैसी अव्यवस्थाएं और भीड़ बढ़ जाएगी। निजी अस्पतालों के कामकाज और उपचार में सरकार का सीधे दखल बढ़ जाएगा।

डॉक्टर्स का आरोप है कि इमरजेंसी शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। कोई भी मरीज या उसका परिजन इमरजेंसी की बात कहकर किसी भी अस्पताल में इलाज के लिए पहुंच जाएगा। फ्री इलाज करने की बात करेगा।

इससे अस्पताल, डॉक्टर्स और मरीज के परिजनों में झगड़े और टकराव बढ़ेंगे। कोर्ट-कचहरी और मुकदमेबाजी आम हो जाएगी। इसलिए बिल को वापस लिया जाए।

RTH लागू होने पर हर मरीज के इलाज की गारंटी डॉक्टर की हो जाएगी। कोई गंभीर मरीज अस्पताल पहुंचा और अस्पताल में इलाज संभव नहीं है, तो स्वाभाविक रूप से मरीज को बड़े या संबंधित स्पेशलाइजेशन वाले अस्पताल में रेफर करना पड़ेगा।रेफर के दौरान बड़े अस्पताल पहुंचने से पहले अगर मरीज की मौत हो गई, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा और उसकी गारंटी कौन लेगा ?

सार यह है कि बंद एसी कमरों में बैठकर ब्यूरोक्रेट्स द्वारा बनाया गया यह कानून राहत देने की बजाय परेशानियां खड़ा करता दिखाई दे रहा है. यदि सरकार वाकई राइट टू हेल्थ के प्रति गंभीर है तो उसे देश के प्रधानमंत्री की तरह एक कदम आगे बढ़कर इस कानून को वापस लेना चाहिए. अशोक गहलोत सरकार द्वारा स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए लाई गई चिरंजीवी योजना एक बेहतरीन योजना है, उसकी खामियां दूर कर बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था बनाई जा सकती है. 

शहर के बीचों-बीच शाहरुख खान बांट रहा कैंसर

  - नशे के प्रचार में सहयोगी बना शहर का प्रशासन सूरतगढ़, 07 अक्टूबर। एक तरफ जहां जिले भर में पुलिस प्रशासन द्वारा नशामुक्ति अभियान चलाने की ...

Popular Posts