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Saturday, 25 March 2023

मैं सूरतगढ़ बोल रहा हूं !

( एक शहर का दर्द भरा आह्वान )


मैं सूरतगढ़ बोल रहा हूं ! एक लंबे अरसे मैं तुम सबके लड़ाई-झगड़े, शिकवे-शिकायत और आचरण चुपचाप देखता सुनता चला आ रहा हूं लेकिन मेरे बच्चों, आज मुझे भी तुमसे कुछ कहना है. सुनो-


समर शेष है नहीं पाप के भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध.

तुलसी रामायण में राम सेतु निर्माण का एक प्रसंग है. जब समूची वानर सेना समुद्र पर सेतु बांधने में व्यस्त थी तब भगवान राम ने देखा कि एक नन्ही गिलहरी भी भागदौड़ कर रही है. वह गिलहरी समुद्र के पानी में खुद को भिगोती और किनारे पड़ी रेत में लोटपोट होकर पुन: समुद्र की ओर दौड़ पड़ती. रेत के कणों को समुद्र में डालने का उसका क्रम अनवरत जारी था. भगवान राम ने उसे हथेली में उठाया और बड़े प्यार से उसकी पीठ पर हाथ फेर कर बोले, " ओ नन्हीं प्यारी गिलहरी ! इतने बड़े सेतु के निर्माण में, जहां वानर सेना बड़े भारी भरकम पत्थरों को ढो रही है वहां तुम्हारे इन रेत के कणों से क्या होगा ? तुम व्यर्थ खुद को कष्ट क्यों दे रही हो ?"

गिलहरी ने उत्तर दिया, "प्रभु, मुझे मेरी लघुता और क्षुद्र प्रयासों का भान है लेकिन जब राम सेतु का इतिहास लिखा जाएगा तो कोई यह नहीं कह पाएगा कि उस वक्त गिलहरी क्या कर रही थी !"

मेरे बच्चों, मैं जिला बनूंगा या नहीं, यह भविष्य के गर्भ में है लेकिन एक ऐसे वक्त में, जब शहर के बीचोबीच मुट्ठी भर जिंदा लोग आमरण अनशन के साथ धरना प्रदर्शन पर डटे हैं और एक जायज मांग के लिए सरकार से भिड़ने को तैयार हैं, उस समय मेरे इलाके के हर जाये जलमे को रामसेतु की गिलहरी से सबक लेना चाहिए.
मेरे मान सम्मान के लिए लड़ने वाले सभी बच्चों से मैं कहना चाहता हूं, लोकतंत्र में अपनी आवाज उठाना सीखो. मीन मेख निकालना बहुत आसान है लेकिन मोर्चे पर डटे रहना बड़ा कठिन है. एक बेटी पूजा छाबड़ा आमरण अनशन पर बैठी तो मुझे सुकून मिला. कोई तो है जिसे अपने पिता की प्रतिष्ठा की फिक्र है, कोई तो है जो मेरा जयघोष चाहता है. इसी क्रम में जब उमेश मुद्गल ने कंधे से कंधा मिलाते हुए भूख हड़ताल शुरू की तो लगने लगा कि अब मेरे बच्चे सूरतगढ़ की पताका को नीचे नहीं गिरने देंगे. उनकी हौसला अफजाई कर रहे कुछ संघर्षशील नौजवानों के जयघोष सुनकर मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है. मैं जानता हूं, मदांध सत्ता का हुक्म बजाते हुए पुलिस और प्रशासन इन बच्चों के साथ दुर्व्यवहार करेगा, एक के बाद एक अनशनकारी को उठाकर ले जाएगा लेकिन फिर भी संघर्ष जिंदा रहेगा क्योंकि मैं अपने बच्चों से अभी निराश नहीं हुआ हूं.


दुकानों और घरों में दुबके मेरे बच्चे-बच्चियों, यह वक्त हाथ पर हाथ धरकर बैठने का नहीं है, सड़क पर उतर कर अपना हक मांगने का है. तुम्हारे बाप के साथ कड़ूम्बे की पंचायत ने अपमानजक दुभांत की है, यदि आज तुम नहीं चेते तो सरकार का यह भेदभाव तुम्हें कहीं का नहीं छोड़ेगा. संघर्ष की राह पर तुम भी सोचना शुरू करो. बाजार पूरे नहीं तो आधे दिन के लिए भी बंद किए जा सकते हैं, प्रशासन को ठप किया जा सकता है, नगरपालिका, पंचायत समिति और ग्राम पंचायतों में पेन डाउन स्ट्राइक हो सकती है, न्यायालयों का बहिष्कार किया जा सकता है, बिजली बोर्ड के बिल भरने से मना किए जा सकते हैं, सरकार के नुमाइंदों को घेरा जा सकता है आदि आदि.....जाने कितने ऐसे लोकतांत्रिक तरीके हैं जिनसे सरकारों को झुकाया जा सकता है. अपने बाप पर यकीन नहीं तो किसान आंदोलन का इतिहास एक बार फिर देख लो.

मुझे पता है, मेरे कुछ बेटे-बेटियां राजनीतिक रोटियां सेंकते हुए अपना भविष्य संवारने की सोचते हैं. सोचना भी चाहिए, लेकिन जब सवाल बाप की प्रतिष्ठा से जुड़ा हो तब बच्चों का खून खौलना चाहिए. यदि तुम अपने पिता और परिवार की गरिमा के लिए जमाने से लड़ नहीं सकते, भिड़ नहीं सकते तो यकीन मानो बड़ी जल्दी तुम नष्ट हो जाओगे. तुम्हारी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं धरी रह जाएंगी. इतिहास तुम्हें उठा कर उस 'अकुरड़ी' पर फेंक देगा जिस पर कुकुरमुत्ते भी उगने से शर्माते हैं. याद रखो, संघर्षशील लोग ही इतिहास में दर्ज होते हैं, दुनिया में रेंग कर चलने वालों के फन हमेशा कुचल दिये जाते हैं. इसलिए अभी भी वक्त है मेरे बच्चों संभल जाओ, राजनीति करो लेकिन अपने परिवार के लोगों से गद्दारी मत करो. दलगत राजनीति से ऊपर उठो, अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए हर सत्ता से भिड़ने का माद्दा रखो, फिर भले ही वह तुम्हारी अपनी पार्टी की सरकार क्यों ना हो !

मैं यह भी जानता हूं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था ने मेरे कुछ बच्चों को भ्रष्ट और निकृष्ट बना दिया है. उन्हें सिर्फ स्वार्थ सिद्धि के अलावा कुछ दिखाई ही नहीं देता. वे शायद भूल चुके हैं कि उनका अस्तित्व मुझसे ही है, मेरा मान सम्मान बचेगा तभी उनकी दुकानदारी कायम रह पाएगी. मैं उनकी सारी गलतियां माफ कर सकता हूं बशर्ते वे आज घड़ी परिवार की प्रतिष्ठा बचाने के लिए जूझ रहे बच्चों के साथ खड़े हों, उनके साथ लड़ने मरने को तैयार हों. यदि इनका जमीर अभी नहीं जागा तो उन हरामियों से मुझे कुछ नहीं कहना !

संघर्ष की राह पर चलने वाले सिरफिरों से कहना चाहता हूं, " मेरे प्यारे बच्चों, क्रांति की राह पर जोश अक्सर होश खो देता है, तुम्हारा दिल आग पर और दिमाग बर्फ पर होना चाहिए. अनुशासित और मर्यादित संघर्ष ही सफल हो पाते हैं. अपने मन को बार-बार मजबूती दो, तुम्हें सफल होना है."

जब-जब तुम्हारे कदम लड़खड़ाने लगेंगे, आस्था और विश्वास डगमगाने लगेंगे, मैं तुम्हें जगाने के लिए फिर आऊंगा. इस बात के साथ कि-

मैं तुमको विश्वास दूं
तुम मुझको विश्वास दो
शंकाओं के सागर हम लंघ जाएंगे मरुधरा को मिलकर स्वर्ग बनाएंगे.

तुम्हारा पिता
सूरतगढ़

ग्रामीण क्षेत्र प्रतिभाओं की खान है, बस उचित अवसर और सही मंच मिले

अकादमी पुरस्कार घोषित होने पर इक्कीस कॉलेज की छात्रा निर्मला का गांव में हुआ सम्मान

लूणकरणसर, 25 मार्च। 'ग्रामीण क्षेत्र प्रतिभाओं की खान है, बस उचित अवसर और सही मंच मिलना जरूरी है। यह बात मलकीसर बड़ा निवासी सीताराम सारस्वत ने कही। अवसर था गांव की बेटी निर्मला शर्मा के सम्मान समारोह का, जिसकी वे अध्यक्षता कर रहे थे। 
ज्ञात रहे निर्मला शर्मा को राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर ने अपना राज्य स्तरीय चंद्रदेव शर्मा साहित्य पुरस्कार देने की घोषणा की है। उसकी इस उपलब्धि पर शनिवार को ग्राम मलकीसर बड़ा के सामुदायिक भवन में ग्रामीणों द्वारा सम्मान समारोह आयोजित किया गया। इस दौरान साफा पहनाकर तथा सम्मान प्रतीक देकर शर्मा का अभिनन्दन किया गया। ग्रामीण विकास पब्लिक शिक्षण संस्थान के व्यवस्थापक मामराज कूकणा ने कहा कि यह पुरस्कार सिर्फ गांव की ही उपलब्धि नहीं बल्कि सम्पूर्ण जिले के लिए गौरव की बात है। गौरतलब है कि निर्मला ने अपनी विद्यालय शिक्षा ग्रामीण विकास शिक्षण संस्थान से ग्रहण की है।


इक्कीस संस्थान के चेयरमैन आशा शर्मा ने कहा कि हमें गर्व है हमारे कॉलेज की बेटी ने कलम उठाई है।
साहित्यकार राजूराम बिजारणियां ने कहा कि यह क्षेत्र साहित्य की दृष्टि से उर्वर है। साहित्य महोपाध्याय नानूराम संस्कर्ता की साहित्यिक विरासत में निर्मला का नाम शामिल होना गौरवान्वित करता है। इक्कीस कॉलेज के डॉ.हरिमोहन सारस्वत 'रूंख' ने बेटियों को निरंतर तालीम दिलवाने पर जोर दिया ताकि पठन-लेखन का स्तर और बेहतर हो। सम्मान समारोह में उपस्थित पूर्व सरपंच हीराराम गोदारा, ताराचंद सारण, पंचायत समिति, लूणकरणसर उप प्रधान कैलाश शर्मा, द्वारका प्रसाद सारस्वत, रामेश्वरलाल सारस्वत, जमनाराम, ओमप्रकाश शर्मा, लीलाधार सारस्वत, किशन शास्त्री, भगवानाराम सारस्वत, दिनेशकुमार, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता संतोष एवं राधा सिद्ध ने इस पुरस्कार को गांव की नन्ही प्रतिभाओं के लिए प्रेरणास्रोत बताया। गौरतलब है कि निर्मला को यह पुरस्कार कहानी विधा के लिए उनकी कहानी "कोई चारा नहीं" को दिया जाएगा।

Friday, 24 March 2023

अकादमी साहित्य पुरस्कार इक्कीस कॉलेज की निर्मला शर्मा को


लूणकरणसर उपखण्ड में पहली बार मिला है किसी को यह पुरस्कार

लूणकरणसर, 24 मार्च। राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर  का राज्य स्तरीय चंद्रदेव शर्मा साहित्य पुरस्कार इस बार इक्कीस कॉलेज, गोपल्याण की छात्रा निर्मला शर्मा को दिए जाने की घोषणा की गई है। साहित्य अकादमी अध्यक्ष डॉ.दुलाराम सारण और डॉ.सचिव बसंतसिंह सोलंकी ने शुक्रवार को वर्ष 2022-23 के विभिन्न साहित्यिक पुरस्कारों की घोषणा उदयपुर में अकादमी कार्यालय से की।

निर्मला को यह पुरस्कार कहानी विधा के लिए मिलेगा। पिछले दिनों हुए लम्पी रोग को केंद्र में रखकर लिखी गई उनकी कहानी "कोई चारा नहीं" के लिए यह पुरस्कार घोषित हुआ है। यह पुरस्कार उनको आगामी दिनों में आयोजित अकादमी के भव्य समारोह में दिया जाएगा। इसके अलावा एकांकी विधा के लिए तनिष्का पड़िहार, तारानगर, कविता विधा के लिए हिमांशु भारद्वाज, चूरू, निबन्ध विधा के लिए मैना कंवर सुजानगढ़ को यह पुरस्कार दिया जाएगा।

गौरतलब है कि निर्मला शर्मा स्नातक द्वितीय वर्ष की विद्यार्थी है। मलकीसर बड़ा गांव की निर्मला के पिता ओमप्रकाश खेती करते है वहीं मां कृष्णा देवी गृहणी है। साहित्य से सरोकार रखने वाली निर्मला कॉलेज के साहित्यिक वातावरण को अपने लेखन का आधार मानती है।


● इनको देती है श्रेय-

निर्मला का कहना है कि "इक्कीस कॉलेज का वातावरण साहित्यिक है। यहाँ की लाइब्रेरी समृद्ध है। कॉलेज के  डॉ.हरिमोहन सारस्वत, राजूराम बिजारणियां और आशा शर्मा का सानिध्य लेखन के प्रति हमेशा प्रेरित करता है।"

● खुशी का इज़हार-

निर्मला शर्मा को चन्द्रदेव शर्मा पुरस्कार मिलने पर साहित्यकार राजूराम बिजारणियां, हरिमोहन सारस्वत 'रूंख', आशा शर्मा, कैलाश कुमार, हरिसिंह, संतोष, भीमसेन, ओंकारनाथ योगी, रामजीलाल घोड़ेला, जगदीशनाथ भादू, दुर्गाराम स्वामी, कान्हा शर्मा, नन्दकिशोर सारस्वत सहित विभिन्न जनों ने बधाई दी।

Monday, 27 February 2023

'आधुनिक बाल साहित्य:दशा एवं दिशा' पर जोधपुर में हुआ विमर्श


आयोजन में बिजारणियां और लढ़ा ने की शिरकत

तकनीकी युग में बाल साहित्य ही बचा सकता है संस्कारों की थाती

लूणकरणसर, 27 फरवरी राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर एवं चनणी फाउण्डेशन, जोधपुर के संयुक्त तत्वावधान में जोधपुर आयोजित साहित्यिक आयोजन में लूणकरणसर उपखण्ड के साहित्यकार राजूराम बिजारणियां और मदनगोपाल लढ़ा ने शिरकत की। जोधपुर के होटल चंद्रा इन में आयोजित इस कार्यक्रम में राज्य बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष संगीता बेनीवाल और अकादमी अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया। लूणकरणसर के कवि, चित्रकार राजूराम बिजारणियां ने "वर्तमान में बाल साहित्य लेखन और चुनौतियां" विषय पर पत्रवाचन करते हुए कहा कि तकनीकी युग में बाल साहित्य ही संस्कारों की थाती को बचा सकता है। महाजन के डॉ. मदन गोपाल लढ़ा ने प्रथम सत्र में अध्यक्षता का दायित्व निभाते हुए कहा कि घर में किताब का कोना होना चाहिए ताकि पठन की संस्कृति बची रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में सरदार व.भा. पुलिस वि.वि., जोधपुर, कुलसचिव, श्वेता चौहान (आई.ए.एस.) का सानिध्य रहा। कार्यक्रम संयोजक संतोष चौधरी ने फाउंडेशन की ओर से आभार प्रकट किया।

फूल वाली पार्टी ने किसे बनाया 'फूल' !


(स्वागत की फूल मालाओं के बहाने)


अनजाने होठों पे
क्यों पहचाने गीत हैं
कल तक जो बेगाने थे
जन्मों के मीत हैं
क्या होगा कौन से पल में
कोई जाने ना ....

लगभग 55 वर्ष पूर्व लिखा गया इंदीवर का यह गीत सूरतगढ़ की वर्तमान राजनीतिक पर सटीक बैठता है। पालिकाध्यक्ष ओमप्रकाश कालवा को पानी पी-पीकर कोसने वाले भाजपाई आज उनके स्वागत के लिए बेताब हुए जा रहे हैं। वैसे उन्हें खुशियां मनाने का हक भी है क्योंकि कालवा के बहाने उन्होंने कांग्रेस को पटखनी दी है, गंगाजल मील को आईना दिखाया है। लेकिन इस घटनाक्रम से जनता के समक्ष भाजपा का चाल, चरित्र और चेहरा एक बार फिर उजागर हो गया है। सच्चाई यह है कि अनुशासन, स्वाभिमान और राष्ट्रप्रेम का दंभ भरने वाली भाजपा राजनीतिक स्वार्थों के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

बहुत दिन नहीं हुए जब यही ओम कालवा विधायक रामप्रताप कासनिया को पालिका की बैठकों में बोलने तक नहीं दिया करते थे, वरिष्ठ होने के बावजूद उन्हें साइड में एक कुर्सी पर बिठाया करते थे और बहसबाजी में तू-तड़ाक पर उतर आते थे। कासनिया तो अपने वक्तव्य में हमेशा कालवा पर दोषारोपण करते थे कि उसने पूरे शहर की ऐसी-तैसी कर दी है। लेकिन वक्त ऐसा बदला कि आज दोनों गलबहियां डालकर एक दूसरे की शान में कसीदे पढ़ रहे हैं। हकीकत दोनों जानते हैं कि उनके बीच उमड़ता प्रेम सिर्फ जरूरत का सौदा है, और कुछ नहीं। कासनिया जैसे चतुर राजनीतिज्ञ ओम कालवा पर कितना भरोसा करेंगे यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन इतना वे जरूर जानते होंगे कि जो व्यक्ति अपार मान सम्मान देने वाली पार्टी और स्टैंड करने वाले अपने राजनीतिक आकाओं का ही नहीं हो सका वह उनका कैसे हो सकता है !

दरअसल, कालवा हो या कासनिया, राजनीति की बिसात पर सब मोहरे हैं। कौन कब किसको मात देकर कहां जा मिले, कुछ नहीं कहा जा सकता। विश्वास और भरोसे जैसे शब्द सामाजिक जीवन में होते हैं राजनीति तो सर्वप्रथम इन शब्दों का गला घोंटती है। भरोसा टूटने के बाद साधारण आदमी तो आंख मिलाने की हिम्मत नहीं कर सकता जबकि राजनीति तो आंखों की शर्म और लिहाज पहले ही ताक पर रख चुकी होती है।

इस घटनाक्रम का लब्बोलुआब भी यही है कि सूरतगढ़ का भविष्य ताक पर रख दिया गया है। राज्य की कांग्रेस सरकार कैसे बर्दाश्त करेगी कि उनका एक प्यादा दगाबाजी करते हुए राजनीतिक प्रतिद्वंदी से जा मिले। गंगाजल मील, जिन्होंने कालवा को पाल-पोस कर खड़ा किया, चोट खा कर चुप थोड़े ही बैठने वाले हैं ! वे भी अपने दांव चलेंगे। पालिका के ईओ से तो कालवा की पहले ही ठनी हुई है, तिस पर ईओ ठहरा कांग्रेस सरकार का मुलाजिम ! सीवरेज घोटाले का जो मुकदमा अब तक सीआईडी सीबी में ठंडे बस्ते में था अब उस पर कार्यवाही होना भी तय है। 'आज तेरी, तो कल मेरी !' यही राजनीति है।

ऐसी परिस्थितियों में सवाल उठता है कि नगरपालिका में आए डेडलॉक का खामियाजा कौन भुगतेगा ! फुल वाली पार्टी ने आखिर किसे फूल बनाया ? कांग्रेस को, गंगाजल मील को, ओमप्रकाश कालवा को या फिर खुद अपने समर्पित कार्यकर्ताओं को ! इतना तय है कि दोनों सवालों के बीच सबसे बड़ा फूल जनता ही बनी है। एक पावरलेस चेयरमैन को पाकर भाजपा खुश भले ही हो ले लेकिन शहर की जनता को देने के लिए उनके पास सिवाय थोथे वायदों के कुछ नहीं है।

डॉ. हरिमोहन सारस्वत

Sunday, 26 February 2023

मीलों के आत्ममंथन का वक्त !



( कालवा दलबदल के बहाने)

जिस आदमी को आप सहारा देकर खड़ा करते हैं, उसे चलना सिखाते हैं, भागदौड़ के बीच प्रतिद्वंद्वियों को पटकना सिखाते हैं, एक दिन वही आदमी आप द्वारा सिखाए गए दांव पेच इस्तेमाल करते हुए आपको ही पटक देता है तो सोचिए आप कैसा महसूस करेंगे ? यदि बात राजनीति की हो तो यह दर्द और गहरा हो जाता है।

सूरतगढ़ विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस पार्टी की धूरी कहे जाने वाले मील परिवार के साथ कमोबेश ऐसा ही कुछ हुआ है। पूर्व विधायक गंगाजल मील द्वारा आशीर्वाद प्राप्त नगर पालिका चेयरमैन ओमप्रकाश कालवा ने उन्हें धोबी पछाड़ दांव लगाकर ऐसी ही पटखनी दी है। 'गाय तो गई, सागै गल़ावंडो ई लेयगी' की तर्ज पर कालवा अपने चहते पार्षदों को भी भाजपा में ले गए। नगर पालिका मंडल में कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत एक झटके से अल्पमत में बदल गया, और विडंबना देखिए, अविश्वास प्रस्ताव की गेंद कांग्रेस के पाले में आ गई है। परिस्थितियां भी ऐसी बनी हैं कि कांग्रेस का कुछ भी बंटता दिखाई नहीं देता। मीलों के प्रभाव से यदि राज्य सरकार कुछ हस्तक्षेप करेगी तो कालवा को न्यायालय से राहत मिलना तय है।


कालवा का भाजपा में पदार्पण कोई बड़ी बात नहीं है, राजनीतिक गलियारों में ऐसा होता आया है। लेकिन कालवा ने मील परिवार पर जो गंभीर आरोप लगाए हैं वे उन्हें बड़ा राजनीतिक नुकसान दे सकते हैं। कालवा के अनुसार पूर्व विधायक गंगाजल मील परिवारवाद की राजनीति कर रहे थे और उन पर गलत कामों के लिए दबाव डाल रहे थे, ऐसे में कांग्रेस को अलविदा कहने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं था। जनमानस में सवाल उठना स्वाभाविक है कि मीलों द्वारा आखिर कौनसे गैर कानूनी काम करवाने का दबाव डाला जा रहा था ?

गौरतलब है कि गंगाजल मील और हनुमान मील के रूप में मील लगातार दो चुनाव हार चुके हैं, तीसरा चुनाव सिर पर है। ऐसी स्थिति में अपना राजनीतिक कद बनाए रखने के लिए यह जरूरी हो जाता है कि मील अपना आत्म मंथन करें। यदि 2023 के चुनाव में वह जीत का स्वाद चखना चाहते हैं तो उन्हें अपनी कमजोरियों और गलतियों से सबक सीखना होगा अन्यथा क्षेत्र की राजनीति उन्हें खारिज कर देगी।

ताजा मामले का ही उदाहरण ले लें। पिछले दो वर्ष से मीडिया लगातार ओमप्रकाश कालवा की भ्रष्ट कार्यशैली को उजागर कर रहा था। खबरनवीसों ने बहुत पहले ही चेता दिया था कि यह आदमी आप की जड़ों में मट्ठा डालने का काम कर रहा है लेकिन उसके बावजूद मील कानों में तेल डाले बैठे रहे, गंगाजल मील खुद कालवा को कांग्रेस का समर्पित कार्यकर्ता और सच्चा सिपाही बताते रहे मगर मौका मिलते ही कालवा अपना रंग दिखा गए। दरबारी सलाहकारों से घिरा मील परिवार भांप ही नहीं पाया कि उनके चहते ही उनके खिलाफ साजिश रच रहे हैं। नगरपालिका की लचर कार्यशैली को वे कभी नियंत्रित ही नहीं कर पाए फिर मामला चाहे अवैध कब्जों का हो या कर्मचारियों के तबादले का, व्यापारियों से विवाद का हो या मीडिया कर्मियों से उलझने का। कालवा अपनी मनमानी करता रहा, मीलों के दरबारी सलाहकारों को मैनेज कर उन्हें गुमराह करता रहा। हकीकत यह है कि चिलम चाटूकारों के जमावड़े से मील जमीनी हकीकत देख ही नहीं पाए। सच्चाई यही है कि दूसरों का चश्मा हमेशा भ्रम पैदा करता है।

पानी जब सिर से गुजरता दिखाई दिया तब हेतराम मील कुछ प्रयास करते दिखे, लेकिन कालवा की घाघ राजनीति के चलते वे भी नाकाम रहे। दरबारियों की कानाफूसी के बीच हनुमान मील चाह कर भी नगर पालिका में चल रही अव्यवस्था का मुखरता से विरोध नहीं कर पाए, जिसका समग्र परिणाम हुआ कि शहरी राजनीति में मील परिवार की किरकिरी हुई है। जाते-जाते कालवा ने गंभीर आरोप लगाकर फजीहत का पूरा ठीकरा मीलों के सिर फोड़ दिया है।

देखना यह है कि गंगाजल मील और उनका परिवार इस दगाबाजी से हुए राजनीतिक नुकसान की भरपाई कैसे करता है। इसके लिए उन्हें गंभीरता से आत्म चिंतन करना होगा। अभी भी उनके हाथ में कुछ पत्ते ऐसे हैं जिन्हें यदि सोच समझकर फेंका जाए तो बाजी पलट सकती है। वक्त हार की कगार पर खड़े सभी सूरमाओं को एक मौका अवश्य देता है।

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Friday, 24 February 2023

कांग्रेस के सिपाही कालवा के पोत चौड़े, दलबदल कर वार्ड 26 की जनता से की सबसे बड़ी गद्दारी

खुद को कांग्रेस का सच्चा सिपाही और कर्मठ कार्यकर्ता बताने वाले ओमप्रकाश कालवा के पोत चौड़े आ गए हैं। पालिका में चल रहे संक्रमण काल के दौरान उन्होंने दल बदल कर साबित कर दिया है कि वह स्वार्थ सिद्धि के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। पूर्व विधायक गंगाजल मील को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे कालवा का यह कदम स्थानीय राजनीति में क्या गुल खिलाता है यह भविष्य के गर्भ में है लेकिन इस निर्णय से नगरपालिका मंडल में उथल-पुथल और पार्षदों की खरीद-फरोख्त बढ़ना तय है।


भाजपा का दामन थामने वाले कालवा ने कांग्रेस के साथ गद्दारी की है या नहीं, यह तो वही जानें, लेकिन इतना तय है की वार्ड 26 की जनता के साथ उन्होंने गद्दारी की है। कालवा द्वारा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने से वार्ड की जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। पार्षद से चेयरमैन तक का सफर कालवा ने इसी वार्ड के लोगों के वोटों के बूते तय किया था।

गौरतलब है कि यह वार्ड नगर पालिका चुनाव में सामान्य सीट का वार्ड था। लाइनपार सूर्य नगरी से आकर इस मोहल्ले में नये बसे कालवा ने लोगों के समक्ष गुहार लगाई कि यदि वार्ड के लोग उसे मौका दें तो जीतने के बाद उसे चेयरमैन बनाया जा सकता है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वह वार्ड के विकास में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। चापलूसी भरी बातें और पूर्व में शिक्षक होने के चलते वार्डवासियों ने न सिर्फ उन पर भरोसा किया बल्कि अनुसूचित जाति होने के बावजूद सामान्य वार्ड से ओमप्रकाश कालवा को कांग्रेस की टिकट पर भारी मतों से जिताया था।

आज वार्ड के लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करते हुए कालवा ने वार्ड की जनता के साथ गद्दारी की है । जिस जनता ने कांग्रेस के नाम पर कालवा को वोट दिये और चेयरमैन बनाया, उनसे बिना किसी चर्चा के दल बदल कर उन्होंने साबित कर दिया है कि वे अपने वार्डवासियों के ही नहीं हुए तो शहर के हितैषी कैसे हो सकते हैं ! भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे कालवा ने अपना असली रंग दिखाते हुए गंगाजल मील की पीठ में छुरा भोंकने का काम किया है। वही गंगाजल मील, जो यह कहते नहीं अघाते थे कि हमने कांग्रेस के एक सच्चे सिपाही को पालिकाध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाया है, एक ईमानदार शिक्षक को शहर का मुखिया बनाया है, खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

बहरहाल, राजनीतिक स्वार्थों के चलते इस कदर जनभावनाओं की अनदेखी करने की सजा कालवा को मिलना तय है। भाजपा जैसी पार्टी में जहां पहले ही एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति है, में जाकर अपना मुकाम बनाना या फिर सांसद और विधायकी के सपने देखना मुसद्दीलाल की कल्पनाएं मात्र हैं।

Monday, 20 February 2023

लंबी लकीर खींची है मधु आचार्य ने !


(साहित्य अकादमी में राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के कार्यकाल की समीक्षा)


साहित्य अकादमी में राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल का कार्यकाल मार्च 2023 को समाप्त हो रहा है। इस पंचवर्षीय कार्यकाल की अवधि में दो वर्ष तो कोरोना की भेंट चढ़ गए लेकिन उसके बावजूद मंडल के समन्वयक मधु आचार्य साहित्य संपादन, लेखन और प्रोत्साहन की गतिविधियों को लेकर एक लंबी लकीर खींचने में कामयाब रहे हैं।

चूंकि मधु आचार्य पत्रकारिता के क्षेत्र से हैं और उनके पास हिंदी के शीर्ष समाचारपत्र दैनिक भास्कर के संपादन का लम्बा अनुभव है, लिहाजा उनके कमान संभालने से यह तो लगभग तय ही था कि साहित्य अकादमी में राजस्थानी परामर्श मंडल को तुलनात्मक दृष्टि से बेहतरीन नेतृत्व मिलेगा, लेकिन कोरोना संकट के चलते किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि उनके कार्यकाल के दौरान सृजन, लेखन, अनुवाद और संपादन सहित साहित्य के अनछुए विषयों पर महत्वपूर्ण काम होगा।

आचार्य के इस कार्यकाल में साहित्य अकादमी की गतिविधियों ने राजस्थानी साहित्य के सृजन और विकास में एक अनूठा मुकाम बनाया है। परामर्श मंडल द्वारा अकादमी के देश भर में आयोजित कार्यक्रमों में विविधता और निरंतरता बनी रही है। कोरोना काल में जहां विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर लगातार ऑनलाइन सेमिनार्स आयोजित हुए वहीं आजादी के 'अमृत महोत्सव' के दौरान राजस्थानी साहित्य की लगभग सभी विधाओं पर विमर्श और सृजन के समानांतर आयोजन हुए। खास बात यह रही कि इन आयोजनों में अनेक नए और युवा रचनाकारों को सृजन के अवसर मिले हैं। महिला लेखन को प्रोत्साहन दिया जाना भी मंडल की नई पहल कहा जा सकता है।

इस कार्यकाल की उपलब्धियां देखें तो ''राजस्थानी में गांधी' विषय पर पहली बार 'सिंपोजियम' आयोजित हुआ जिसका सकारात्मक परिणाम यह रहा कि राजस्थानी में महात्मा गांधी पर एक बेहतरीन पुस्तक प्रकाश में आई। आचार्य द्वारा संपादित यह पोथी शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार
कहानी विधा पर आलोचना के महत्वपूर्ण शोधपत्रों की संपादित पुस्तक 'राजस्थानी कहाणी' (परंपरा री दीठ अर आधुनिकता री ओल़खाण) भी महत्वपूर्ण है।

आचार्य के प्रयासों से अकादमी द्वारा 'इक्कीसवीं सइकै री राजस्थानी कहाणी' (कहानी संग्रह), 'इक्कीसवीं सइकै री राजस्थानी कविता', 'रेत सागै हेत', (कविता संग्रह), 'राजस्थानी बाल काव्य', 'राजस्थानी बाल कथा साहित्य' रेवतदान चारण की कविताओं का संचयन' और 'कन्हैयालाल सेठिया की कविताओं का संचयन' जैसी संग्रहणीय पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है।

अनुवाद की बात करें तो आचार्य के कार्यकाल में साहित्य अकादमी की 24 भाषाओं में सबसे अधिक काम राजस्थानी में हुआ है। उनके नेतृत्व में पंजाबी विश्वविद्यालय, अमृतसर में महत्वपूर्ण अनुवाद कार्यशाला का आयोजन संभव हो पाया जिसके फलस्वरुप पंजाबी से राजस्थानी और राजस्थानी से पंजाबी अनुवाद के दो महत्वपूर्ण कहानी संग्रह तैयार हुए हैं। इसके अतिरिक्त अनेक नए युवा अनुवादकों द्वारा विभिन्न भाषाओं की अनेक महत्वपूर्ण कृतियों का राजस्थानी अनुवाद संभव हो सका है।

अकादमी द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों पर यदि चर्चा ना हो तो बात पूरी नहीं हो सकती। साहित्यकारों के एक धड़े द्वारा हमेशा इनकी आलोचना की जाती रही है। अकादमी पुरस्कारों के अपने मानदंड होते हैं लेकिन इतना तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि पूर्व में दिए गए पुरस्कारों की तुलना में मंडल द्वारा तुलनात्मक रूप से काफी हद तक पारदर्शिता बरती गई है। निर्णयन प्रक्रिया में राजस्थान भर के साहित्यकारों को सहभागी बनाया जाना इस बात का द्योतक है कि मंडल ने बेहतर करने का प्रयास किया।

समाहार स्वरूप यह कहा जा सकता है कि आचार्य की यह खेचल़ नयी टीम के लिए प्रेरणादायी होने के साथ-साथ चुनौती का काम भी करेगी। इसे लांघने के लिए नई कार्यकारिणी को भरपूर ऊर्जा के साथ बेहतर प्रदर्शन करना होगा।

- डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

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