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Thursday, 4 June 2020

बारात आ गई क्या !

पगडंडियों के दिन (10)

बारात आ गई क्या ! शादी-विवाह के दिनों में यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण हुआ करता था लेकिन बदले हुए वक्त में इसकी रंगत भी धूमिल पड़ चुकी है. देहात की बात छोड़ दें तो शहरीकरण के दौर में अब घर के सदस्यों और गिने-चुने परिजनों के अलावा किसी को उत्सुकता नहीं होती कि बारात आई या नहीं. कभी-कभी तो हालत यह होती है कि घोड़ी पर चढ़ा दूल्हा बेचारा पीछे मुड़कर देखता है तो घर परिवार के पांच दस लोगों के अलावा वहां कोई नहीं होता. कमबख्त सारे बाराती उससे पहले ही विवाह स्थल पर पहुंचकर दावतें उड़ाने में जुटे रहते हैं. मैरिज पैलेस संस्कृति ने बारात स्वागत और आवभगत के मायने ही बदल दिए हैं. अब घराती और बाराती में फर्क मिट चुका है. बाजारवाद के चलते हालात यहां तक बदल चुके हैं कि बारात स्वागतकर्ताओं का स्थान भी वेलकम गर्ल्स ने ले लिया है.

एक वक्त था जब पूरे गली, मोहल्ले और विवाह में आए सभी मेहमानों की दिलचस्पी बारात आगमन में रहती थी. नाचते झूमते बारातियों की रौनक से गली ही नहीं, पूरा शहर झूम उठता था. बारात पहुंचने से पहले क्या मजाल, कि खाना शुरू हो जाए. पुराने संस्कारी लोग तो लड़की के विवाह में बान देने अवश्य जाते थे लेकिन वहां खाना नहीं खाते थे. उन दिनों लड़कियों को सांझी विरासत माना जाता था और बारात का स्वागत पूरे नगर का दायित्व. लेकिन परंपराओं और संस्कारों में बदलाव की बयार ने सब अस्त-व्यस्त कर दिया है.

70 - 80 के दशक में मध्यमवर्गीय परिवारों की शादियों को याद कीजिए. विवाह प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी घर परिवार और मित्र बंधु ही मिलकर उठाया करते थे. उन दिनों मैरिज पैलेस और इवेंट मैनेजमेंट कंपनीज तो थी नहीं, लिहाजा बारातों को स्कूल, धर्मशाला या किसी मंदिर में बने भवनों में ही ठहराया जाता था. गली में ही शामियाना लगाकर बारात स्वागत की सभी रस्में निभाई जाती थी. इस खातिरदारी में परिवार के मित्र, बंधु और मोहल्ले के लोग ही मिलजुल कर काम किया करते थे.

विवाह से लगभग 10 दिन पहले फर्रियां बनाने का काम शुरु होता. रंगीन कागज की तिकोनी फर्रियां बहुत खूबसूरत होती थी. बाजार में कटिंग की हुई फर्रियां मिलती थी जिन्हें लेई लगाकर मजबूत सूतली पर थोड़ी थोड़ी दूरी पर चिपका दिया जाता. फर्री बनाने का काम किसी अनुभवी की देखरेख में मोहल्ले के लड़के ही किया करते. शादी वाले घर और गली को फर्रियों को से सजा दिया जाता. फर्रियां संकेत चिन्ह थी कि यहां कोई मांगलिक उत्सव होने वाला है. आप कहेंगे विद्युत बल्ब की लड़ियां फिर कब लगती थी ! लड़ियों की सजावट तो शादी से एक या दो दिन पहले की जाती थी. विद्युत सजावट का यह खर्चा उठाना सबके वश की बात भी नहीं थी उन दिनों !

विवाह में टेंट से सामान लाना भी बड़ा काम होता था. इसके लिए गृह स्वामी द्वारा बाकायदा मोहल्ले के अनुभवी आदमी की ड्यूटी लगाई जाती जो मेरे जैसे दो तीन नौसिखिए लड़कों के साथ टेंट हाउस से सामान गिनवाकर लाता. विवाहोपरांत इस सामान को वापिस भेजने में ज्यादा परेशानी होती. बर्तनों को गिनने में दो-चार गिलास, कटोरी, प्लेट या जग का कम होना स्वाभाविक सी बात थी लेकिन उन्हें ढूंढने में खासा मशक्कत करनी पड़ती. यदि एक आध कुर्सी और गद्दे घट जाते तो गृह स्वामी द्वारा सेवादारों की खिंचाई भी कर दी जाती जिसका कोई बुरा माने तो मानता रहे. कई बार बर्तन और गद्दे मंदिरों और गुरुद्वारों से भी लाए जाते थे. यह चलन तो अभी भी कई जगह देखने को मिलता है.

बारात के खाने के लिए शामियाना लगाकर उसे सुसज्जित करने की जिम्मेदारी गली के लड़कों की ही होती. शामियाने के आगे लंबी गैलरी और प्रवेश द्वार बनाया जाता जिसकी विशेष सजावट की जाती थी. लकड़ी के बुरादे को अलग-अलग रंगों में भिगोकर एक मिश्रण तैयार किया जाता जो देखने में बड़ा शानदार होता. पारंपरिक चित्रकला शैली के जानकार उस बुरादे से प्रवेश द्वार और शामियाने तक जाने वाली गैलरी के भीतर रंगोली कला से ऐसी साज सज्जा करते कि बाराती भी प्रवेश करने से पहले उसका अवलोकन करते. खुले मन से सजावट करने वाले कलाकारों की भरपूर सराहना होती.

वेटर्स का चलन उन दिनों न के बराबर था. टेंट के भीतर झाड़ू लगाने से लेकर मेजपोश बिछाने तक का काम मित्र-बंधुओं द्वारा ही किया जाता था. सब्जियां लाने, सलाद काटने और प्लेटो में सजाने का काम भी गली के लड़के ही किया करते थे. यदि हलवाई आदेश करता तो दाल भी पिसवा कर लानी पड़ती. चूंकि खाने में उस समय तक बुफे सिस्टम नहीं आया था इसलिए बारातियों को कुर्सी मेजों पर बिठाकर ही पूरी मान मनुहार के साथ खाना खिलाया जाता था. खाना परोसने का काम भी मोहल्ले के जिम्मेदार लड़के और घर के रिश्तेदार ही किया करते थे. क्या मजाल आवभगत में कोई कमी रह जाए. दूल्हे और उसके दोस्तों के लिए अलग से टेबल लगाकर खास व्यवस्था होती थी जिसकी देखरेख स्वागत दल के विशेष लोग करते थे. आज यह स्थान वेटर्स के हेड द्वारा हड़प लिया गया है जो टिप के इंतजार में औपचारिकता को पहने रखता है.

आजकल तो विवाह समारोह शाम को शुरू होकर आधी रात तक निपट जाता है जबकि उस दौर में अगले दिन सुबह तक की खातिरदारी करवाने के बाद ही बारातें रवाना होती थी. स्वागत और सत्कार की परंपराएं विलुप्त होने से आज हम खुद को खाली सा महसूस करते हैं. मशीनी युग ने हमारी संवेदनाओं को औपचारिकताओं में बदल कर रख दिया है जिसका कोई समाधान नहीं है. गुजरे हुए वक्त को लाया नहीं जा सकता सिर्फ यादों में गुनगुनाया जा सकता है.
-रूंख

Wednesday, 3 June 2020

राजेश के बिना नहीं हो सकता पोस्टमार्टम

मानस के राजहंस (2)

नियति कभी-कभी कुछ ऐसे काम सौंपती है जिसे करने के लिए जल्दी से कोई हामी नहीं भरता. लेकिन सामान्य से दिखने वाले ये काम इतने महत्वपूर्ण होते हैं कि इन के न होने से एक बार तो सारी व्यवस्थाएं और सारे काम अटक जाते हैं.

 ऐसा ही एक महत्वपूर्ण काम राजेश वाल्मीकि कर रहे हैं. जी हां, राजेश राजकीय चिकित्सालय, सूरतगढ़ में पिछले 15 सालों से पोस्टमार्टम के समय डॉक्टरों के निर्देशानुसार लाशों की चीरा-फाड़ी का काम करते हैं. यदि राजेश नहीं है तो चिकित्सालय में अक्सर पोस्टमार्टम का काम अटक ही जाता है.

मोर्चरी में जब भी दुर्घटना या अकाल मृत्यु होने पर लाश पहुंचती है तो स्वाभाविक है परिजनों सहित अन्य लोगों की भी वहां भीड़ एकत्रित हो जाती है. दु:ख और शोक की ऐसी घड़ी में सब अपनी-अपनी संवेदनाएं व्यक्त करते हैं. कैसे हुआ, क्या हुआ, जैसे सवालों के बीच सबके चेहरों पर मौत का सन्नाटा पसरा होता है. लेकिन इन सबके बीच निर्विकार भाव से राजेश को अपना काम करना ही पड़ता है.

चूंकि कानूनन ऐसी मौतों के मामले में पोस्टमार्टम होना जरूरी है, इसलिए विधिवत मेडिकल बोर्ड बनाया जाता है जिसमें वरिष्ठ चिकित्सक शामिल रहते हैं. इन्हीं डॉक्टर्स की देखरेख में लाशों की चीरा-फाड़ी होती है. अक्सर यह काम चिकित्सालय के वरिष्ठ सफाईकर्मियों द्वारा किया जाता है.

राजेश लंबे समय से मोर्चरी में काम कर रहे हैं. वे कहते हैं मेरे मन में भी मृतकों के परिजनों के प्रति शोक संवेदनाएं उमड़ती है लेकिन उसके बावजूद मुझे अपना काम करना होता है. कभी-कभी तो मोर्चरी में 10-12 दिन पुरानी सडांध मारती सड़ी- गली लाशें भी आ जाती है. ऐसे वहां खड़ा रहना भी दूभर हो जाता है. लेकिन काम तो काम है. बहुत बार ऐसा भी होता है कि राजेश चिकित्सालय में नहीं है तो पोस्टमार्टम में देरी होना स्वाभाविक है. चूंकि उस वक्त माहौल ऐसा रहता है कि सबको पोस्टमार्टम की जल्दी लगी रहती है, ऐसे में मृतक के परिजन और अन्य लोग राजेश को देरी के लिए लताड़़ते भी हैं और उससे उलझ भी पड़ते हैं.

अब राजेश तो राजेश है, उसके सीने में भी दिल है. बकौल राजेश आदमी की लाश से चीरा-फाड़ी शुरू करने से पहले उसे भी अपने दिमाग को स्थिर करने के लिए कुछ समय तो चाहिए. आखिर वह भी आदमी है. 

राजेश हमारी दुनिया में मानस के राजहंस सरीखे हैं. संकट और शोक की घड़ी में हमें उनकी जरूरत है बस इतनी सी बात समझने की है.सेल्यूट मेरे दोस्त राजेश, लगे रहो कि यह दुनिया सुंदर बनी रहे.
-रूंख

Sunday, 31 May 2020

विष्णु से 'आर्ट ऑफ लिविंग' सीखें हमारे अधिकारी

ईमानदारी की गूंज हमेशा बड़ी होती है जिसका प्रभाव दीर्घकाल तक चलता है. राजगढ़ के थानाधिकारी विष्णुदत्त बिश्नोई की मौत के मामले में यह गूंज सामाजिक, राजनीतिक और क्षेत्रीय बंधनों को लांघती हुई विदेशों तक जा पहुंची है. सब हैरान हैं कि आखिर इस सुपर कॉप में ऐसा क्या था जो राजस्थान का ही नहीं बल्कि देश में भी सबका चहेता बन गया. लंबे समय बाद किसी पुलिस अधिकारी की संदिग्ध मौत पर जनता आंदोलन की तैयारियां कर रही हैं. निस्संदेह यह उस अधिकारी की कर्तव्य परायणता और ईमानदारी की गूंज है.

राजस्थान पुलिस और प्रशासन में कार्यरत सभी अधिकारियों को इस शहादत से सीख लेने की जरूरत है. ईमानदार अफसर को जनता जो मान सम्मान देती है वह करोड़ों रुपए की रिश्वत से भी नहीं खरीदा जा सकता. जनता के दिलों में जगह बनाने के लिए लोक सेवक बनना पड़ता है. कम से कम अब थानों और दफ्तरों में बैठे अधिकारियों को रिश्वत की कमाई हाथ में लेने से पहले एक बार विष्णु दत्त का चेहरा और उसकी मौत पर रोते लाखों लोगों के आंसुओं को अवश्य याद करना चाहिए. शायद उनकी अंतरात्मा जाग उठे और उनमें भी उसी मान-सम्मान से जीने की इच्छा बलवती हो जिसे विष्णु दत्त ने अपने जीवन काल में पाया था. यदि लोक सेवकों में आत्मसम्मान और कर्तव्यनिष्ठा का भाव जागृत हो जाए तो देश की तस्वीर बदल सकती है. अन्यथा जीवन यापन तो कुकुरमुत्तों का भी होता है जो परजीवी के रूप में जीते हुए खरपतवार की मौत मर जाते हैं. मैंने अपने जीवन काल में किसी भी पुलिस अधिकारी की मौत पर इस कदर और इतने लोगों को मातम मनाते हुए नहीं देखा है जैसा विष्णु दत्त के मामले में हुआ है. यह आर्ट ऑफ लिविंग आज के लोक सेवक को सीखने और सिखाने की जरूरत है.

उनकी मौत के बाद उभरे परिदृश्य ने ड्यूटी के प्रति ईमानदारी और सेवा भाव के अनूठे मापदंड खड़े कर दिए हैं. कहा जा रहा है कि यदि कोरोना संकट के हालात ना होते तो इस मामले में आक्रोश स्वरूप लाखों लोग सड़कों पर उतर आते. लॉकडाउन के प्रतिबंधों के बावजूद विष्णु की पार्थिव देह राजगढ़ और उनके पैतृक गांव लूणेवाला के बीच में जहां-जहां से गुजरी उनके सम्मान में सैकड़ों लोग सड़कों पर खड़े थे. जिस गमगीन माहौल में उनका अंतिम संस्कार किया गया उसने वहां खड़े हर आदमी की आंखों को नम कर दिया.

विश्नोई की मौत का मामला जांच में फंसा हुआ है. पुलिस प्रशासन ने तो क्राइम ब्रांच को मामला सुपुर्द कर जांच शुरू कर ही दी है जबकि विपक्ष सहित कांग्रेस के कई नेता और अनेक स्थानों से उठ रहे जन आंदोलन सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं। गहलोत सरकार इस दबाव के सामने क्या निर्णय लेती है यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा है. लेकिन इतना तय है कि एक ईमानदार पुलिस अधिकारी की शहादत के चर्चे लंबे समय तक लोगों के जेहन में जिंदा रहेंगे.

Saturday, 30 May 2020

सच तो कहना पड़ेगा !

(हिंदी पत्रकारिता दिवस के बहाने)



कैसे कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं
अब तो तालाब का पानी बदल दो 
अब कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं.
                           - दुष्यंत कुमार

नैतिक पतन के इस सार्वभौमिक दौर में हमारे शब्दकोशों में दो शब्द ऐसे नज़र आते हैं जिनकी गरिमा शायद सबसे ज्यादा गिरी है. पहला 'नेता' और दूसरा 'पत्रकार'. शासन प्रणाली की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण कहे जाने वाले इन्ही दो शब्दों के इर्द-गिर्द सत्ता की धूरी घूमती है. दोनों खुद को लोकतंत्र की चारपाई के दो पाये बताते हैं लेकिन विडंबना देखिए, दोनों के लिए आज तक कहीं कोई योग्यता निर्धारित नहीं की गई है जबकि चपरासी के पद की भी न्यूनतम योग्यता शासन द्वारा तय है. हमारे देश में नेताजी बनने के लिए सफेद कुर्ता पायजामा बहुत है तो वहीं पत्रकार के लिए एक पैन और डायरी, ज्यादा हुआ तो कैमरा फोन. और अगर आपको सोशल मीडिया पर पत्रकारिता करनी है तो सिवाय मोबाइल के कुछ भी नहीं चाहिए. कोई कंटेंट नहीं, कोई समाचार नहीं, बस किसी भी घटना को लेकर विषय विशेषज्ञ की तरह पेलना शुरू कर दीजिए. लोग उस पर भी लाइक और कमेंट करने लगेंगे. हालात ऐसे हो गए हैं कि आप कुछ भी परोसें जनता उसमें समाचारों की गंभीरता और सत्यता टटोलने लगेगी. आज का दौर देखते हुए मुझे तो हास-परिहास का कमोबेश यही परिदृश्य नजर आता है.

हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर आज हमारे शब्दकोश के इसी दूसरे शब्द, यानी पत्रकार पर बात करते हैं. 30 मई 1826 को विशुद्ध पत्रकारिता के मिशन भाव से हिंदी साप्ताहिक 'उदन्त मार्तण्ड' का प्रकाशन शुरू हुआ था. यह समाचार पत्र आर्थिक संकट के कारण भले ही लंबे समय न चल पाया हो लेकिन उसके संघर्ष भरे योगदान को नकारा नहीं जा सकता. विषम परिस्थितियों के बावजूद जुगल किशोर शुक्ल ने हाथ से चलने वाली ट्रेडल मशीन पर हिंदी का यह पहला अखबार छाप कर ब्रिटिश दासता के विरुद्ध पत्रकारिता का बिगुल बजाया था. उस वक्त सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन में नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए वचनबद्ध पत्रकारिता का ऐसा प्रादुर्भाव हुआ था जिसमें लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे समर्पित पत्रकारों ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला कर रख दी थी. वैचारिक संप्रेषण का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम अखबार ही था जिसने भारतवर्ष के कोने कोने में आजादी की अलख जगाई थी. स्वतंत्रता आंदोलन में समर्पित पत्रकारों ने जन भावनाओं को मुखरित करने और सरकारी षडयंत्रों का भंडाफोड़ करने में अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी. यहां तक कि पत्रकारिता आंदोलन की महत्ता को देखते हुए खुद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने अखबारों में लिखना शुरु कर दिया था.

पत्रकारिता के इस गौरवपूर्ण अतीत की गाथा ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी देश को बहुत से गंभीर, विचारवान, निडर और लेखनी में ताकत रखने वाले पत्रकार दिए हैं जिन्होंने अपने समाचारों और विश्लेषण के जरिए सरकारों को आईना दिखाया है. लेकिन पिछले तीन दशकों से निरंतर पत्रकारिता के मूल्यों और स्तर में गिरावट देखी गई है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आगमन के बाद तो स्थिति और बदतर हुई है. पत्रकारिता के मूल उद्देश्यों से भटक कर अब अधिकांश पत्रकार सिर्फ बेतुकी और निर्रथक बहसों में उलझ कर रह गए हैं. उन्हें पता ही नहीं है कि देश की राजनीति उनको मोहरा बनाकर अपने हित साधने में लगी हुई है. इस काम में सरकार के पोषक पूंजीपति मीडिया जगत की हस्तियां बन कर पत्रकारों के मुंह में अपने शब्द डाल रहे हैं. राज्यसभा में जाने का लालच और अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के चलते इन पूंजीपतियों ने पत्रकारिता को गर्त में ले जाने का काम किया है. ऐसे राजनीतिक षड्यंत्रों के चलते ही आज के दौर का पत्रकार एक साथ कई खेमों में बंटा हुआ नजर आता है. राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक गुटों में बंटने के बाद उसके पास ना तो घटनाओं के विश्लेषण और चिंतन का वक्त बचा है ना ही वह इस लफड़े में पड़ना चाहता है. सच पूछिए तो पत्रकार की बजाय अब वह कथावाचक की भूमिका में आ गया है जिसे रटे रटाए शब्दों को पढ़ते हुए जनता को गुमराह करने की कोशिश करनी है. कमोबेश यह स्थिति इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में एक जैसी नजर आती है. पत्रकारिता के मूल्यों को ध्यान में रखकर लिखने वाले सच्चे पत्रकारों के लिए यह अत्यंत दु:खद स्थिति है.

पत्रकारिता में लंबे समय से काम करते हुए मुझे यह एहसास हुआ है कि इन गिने चुने पत्रकारों की बात छोड़ दें तो प्रेस की गरिमा घटाने में सबसे बड़ा योगदान खुद पत्रकारों ने दिया है. जिनका काम शासन व्यवस्था पर पैनी नजर रखने और आम आदमी की आवाज को मुखर कर सच उजागर करने का था उनमें से अधिकांश की कलम और शाब्दिक ताकत को स्वार्थ जनित राजनीति अपने चंगुल में ले चुकी है. समझौतापरक भ्रष्ट आचरण ने पीत पत्रकारिता को अपने कुकर्मों में शामिल कर लिया है जिसके चलते आज का पत्रकार समाचारों की बजाय घटनाओं को तरजीह देता है. ये कलम के जंगबाज अपने साथी पत्रकारों से पहले समाचार फेंकने की होड़ में कई बार खुद की फजीहत करवाने से भी नहीं घबराते. यह फार्मूला पत्रकारिता के स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर समान रूप से लागू होता है. पत्रकारिता का दम भरने वाले अनेक स्थानीय पत्रकार तो अपने व्यक्तिगत हित साधने के लिए पालिकाध्यक्षों और विधायकों की चापलूसी में लगे रहते हैं या फिर ब्लैकमेलिंग के इरादे से ओछी घटनाओं को समाचारों का रूप देने की कोशिश करते हैं. उन्हें घटनाओं की गंभीरता और विश्लेषण से कोई मतलब नहीं होता. जबकि पत्रकार द्वारा परोसा गया हर समाचार हमारी सामाजिक सोच को दिशा प्रदान करने में अहम भूमिका निभाता है.

फिर ऐसे दौर में पत्रकारिता कैसे बचेगी ! यह सवाल उठता तो जरूर है लेकिन प्रेस से जुड़ा हुआ कोई व्यक्ति इसका उत्तर नहीं देना चाहता. खुद की तरफ उंगली उठाना हम कहां सीख पाए हैं. प्रेस के संदर्भ में तो हम पहले ही सैद्धांतिक और आदर्शवाद की बातों से ऊब चुके हैं इसलिए उनका कोई औचित्य नहीं है.

हां, इतना जरूर है कि आज भी देश की जनता कुछ कम ही सही, लेकिन नेताओं से अधिक मीडिया पर भरोसा करती है. जिनकी कलम में ताकत है, जो विश्लेषण के साथ समाचारों को प्रस्तुत करते हैं, सामाजिक मूल्यों के प्रति अपनी संवेदना बचाए हुए हैं, सिर्फ उन्ही पत्रकारों में ही उम्मीद की एक किरण बचती है. अन्यथा पतन के इस दौर में एक बार फिर दुष्यंत को याद करते हुए कहना पड़ता है -

.... अब नई तहजीब के पेशे नज़र
हम आदमी को भूनकर खाने लगे हैं.

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'
अध्यक्ष-प्रेस क्लब, सूरतगढ़

Friday, 29 May 2020

पत्रकारिता में रोजगार की संभावनाएं

तीर निकालो न तलवार निकालो
जब तोप मुकाबिल हो, अखबार निकालो

मीडिया की महत्ता किसी से छिपी हुई नहीं है इसीलिए पत्रकारिता यानि प्रेस को लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है. वस्तुतः प्रेस ही है जो लोकतन्त्र में विधायिका के निर्णयों और कार्यपालिका के कामकाज की समालोचनात्मक समीक्षा करती है और जनता तथा सरकार के मध्य एक प्रभावी संवाद व्यवस्था कायम करती है. भारतीय संविधान में भी प्रेस के महत्व को देखते हुए वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को मौलिक अधिकारों में शामिल किया गया है. इण्डियन न्यूज पेपर्स बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया के महत्वपूर्ण वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित कर दिया है कि यह मौलिक अधिकार प्रेस को भी वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार देता है. 

सूचना तकनीकी क्षेत्र में आए क्रांतिकारी परिवर्तनों के चलते पत्रकारिता में भी महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं. एक समय था जब भारत में ट्रेडल मशीनों पर अक्षरों को जोड़-जोड़ कर समाचारपत्र तैयार होता था जो उस समय पत्रकारिता में सूचना सम्प्रेषण का एकमात्र साधन था. उसके बाद रेडियो का जमाना आया जिसमें पत्रकारिता के लिए समाचारों के संकलन, सम्पादन और प्रेषण के नये रास्ते खुले. टेलिविजन प्रसारण आरम्भ होने के बाद तो पत्रकारिता क्षेत्र में रोजगार की इतनी अधिक संभावनाएं बढ़ी हैं कि आज प्रेस  भौगोलिक सीमाओं को लांघती हुई समाचार के घटना स्थल पर तुरन्त पहुंच कर उसे जनता के सामने प्रस्तुत कर देती है. आम आदमी भी समाचारपत्रों और टेलिविजन पर इतना आश्रित हो गया है कि बिना पत्रकारिता और प्रेस के आज सामाजिक जीवन की कल्पना करना ही कठिन है.

पत्रकारिता में उपलब्ध रोजगार के विकल्पों को मुख्य तौर पर दो भागों में बांटा जा सकता है-
1. प्रिन्ट मीडिया
2. इलेक्ट्रोनिक मीडिया

प्रिन्ट मीडिया के क्षेत्र में समाचारों के संकलन के हेतु संवाददाता, पत्रकार, सम्पादन हेतु सम्पादकीय टीम, फोटोग्राफी के लिए प्रेस फोटोग्राफर्स, समाचार लेखन और उन्हे व्यवस्थित करने के लिए टाइपिस्ट और कम्प्यूटर आपरेटर्स, विषेश साज-सज्जा के लिए अन्य तकनीकी सहायक और अन्ततः छपाई के लिए मशीनमैन के रोजगार की अपार संभावनाएं मौजूद हैं. इलेक्ट्रोनिक मीडिया में उपरोक्त के अलावा न्यूज रीडर्स, न्यूज सैटर्स, एंकर्स और प्रसारण हेतु विशेषज्ञों की एक पूरी टीम शामिल रहती है. ये सभी लोग अपने-अपने क्षेत्र के विषेशज्ञ होते हैं जिनका टीम वर्क ही पत्रकारिता को सफल बनाता है. इन विषेशज्ञों की आमदनी की बात करें तो आश्चर्य होता है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में देश और विदेशों में आईआईटी और आईआईएम के विद्यार्थियों के समान वेतन सुविधाएं दी जा रही हैं. यदि आप सामयिक विषयों को समझने और विष्लेषण करने की योग्यता रखते हैं तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में भविष्य जाने के लिए कृतसंकल्प हैं तो अवश्य ही आप बेहतर पद और प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं. 

भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता एवं जनसम्पर्क संकाय संचालित किये जा रहे हैं. जर्नलिज्म एण्ड माॅस कम्यूनिकेशन के नाम से पढाए जाने वाले इस संकाय में पत्रकारिता से सम्बन्धित विषयों का अध्ययन अध्यापन किया जाता है. वैसे तो पत्रकारिता के पेशे में कार्य करने के लिए किसी प्रकार की शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता नहीं है लेकिन प्रतिष्ठित समाचारपत्रों और इलेक्ट्रोनिक चैनलों में अभ्यर्थी से उम्मीद की जाती है कि वह कम से कम सम्बन्धित विषय में स्नातक तक शिक्षित तो अवश्य हो. एक पत्रकार का उस भाषा पर भी विशेषाधिकार होना चाहिए जिसमें वह पत्रकारिता कर रहा है. सूचनाओं के सम्प्रेषण जैसे गम्भीर विषय का प्रस्तुतिकरण प्रयुक्त भाषा के माध्यम से ही प्रभावी बन पाता है. इसके अलावा यदि पत्रकार के पास समाचारों को पकड़ने की पैनी नजर और विश्लेषण करने की क्षमता है तो वह अपनी लेखनी के जरिये स्वयं का अपना अलग मुकाम बना सकता है.

किसी विषय विशेष पर यदि आपकी पकड़ है तो आप पत्रकारिता के जरिये उस विषय के आलेखकार के रूप में स्वयं को स्थापित कर पैसा और प्रतिष्ठा दोनों कमा सकते हैं. समाचार पत्र-पत्रिकाओं में कुछ निश्चित विषयों पर स्थायी आलेख प्रकाशित होते हैं जिन्हे बड़े चाव से पढ़ा जाता है. इन विषयों के आलेखकारों को लेख लिखने के लिए प्रकाशकों द्वारा अच्छा खासा भुगतान किया जाता है क्योंकि यही आलेख समाचार पत्रों की बिक्री बढाने का माध्यम बनते हैं.

प्रिन्ट मीडिया में समाचारों को टाइप करने के बाद प्रकाशन करने हेतु एक विषेश साॅफ्टवेयर के जरिये सैट किया जाता है. अधिकांश समाचारपत्रों में इन दिनों क्वार्क नाम का साफ्टवेयर काम में लिया जा रहा है जिसके विशेषज्ञों की पत्रकारिता जगत में भारी मांग है. इन विशेषज्ञों के लिए रोजगार की संभावनाएं बढती ही जा रही है क्यांेकि पत्रकारिता के बदलते स्वरूप में इंटरनेट पर समाचारों की नित नई वेबसाइटस आरम्भ हो रही हैं. इस मकड़जाल में पत्रकारिता से सम्बन्धित विभिन्न साफ्टवेयर्स के जानकार विशेषज्ञों की महती भूमिका है. इंटरनेट पर समाचारों के त्वरित और प्रभावी सम्पे्रषण को यही विेशेषज्ञ संभव बनाते हैं. वस्तुतः पत्रकारिता में समाचार लिखे जाने से लेकर उसके सम्पे्रषण तक का पूरा काम एक टीम का होता है जिसमें प्रत्येक सदस्य की अपनी भूमिका होती है.

पत्रकारिता में विषय विषेशज्ञों की मांग बढने से पत्रकारों का क्षेत्राधिकार भी लगभग बंट सा गया है. आज पत्रकारों में विषयवार रोजगार की संभावनाएं बढी हैं. राजनैतिक और अपराध जगत के विेशेषज्ञ पत्रकारों की मांग हमेशा बनी रहती है तो वहीं आर्थिक, मनोरंजन, खेलकूद, फिल्मी दुनिया से जुडे़ विेशेषज्ञ पत्रकारों के लिए भी बेहतर रोजगार की संभावनाएं बढी हैं. व्यावसायिक जगत में तो पत्रकारिता का एक अलग क्षेत्र पीआरओ, यानि जनसम्पर्क विभाग के रूप में देखने को मिल रहा है. यह जन सम्पर्क अधिकारी वास्तव में अपने नियोक्ता के लिए पत्रकारिता का ही कार्य करता है.  

पत्रकारिता के क्षेत्र में व्यावसायिक संभावनाओं को देखते हुए दुनिया भर के स्थापित उद्यमियों और राजनैतिक दलों द्वारा स्वयं के समाचारपत्र और इलेक्ट्रोनिक चैनल शुरू किये जा रहे हैं. इन उपक्रमों में पत्रकारिता से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की मांग बढती जा रही है. आज घड़ी यदि कोई युवा पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहता है तो उसके लिए अपार संभावनाएं मौजूद हैं.
  



Wednesday, 27 May 2020

बॉलीवुड का नया 'बिग-बी'

(चर्चित चेहरा)
सोनू म्हानै थारै पर भरोसो..... 


बॉलीवुड का ‘बिग बी’ कौन ! आप कहेंगे इसमें भला पूछने वाली बात कौन सी है. पांच दशकों से फिल्मी पर्दे पर राज कर रहे अमिताभ बच्चन के होते कोई दूसरा नाम कैसे आ सकता है. लेकिन जनाब आप मानें या ना मानें, अब बॉलीवुड में नया ‘बिग बी’ आ गया है. उसका नाम है सोनू सूद. साधारण से दिखने वाले इस अभिनेता ने पब्लिक के दिलों में ‘बिग बी’ के रूप में नई छवि स्थापित कर दी है. कोरोना संकट के दौर में मुंबई से पलायन करने वाले लाखों मजदूरों को सोनू सूद में अपना मसीहा दिखाई दे रहा है जो उन्हें बिना जात-पात और धार्मिक भेदभाव के घर भिजवाने में जुटा है. महामारी के इस संकट काल में मायानगरी से जिस किसी मजदूर को भारतवर्ष में स्थित अपने गांव जाना है, वह सोनू सूद से संपर्क कर रहा है. और सोनू का फंडा देखिए कि बिना किसी औपचारिकता के मजदूरों के ग्रुप को अपने खर्चे पर बसों में बिठाकर उनके गांव की ओर रवाना कर रहा है. 

जहां भारत सरकार की श्रमिक रेलगाड़ियां 9-9 दिनों के बाद भूखे प्यासे मजदूरों को गंतव्य तक पहुंचा रही है वही सोनू की बसें 2 दिनों के भीतर सबको घर छोड़ रही हैंं. मजे की बात देखिए सोनू ने इन बसों में जाने वाले मजदूरों के खानपान की सामग्री भी साथ में पैक करवा दी है. सोशल मीडिया और समाचार पत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सोनू अब तक हजारों श्रमिकों को उनके घर रवाना कर चुके हैं. महाराष्ट्र और केंद्र सरकार को उनके इस प्रयास से सबक लेने की जरूरत है. सोनू सूद ने सोशल मीडिया पर कभी ट्रेंड हुए 'सोनू म्हानै थारै पर भरोसो नहीं है...' गीत को पूरी तरह से गलत साबित कर दिया है. आज माया नगरी के मजदूर सोनू का गुणगान कर रहे हैं और उन्हें अपना भगवान बता रहे हैं.

सोनू अपने इस काम को और बेहतर ढंग से अंजाम दे सकें इसके लिए उनकी टीम ने मिलकर एक टोल फ्री नंबर जारी किया है. इस बात की जानकारी उन्होंने अपने सोशल मीडिया पर भी शेयर की. बुधवार को बिहार के लिए रवाना की गई बसों के यात्रियों से सोनू ने वापसी की अपील भी की है. मजेदार वाकया देखिए कि एक आदमी ने सूद से अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने के लिए ट्विटर पर टैग कर लिखा, ''भैया, एक बार गर्लफ़्रेंड से ही मिलवा दीजिए..बिहार ही जाना है''. सोनू सूद ने इसका उत्तर देते हुए लिखा, "थोड़े दिन दूर रह के देख ले भाई... सच्चे प्यार की परीक्षा भी हो जाएगी."

गौरतलब है कि 80-90 के दशक में सिनेमा हॉल्स की अग्रिम पंक्तियों में बैठकर सीटी बजाते हुए फिल्म देखने वाले यूपी-बिहार के लाखों मजदूरों ने अमिताभ बच्चन को सफलता बुलंदियों पर पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. दिल्ली और मुंबई के अधिकांश रिक्शा चालक तो अमिताभ बच्चन के जबरदस्त फैन हुआ करते थे और उनकी हर फिल्म का पहला शो देखने की जुगाड़ में रहते थे. लेकिन आज दैनिक मजदूरी और दिहाड़ी करने वाले लाखों मजदूर अमिताभ बच्चन की बजाय सोनू सूद में अपना 'बिग बी' ढूंढ रहे हैं.

 यूं तो माया नगरी के अनेक कलाकारों ने कोरोना संकट में अपने-अपने ढंग से लोगों की मदद की है लेकिन सोनू द्वारा किए गए प्रयास सर्वोपरि साबित हुए हैं इसके लिए चारों और उनकी प्रशंसा हो रही है. हिंदी, कन्नड़ और तेलुगु फिल्मों में विलेन की भूमिका निभाने वाले सोनू सूद रियल लाइफ में हीरो बनकर उभरे हैं. बॉलीवुड के सभी सुपरस्टार्स को रियल लाइफ के इस हीरो से सबक लेने की जरूरत है.
-रूंख

Monday, 25 May 2020

सिंघम को लील गया सिस्टम ( एक तथ्यात्मक रिपोर्ट)



(विष्णु विष्णु तूं भण प्राणी रे..)

सद्गुरु की सीख तो यही थी. मानव मात्र के कल्याण की सीख. मनुष्य के सद्गुणों को सहेजने की सीख. इसी सीख को जीवन में उतारने की चेष्टा ही तो करता रहा था हमारा विष्णु. फिर आखिर कहां गलती हुई ? एक ऐसे जांबाज और कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी को असमय क्यों जाना पड़ा जो संविधान में अभिव्यक्त लोकसेवक की भूमिका पर पूरी तरह से खरा उतरता था ?


 सोचने की बात है कि विष्णुदत्त पूरी ईमानदारी के साथ जिस सिस्टम की रक्षा करने में जुटा था उसी सड़े-गले सिस्टम नेे उसका भख ले लिया. तो क्या हम मान लें कि इस देश के शब्दकोशों में ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा जैसे शब्द पूरी तरह से अपना वजूद खो चुके हैं ? क्या अब मूल्यों के साथ जीने की कहीं कोई उम्मीद नहीं बची है ? पिछले दो दिन से प्रदेश भर की सुर्खियों में कोरोना लाॅकडाऊन नहीं बल्कि विष्णुदत्त का बलिदान चल रहा है जिसने सबको आहत किया है. जो उन्हें जानते थे वे तो शोकाकुल हैं ही, उनको न जानने वाले भी इस दर्द भरी मौत पर अपनी संवेदनाएं प्रकट कर रहे हैं और सिस्टम को कोस रहे हैं. 

कहने को विष्णु ने आत्महत्या की है लेकिन उपलब्ध साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि यह सुनियोजित तरीके से की गई हत्या है. ठीक वैसी ही हत्या, जो दुश्मन द्वारा सरहद पर डटे हुए किसी सैनिक के उठे हुए सर को काटकर की जाती है. यहां भी विष्णु का कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी से भरा हुआ सर जब सिस्टम को नागवर गुजरा तो उसने बड़ी चतुराई के साथ उसे रास्ते से हटवा दिया. और हमारे विष्णु की सरलता देखिए उसने मौत को गले लगाने से पहले सारा दोष अपने सर ले लिया. राहत इंदौरी को इन्हीं हालातों के मद्देनजर यह कहना पड़ा होगा कि-

अब  कहां  ढूंढने  जाओगे  हमारे  कातिल

आप तो कत्ल का इल्जाम हमीं पर रख दो.

हालात तो कुछ ऐसे ही बने हुए हैं जहां सिवाय लीपापोती के कोई संभावना ही नजर नहीं आती. फिर भी इस गंभीर मामले पर सुलग रहे कुछ तथ्यों पर नजर डालते हैं ताकि सुधार का दम भरने वालों के चेहरे उजागर हो सकें.


संदेह के घेरे में खड़ी है खुद पुलिस


राजगढ़ थाने की पृष्ठभूमि किसी से छिपी हुई नहीं है. चूरू जिले के इस थाना क्षेत्र में कई गंभीर आपराधिक गतिविधियों के तार जुडे़ है. प्रदेश में सुनियोजित और संगठित गैंगवार के अनेक मामलों में इस थाना क्षेत्र के अपराधी सम्मिलित रहे हैं. ऐसे में विष्णुदत्त बिश्नोई की राजगढ़ थाने में नियुक्ति होना पुलिस विभाग द्वारा अपराधियों को दिया गया एक अप्रत्यक्ष संकेत था कि अब उनकी कारगुजारियां ज्यादा दिन तक नहीं चलने वाली. अपराधी वर्ग भी इस बात को बखूबी जानता था कि जिस थानेदार की दबंगई के चर्चे प्रदेशभर के आपराधिक जगत में है उसे यहां किसी खास मकसद से लाया गया है. 

चूंकि अपराध और राजनीति चोली-दामन के साथी हैं लिहाजा षडयन्त्र रचे जाने तो उसी वक्त से प्रारम्भ हो गए थे. ये दिगर बात है कि इन कुचक्रों की बू आने के बावजूद विष्णु अपने मोर्चे पर डटे रहे. थाने के भवन निर्माण मामले में लगे घटिया आरोपों को सिरे से नकारते हुए विष्णु जिस तरह अपने कर्तव्यों को अंजाम देने में जुटे थे उससे राजनीतिक गलियारों में हलचल मची हुई थी. स्वाभाविक है कि डिजायर सिस्टम के चलते लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्तापक्ष के जनप्रतिनिधि पुलिस और प्रशासन पर हर घड़ी अपना शिकंजा कसे रखना चाहते हैं. इस पकड़ को मजबूत बनाने के लिए वे उच्चाधिकारियों को भी सांठ-गांठ कर अपने आईने में उतार लेते हैं और फिर उनके अधीनस्थों पर दबाव डलवाकर अपनी बात मनवाने में सफल हो जाते हैं. हर घड़ी आपराधिक षडयन्त्रों और ओछी राजनीति के दबाव झेल पाना हर पुलिस इंस्पेक्टर के बूते में नहीं होता. या तो वे इस सड़े-गले सिस्टम का हिस्सा बन जाते हैं या फिर विष्णु की तरह सर उठाए हुुए दबाव झेलते-झेलते खुद ही टूट जाते हैं. 

 तथ्य यह है कि पुलिस व्यवस्था में थानाधिकारी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जिला पुलिस अधीक्षक के नियंत्राधीण होकर कार्य करता है. उसके थाना क्षेत्र का पुलिस उपाधीक्षक भी उसके कार्यों को निर्देशित करता है. आईजी भी यदा-कदा थाने में विचाराधीन आपराधिक फाइलों में हस्तक्षेप करता है. अन्वेषण के गंभीर मामलों में थानाधिकारी काम शुरू करे उससे पहले ही दबाव की राजनीति अपना काम शुरू कर देती है. अन्वेषण की फाइल में मनचाहा परिणाम दिला कर अक्सर विधायक अपना दबदबा दिखाने का प्रयास करते हैं. और ऐसी फाइल यदि विपक्षी दल के किसी व्यक्ति से जुड़ी हो तो क्या ही कहने ! 

घटनाएं और उपलब्ध साक्ष्य यह संकेत करते हैं कि ऐसा ही कुछ खेल काफी समय से राजगढ़ थाने की व्यवस्था में खेलने के प्रयास चल रहे थे जिनके आड़े विष्णुदत्त का उठा हुआ सिर आ रहा था. वरना क्या यह संभव है कि जिला पुलिस अधीक्षक और आईजी को अपने सर्वश्रेष्ठ थानाधिकारी द्वारा झेले जा रहे अनावश्यक दबाव की जानकारी ही न हो ! यदि हां तो, अवश्य ही संदेह की उंगलियां उनकी कार्यशैली पर भी उठती है और दबाव में उनकी लिप्तता की संभावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता. 

अब जबकि राजगढ़ थाने के 39 लोगों के स्टाॅफ ने एक साथ अपने सामूहिक स्थानान्तरण की प्रार्थना कर दी है तो इन तमाम उच्चाधिकारियों की भूमिका और भी संदिग्ध हो जाती है. जरा सोचिए कैसी विषम परिस्थितियां रही होंगी कि एक विष्णुदत्त के जाते ही सबने हथियार डाल दिए. इसका सीधा मतलब है की पुलिस के उच्चाधिकारी खुद दबाव की ओछी राजनीति में उलझ कर रह गए हैं. अपने अधीनस्थों का मनोबल बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह नाकाम रहे इन अधिकारियों का यही निकम्मापन एक कर्मठ पुलिस अधिकारी को खा गया है. बुरी तरह से डरे और मनोबल टूटे हुए ऐसे पुलिस थाने से आम जनता क्या उम्मीद कर सकती है ?
राजनीति के भंवर में फंसी पुलिस व्यवस्था

अब राजनीतिक दबाव का रूख कर लेते हैं. राजगढ़ विधानसभा सीट पर सत्ताधारी दल की विधायक कृष्णा पूनिया हैं और विपक्ष में पराजित हुए बसपा के पूर्व विधायक मनोज न्यांगली. इस मामले पर कृष्णा पूनिया द्वारा दिये गए आरम्भिक बयान ही उन्हें कटघरे में खड़ा करते हैं. विधायक का यह कहना कि वे थानाधिकारी विष्णुदत्त बिश्नोई को व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानती और उन्होंने केवल औपचारिक मुलाकात या फोन पर ही बात की है, किसी के गले नहीं उतरती. विष्णु दत्त सितंबर 2019 से राजगढ़ थाना संभाल रहे थे. इतनी लंबी अवधि में विधायक और उनके क्षेत्र के थानाधिकारी की मुलाकात न हो पाना सरासर झूठ है. इस संबंध में सोशल मीडिया पर थाने की एक बैठक की तस्वीर पुष्टि करने के लिए काफी है. फिर भी यदि पूनिया की बात को मान लिया जाए तो इससे ज्यादा लापरवाही किसी विधायक की क्या होगी कि वह अपने विधानसभा क्षेत्र के थानाधिकारी को ही ठीक से नहीं जानती.
इस घटना के समाचार प्रदेश भर में बड़ी तेजी के साथ वायरल हुए थे उसके बावजूद विधायक द्वारा घटनास्थल पर न पहुंच पाना शर्म की बात है. एक ऐसी दर्द भरी मौत, जिस पर प्रदेशभर की जनता आंसू बहा रही हो, उस जांबाज के अंतिम संस्कार में शामिल न होना खासतौर से उस जनप्रतिनिधि के लिए नैतिक अपराध है जिसके क्षेत्र में वह अपनी सेवाएं दे रहा था. गौरतलब बात है कि घटना से एक दिन पूर्व कस्बे में फायरिंग हुई थी जिसमें एक व्यक्ति हताहत हुआ था. इसी मामले में धरपकड़ करते हुए विष्णुदत्त विश्नोई दो-तीन संदिग्ध लोगों को राउंडअप कर देर रात थाने लेकर आए थे. और सुबह वे अपने कमरे में फांसी पर झूलते हुए पाए गए. उनका सुसाइड नोट अपराध व राजनीति के गहरे संबंध और दबाव झेलती पुलिस व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़े करता है. 

लेकिन जो बात विष्णुदत्त अपनी मर्यादाओं को निभाते हुए स्पष्ट रूप से नहीं कह पाए वह थाने के समस्त स्टाॅफ ने अपने सामूहिक स्थानान्तरण आवेदन में विधायक का नाम लिख कर उजागर कर दी है. क्या इसके बाद भी कुछ बचा रह जाता है ?
न्यायिक जांच और सीबीआई जांच में अटकी निष्पक्षता
विडंबना देखिए की एक पुलिस अधिकारी की असामान्य मौत पर होने वाली जांच भी विवाद का विषय बन गई है. आरंभिक समझौते में पुलिस और प्रशासन ने न्यायिक जांच हेतु सैद्धांतिक स्वीकृति दी है वहीं विपक्षी नेतागण, बिश्नोई समाज के प्रमुख लोग और विष्णुदत्त के प्रशंसक सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं. बिश्नोई की पत्नी और बच्चों ने भी मुख्यमंत्री से इस मामले में सीबीआई जांच की मांग कर डाली है. यानी खुद थानाधिकारी के परिजनों को प्रदेश पुलिस द्वारा की जा रही जांच पर भरोसा नहीं है. हालांकि डीजीपी द्वारा इस मामले की जांच विष्णुदत्त की तरह ही ईमानदार छवि रखने वाले अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक बीएल सोनी के निर्देशन में करवाए जाने की बात कही गई है. इस जांच में अन्वेषण अधिकारी भी एक कार्य कुशल आईपीएस अधिकारी विकास शर्मा को लगाया गया है. लेकिन इसके बावजूद संदेह जताया जा रहा है की प्रदेश पुलिस व्यवस्था विष्णुदत्त के मामले में राजनीतिक दबाव और खुद पुलिस की लिप्तता के संदेह के चलते शायद न्याय नहीं कर पाए.
सीबीआई मांग का एक दूसरा पहलू यह भी है कि केंद्र में भाजपा सरकार है और पुलिसिंग के मामले में सीबीआई की छवि राज्य पुलिस से कुछ बेहतर है. हालांकि सीबीआई को भी केंद्र सरकार का तोता कहा जाता रहा है और अनेक मामलों में यह उजागर भी हुआ है. सीबीआई के पूर्व महानिदेशक जोगेंद्र सिंह भी राजनीतिक दबाव की पुष्टि कर चुके हैं. शायद इसीलिए विपक्षी भाजपा नेताओं को उम्मीद है कि केंद्र में उनकी सरकार के चलते शायद सीबीआई प्रदेश पुलिस के आपराधिक और राजनीतिक गठजोड़ों की कारगुजारियां उजागर कर दे.
ऐसी परिस्थितियों में एक ईमानदार और जुझारू पुलिस ऑफिसर की असामान्य मौत का यह मामला एक और ओछी राजनीति का शिकार न हो जाए, इस आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता. पुलिस जांच और उनकी रिपोर्ट्स का सरकारी तंत्र में क्या हश्र होता है यह किसी से छिपा हुआ नहीं है. ऐसे मामलों में बची-खुची उम्मीद सिर्फ न्यायालयों पर टिकती है और उन्हें भी परिस्थिति जन्य साक्ष्य के अलावा पुलिस अन्वेषण रिपोर्ट पर आश्रित होना पड़ता है.
इन परिस्थितियों में यदि वाकई हमारी सरकारें सुधार करना चाहती हैं तो उन्हें पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था में तुरंत प्रभाव से डिजायर सिस्टम को बंद करना चाहिए. यह व्यवस्था अधिकारियों को विधायकों के सम्मुख नपुंसक बना कर रख देती है जिसका खामियाजा अंततः ईमानदार और न झुकने वाले लोगों को झेलना पड़ता है. पुलिस थानों में काम कर रहे अपने हजारों अधीनस्थ कर्मचारियों का मनोबल न टूटे और वह निर्भीक होकर काम करें इसके लिए विष्णु दत्त मामले में गठित पुलिस जांच दल का दायित्व है कि वह त्वरित और निष्पक्ष जांच करते हुए दोषियों के चेहरे उजागर करे. तभी पुलिस की साख बच पाएगी. जुझारू और जांबाज पुलिस अधिकारी विष्णुदत्त विश्नोई को दुष्यंत की इन पंक्तियों के साथ अश्रुपूरित श्रद्धांजलि कि-

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
मेरे  सीने  में   नहीं   तो   तेरे सीने  में  सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं 
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.

- डॉ हरिमोहन सारस्वत ’रूंख’

94140-90492

Friday, 22 May 2020

अमरनाथ लंगर सेवा समिति और किशन की देगची



(सेवा प्रकल्प) 

महाभारत में कृष्ण भगवान की देगची का प्रसंग आता है जिससे वे अपनी सखी द्रौपदी की मदद करते हैं. वनवास के दौरान जब पांडवों की कुटिया पर भोजन के लिए महर्षि दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ पहुंचते है तब द्रोपदी की रसोई में खाने के लिए कुछ नहीं होता. संकट की इस घड़ी में द्रोपदी को ईश्वर कृपा प्राप्त होती है. उसकी देगची में पके चावल समस्त ऋषियों के भोजनोपरांत भी समाप्त ही नहीं होते और द्रौपदी की रसोई की लाज बच जाती है.

कलयुग में भी एक ऐसी ही अनूठी देगची अमरनाथ लंगर सेवा समिति सूरतगढ़ के पास उपलब्ध है जिसके आशीर्वाद से उन्होंने कोरोना संकटकाल में लगातार 42 दिन शहर के सभी 45 वार्डों में जरूरतमंदों को तैयार भोजन उपलब्ध करवाया है. प्रतिदिन लगभग एक हजार भोजन पैकेट तैयार करना और उसमें सवा महीने तक निरंतरता बनाए रखना आसान काम नहीं है
लेकिन जब समिति अध्यक्ष के रूप में स्वयं किशन भगवान देगची साफ कर भोजन पकाने में जुटे हो तो रास्ते स्वत: ही सुगम हो जाते हैं. इस समिति के सभी सदस्य बधाई और धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने सेवाभाव से इस पुनीत कार्य को निरंतर बनाए रखा और भगवत्कृपा से शहर में किसी को भी भूखा नहीं रहने दिया. शहर की अन्य कई सामाजिक संस्थाओं ने भी इस तरह के प्रकल्प जारी रख मानवीय संवेदनाओं का परिचय दिया है

संस्था सचिव के ओम सोनी के अनुसार महादेव के आशीर्वाद से 5 अप्रैल को स्वामी धर्मशाला में इस भोजन वितरण प्रकल्प हेतु अस्थाई रसोई की स्थापना की गई. 'जय बाबा अमरनाथ बर्फानी, भूखे को अन्न प्यासे को पानी' के सेवाभावी विचार को ध्यान में रखकर समिति के सभी सदस्यों ने

कोरोना संकटकाल के दौरान शहर में किसी को भी भूखा न रहने देने का संकल्प लिया. अध्यक्ष किशन स्वामी के नेतृत्व में सबने समर्पित भाव से काम करना शुरू किया तो संकटकाल कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला. विपत्ति के समय दो वक्त का भोजन अगर जरूरतमंदों को उपलब्ध करवाया जाए तो उससे बड़ी मानव सेवा नहीं हो सकती. समिति ने अपने प्रयासों से यह संभव कर दिखाया है. स्वामी धर्मशाला में चल रही इस अस्थाई रसोई में कुछ दिन पूर्व जाने काअवसर प्राप्त हुआ तो वहां की व्यवस्थाओं को देख अत्यंत प्रसन्नता हुई.

कोषाध्यक्ष प्रकाश सारस्वत बताते हैं कि जन सहयोग और समिति के पास उपलब्ध संसाधनों से यह व्यवस्था संभव हो पाई है. संस्था के पूर्व अध्यक्ष सुरेंद्र चुघ, उपाध्यक्ष उदयराम बनिया, इंद्राज सुथार, शंकर सोलंकी, विष्णु टाक, विजय तिवारी, योगेश

 स्वामी, लालचंद गेदर, मनीष मूंदड़ा, रामकुमार घोड़ेला, लालचंद स्वामी, पवन तांवणिया, रामकुमार औझाइया, रामस्वरूप पेंटर, ओम ठेकेदार, मांगी छिंपा, सुशील मोट प्रेमप्रकाश राठौड़, विजय सिंधी, राजेंद्र सैनी, विनोद सारस्वत, धनराज स्वामी, पवन पारीक, विनोद औझाइया, भुवनेश्वर मुद्गल,  सोनू बिश्नोई, विकास सेन, राजेंद्र सैनी, बाबूलाल जांगिड़, हरिशंकर शर्मा, रवि गाबा,  हरीश कुकड़, पुरुषोत्तम सोनी, मोहन चौधरी, बलदेव तनेजा, चानन गोयल, बंसी औझाइया, राजू मोदी पूनम सोलंकी समेत बड़ी संख्या में महादेव के कार्यकर्ताओं ने इस पुण्य के काम में बढ़-चढ़कर सहयोग किया है.

अपने सेवाभावी कार्यों के चलते यह समिति आज शहर की बड़ी सामाजिक संस्थाओं में शुमार हो चुकी है. संस्था के समर्पित अध्यक्ष किशन स्वामी ने अपने दायित्व का भली भांति निर्वहन करते हुए अमरनाथ लंगर सेवा समिति की सेवाओं को आगे बढ़ाने का काम किया है. उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में भी महादेव के सेवक इसी प्रकार जरूरतमंदों की सेवा करते रहेंगे.

शहर के बीचों-बीच शाहरुख खान बांट रहा कैंसर

  - नशे के प्रचार में सहयोगी बना शहर का प्रशासन सूरतगढ़, 07 अक्टूबर। एक तरफ जहां जिले भर में पुलिस प्रशासन द्वारा नशामुक्ति अभियान चलाने की ...

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