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Wednesday, 13 May 2020

कैसे आत्मनिर्भर हो किसान !

(सामयिक आलेख)

मानव ने अपने जन्म से ही आत्मनिर्भर बनने के प्रयास जारी रखे हैं. मनुष्य के इन प्रयासों में प्राकृतिक संसाधनों ने हमेशा अपना योगदान दिया है. यह अलग बात है कि आदमी ने इस सहयोग का आभार करने के बजाए इन संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर स्वयं को ही नुकसान पहुंचाया है. अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की यही इंसानी प्रवृत्ति आत्मनिर्भरता की अवधारणा को स्वार्थ लिप्सा में बदल देती है जिसका मूल्य पूरी मानव सभ्यता को चुकाना पड़ता है.

वर्तमान कोरोना संकट भी जानबूझकर की गई ऐसी ही मानवीय गलतियों का नतीजा है जिसने समूचे विश्व को खतरे में डाल दिया है. इस महामारी के आतंक ने एक बार फिर दुनिया के सभी देशों और सामान्यजन को आत्मनिर्भर होने के लिए प्रेरित किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो लॉकडाउन-3 में अपना उद्बोधन पूरी तरह से इसी विषय पर केंद्रित रखा है और समस्त देशवासियों से आत्मनिर्भर बनने का आह्वान किया है. हालांकि आज वैश्विक परिस्थितियां ऐसी बन चुकी है कि प्रत्येक देश अपनी जरूरतों के लिए एक दूसरे पर निर्भर है लेकिन उसके बावजूद समय की मांग है कि देश में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए अधिकांश जरूरी वस्तुओं और सेवाओं का निर्माण देश के भीतर ही किया जाए. स्वदेशी आंदोलन भी इसी आत्मनिर्भरता पर बल देता है.

किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में कृषि, उद्योग-धंधे और सेवा क्षेत्र आधारभूत घटक होते हैं. इन्हीं में मनुष्य अपने जीवन यापन के साधन खोजता है और अपने प्रयासों को गति देने के लिए संसाधनों को जुटाता है. इन तीनों क्षेत्रों का समग्र और सामूहिक विकास ही देश को आत्मनिर्भरता की ओर ले जाता है. इसमें भी कृषि सर्वाधिक महत्वपूर्ण है जो प्रत्येक अर्थव्यवस्था का आधार है. इसका सीधा सा कारण खाद्यान्न है जो मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकता है. शायद इसीलिए प्राचीन भारत में उत्तम खेती, मध्यम व्यापार और निकृष्ट नौकरी की बात कही गई है.

हमारे देश के संदर्भ में कृषि क्षेत्र की बात करें तो स्थिति ज्यादा बेहतर नहीं है. छोटी जोत का या भूमिहीन किसान आज भी दो जून की रोटी के लिए दिन भर कड़ी मेहनत करता है लेकिन फिर भी उसे अपना पेट पालने के लिए कर्ज का सहारा लेना पड़ता है. बड़े जमीदारों की बात छोड़ दें तो साधारण किसान आज भी जीवन यापन के लिए जूझ रहा है. पूंजी की अनुपलब्धता, संसाधनों का अभाव, पानी की कमी, विद्युत संकट, अशिक्षा के चलते नवीन तकनीक का ज्ञान न होना, परंपरागत खेती और कर्जे का बोझ भारतीय किसान को उबरने ही नहीं दे रहा है. इसके बावजूद वह इन कठिनाइयों का सामना करते हुए अपने खेत में फसल उगाता है लेकिन ये फसलें बाजार में पहुंचने तक उसके सारे सपने लील जाती हैं. आज भी भारत में फसलों का मूल्य निर्धारण किसान के लिए सबसे बड़ी समस्या है. कभी-कभी तो उसे अपनी उपज का लागत मूल्य ही नहीं मिल पाता. ऐसी स्थिति में उसके पास भाग्य को कोसने के अलावा कोई चारा नहीं रहता. सरकार द्वारा घोषित फसलों का समर्थन मूल्य हमेशा विवादित रहा है. समर्थन मूल्य निर्धारण पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें यथावत लागू करने से हर सरकार घबराती रही है. फसल मूल्य निर्धारण में रही सही कसर कमोडिटी एक्सचेंज यानी सट्टा बाजार ने पूरी कर दी है. किसान की फसल को प्राकृतिक आपदाओं से बचाने के लिए यूं तो देश में कृषि फसल बीमा योजना भी लागू है लेकिन यथार्थ के धरातल पर यह योजना अपनी खामियों के चलते कारगर सिद्ध नहीं हो पाई है. इसकी आड़ में कृषि बीमा कंपनियां तो अरबों रुपए के मुनाफे से फल फूल गई हैं लेकिन किसान हमेशा शोषण का शिकार हुआ है. 

70 के दशक में हरित क्रांति की बदौलत भले ही हम खाद्यान्नों के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गए हो लेकिन किसान के हालात बद से बदतर होते गए हैं. देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था ने किसान को हमेशा वोट बैंक की राजनीति से जोड़कर देखा है. उसे सपने तो बड़े-बड़े दिखाए गए लेकिन उनका लाभ जमींदार से राजनीतिज्ञ बने लोग उठाते रहे. असली किसान आज भी अपने हक से वंचित बैठा है. देश की कर व्यवस्था में भले ही कृषि आय को कर मुक्त रखा गया हो लेकिन सच्चाई यह है कि इस करमुक्त आय का लाभ लेने वाले अधिकांश करदाता खेत की ओर मुंह ही नहीं करते हैं. वे तो अपने स्वामित्व की कृषि भूमि पर फसलें नहीं, आंकड़े उगाते हैं जो अंततः उनकी रिटर्न भरने के काम आते हैं. छलने का यह सारा खेल करमुक्त कृषि आय के नाम पर होता है जिसकी जानकारी हर सरकार को है.

ऐसी परिस्थितियों में अर्थव्यवस्था की नींव कहे जाने वाले किसान को आत्मनिर्भर बनाना आसान नहीं है. उसका मनोबल कर्जे के बोझ और जमीन के कुर्की नोटिस से इतना गिर चुका है कि उसे आत्महत्या भी एक विकल्प दिखने लगी है. यदि सरकार किसान को आत्मनिर्भर बनाने का सपना देखती हैं तो उसके लिए सामूहिक प्रयासों की जरूरत है..ऐसी घातक स्थिति से उबरने के लिए केंद्र और प्रदेश सरकार के साथ-साथ खुद किसान को नए हौंसले के साथ उठना होगा. 

केन्द्र सरकार को दो बिंदुओं पर तुरंत समीक्षा कर कृषि नीति में बदलाव करने चाहिए. पहला कृषि जिंसों का समर्थन मूल्य निर्धारण और दूसरा फसल बीमा योजना. यदि सरकार ईमानदारी से इन दोनों मुद्दों पर किसान हित में काम करती है तो बेहतर परिणाम आ सकते हैं. फसल बीमा कंपनियों द्वारा नुकसानी दावों के मामलों में नियम कायदों का कड़ाई से पालन होना बेहद जरूरी है. जब तक कृषि बीमा फसल योजना में वाहन दुर्घटना बीमा के समकक्ष दावों के भुगतान की प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती, इस बीमा के उद्देश्यों की प्राप्ति में संशय है. तीसरे काम के रूप में केंद्र सरकार को राष्ट्रीय बीज निगम का पुनर्गठन कर उसकी जवाबदेही तय करनी चाहिए. यह बहुत गंभीर तथ्य है कि इस संस्थान की उपस्थिति के बावजूद बीजों के उत्पादन और गुणवत्ता के मामले में निजी कंपनियां कहीं बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं. 

किसान को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रदेश सरकारों को भी कमर कसनी होगी. उन्हें चाहिए कि वे इसकी शुरुआत भू राजस्व कानूनों का सरलीकरण कर राजस्व अधिकारियों की समयबद्ध जवाबदेही तय करने से करें. अक्सर देखा गया है कि बहुत से किसान खातेदारी, गैर खातेदारी, अस्थाई काश्त, भूमि बंटवारे और राजस्व संबंधी अनेक मामलों में लचर कानून व्यवस्था के चलते जीवन भर उलझे रहते हैं. तहसील और वकील के चेंबर में समाधान तलाशता किसान आशंकाओं से घिरा रहता है. मानसिक तनाव की यह स्थिति कृषि और कृषक दोनों के लिए चिंता का विषय है. राज्य सरकारें पड़ोसी राज्यों के साथ हुए जल समझौतों में भी अक्सर लापरवाही बरतती हैं जिसका खामियाजा अंततः किसान को भुगतना पड़ता है. यदि समय पर खेत को पानी न मिले तो काश्तकार की सारी मेहनत व्यर्थ चली जाती है. प्रदेश सरकारों की जिम्मेदारी है कि खेतों में सिंचाई हेतु पर्याप्त पानी मिले और उसके लिए किसान को आंदोलनों का सहारा न लेना पड़े. नलकूपों से सिंचाई व्यवस्था के मामलों में राज्य सरकार को पर्याप्त विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने होंगे. कई राज्यों में हालात यह है कि दसियों साल से किसानों के विद्युत कृषि कनेक्शन आवेदन बकाया पड़े हैं. 

प्रदेश के किसान उन्नत तकनीक का प्रयोग करते हुए अच्छी गुणवत्ता की फसलें उगाने की तरफ कैसे अग्रसर हों, इसके लिए सरकारों को कृषि विशेषज्ञों की कार्यशालाओं का ब्लॉक स्तर पर निरंतर आयोजन करना चाहिए. कृषि विभाग के अतिरिक्त राज्य सरकार के पास पटवारी और ग्राम सचिव नामक दो कार्मिक ऐसे हैं जो किसान मित्र की भूमिका निभा सकते हैं. इन दोनों कार्मिकों की परंपरागत भूमिका में बदलाव की सख्त आवश्यकता है. कृषि कार्यों में गुणवत्ता प्रोत्साहन के लिए पटवारी और ग्राम सेवक की जवाबदेही तय होनी चाहिए. राज्य सरकारों को चाहिए कि वे प्रतिवर्ष बेहतर प्रदर्शन करने वाले किसानों को सम्मानित करने का नव प्रकल्प प्रारंभ करें.

सरकारों के अथक प्रयासों के बावजूद जब तक किसान खुद अपनी कृषि में नवाचारों को लागू नहीं करेगा तब तक बेहतर परिणामों की उम्मीद करना व्यर्थ है. किसान को समझना होगा कि परंपरागत कृषि फसल चक्र को समय की मांग के अनुसार बदलना बेहद जरूरी है. कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली फसलों पर विचार करना होगा. किसान को शिक्षा और तकनीक का महत्व समझते हुए अपनी भावी पीढ़ी को पढ़ने के लिए प्रेरित करना होगा. आज सूचना क्रांति की बदौलत कृषि संबंधी बेहतर मार्गदर्शन और सुझाव किसान की मुट्ठी में है. उसे सिर्फ उनका प्रयोग करना सीखना है. देश में अनेक ऐसे प्रगतिशील किसान है जिन्होंने अपने प्रयासों से न सिर्फ आत्मनिर्भरता हासिल की है बल्कि वे देश के विकास में भी वे अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं.
इन किसानों ने कृषि के प्रति उदासीन होती धारणा को बदल दिया है और इस बात को पुनर्स्थापित किया है कि कृषि में अपार संभावनाएं हैं जिनकी बदौलत देश की अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है. किसान को आत्मनिर्भर बनाने के लिए हमें संकल्पित होकर काम करने की जरूरत है.

                  

                  -डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'


Monday, 11 May 2020

मानस के राजहंस हैं वर्मा ( हमारे प्रेरणादायी व्यक्तित्व)

एक आदमी में होते हैं दस बीस आदमी 
जिसको भी देखना कई बार देखना.

... हमारे आसपास कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिन्हें हम ठीक ढंग से पहचान भी नहीं पाते. जिंदगी की भागमभाग में औपचारिक अभिवादनों पर टिके संबंधों के पीछे कभी झांकने का मौका मिले तो आप पाएंगे कि ऐसे चेहरे अपनी गंभीरता और स्मित मुस्कान के पीछे कितना कुछ महत्वपूर्ण समेटे हुए हैं. इन व्यक्तियों में कई बार आपको छिपे हुए मानस के राजहंस मिल जाएंगे.

ऐसे ही राजहंस हैं गोपी राम वर्मा. सूरतगढ़ के शक्ति नगर निवासी  और राजस्थान सरकार के राजस्व विभाग में पटवारी के पद से सेवानिवृत्त गोपी राम जी 'रूंख भायला' होने के साथ-साथ संस्कृत के प्रकांड अध्येता हैं. देव भाषा के प्रति उनका अगाध प्रेम ही है कि उन्होंने अपने तीनों बच्चों को संस्कृत शिक्षा में पारंगत कर दिया है. उनकी विवाहित पुत्री ने हाल ही में संस्कृत अध्ययन में पीएचडी की डिग्री हासिल की है. बिंदु देवी द्वारा महाकवि भृतहरि रचित नीतिशतक की सरल शब्दों में व्याख्या की गई है. वे हरियाणा में महाविद्यालय व्याख्याता के रूप में सेवाएं दे रही हैं. वर्मा का बड़ा पुत्र राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल में प्राचार्य के पद पर कार्यरत है और संस्कृत अध्यापन में पारंगत है. विश्व संस्कृत सम्मेलन में संस्कृत की वाचन परंपरा में उसने अपनी प्रतिभा सिद्ध की है. उससे छोटा पुत्र भी संस्कृत शिक्षक है. 

गोपीराम जी बताते हैं कि उन्हें संस्कृत अध्ययन का शौक बचपन में अपने ननिहाल से हुआ जहां उनके नाना आयुर्वेद के बड़े वैद्य थे. उनके सानिध्य में रहकर उन्होंने संस्कृत का उच्चारण और वाचन परंपरा सीखी. उनके अनुसार परिवारिक परिस्थितियों के चलते पांचवी कक्षा के बाद उनकी पढ़ाई 16 वर्षों तक बाधित रही. उसके बाद अपनी रुचि के कारण उन्होंने पुन: अध्ययन आरंभ किया और हिंदी और संस्कृत साहित्य में स्नातक की पढ़ाई पूरी की. 

अध्ययनशील व्यक्ति सदैव पुस्तक प्रेमी होता है. गोपी राम वर्मा के पास उपलब्ध ग्रंथों और पुस्तकों का भंडार भी इस बात की साख भरता है. उनके निजी पुस्तकालय में हिंदी व संस्कृत साहित्य के अलावा आयुर्वेद और वन औषधियों के अनेक हस्तलिखित ग्रंथ उपलब्ध है. हस्तलिखित पांडुलिपियों के संबंध में वर्मा जी बताते हैं कि अमरपुरा गांव में एक जमींदार परिवार के पास ये पुश्तैनी ग्रंथ पड़े थे. परिवार का मुखिया इन पुस्तकों को रद्दी में बेच कर पीछा छुड़ाना चाहता था. अपनी पटवारी की सेवा के दौरान अनायास ही वे उस घर में पहुंचे तो दीमक का शिकार हो रही उन पांडुलिपियों को आंगन में फैलाया हुआ था. उन्होंने घर मालिक से निवेदन किया कि वे इन पुस्तकों को ले जाएंगे. बस फिर क्या था. रद्दी में बिकने को तैयार पुस्तकें आज उनके पुस्तकालय की शोभा बढ़ा रही हैं.

वर्मा जी आयुर्वेद और वन औषधियों के गहरे जानकार हैं. उन्होंने अपने घर और मोहल्ले के पार्क में अनेक आयुर्वेदिक औषधियों वाले पेड़-पौधे लगा रखे हैं जिनकी पूरे मनोयोग से देखभाल करते हैं. इनमें इलायची, अपराजिता, पारिजात, शतावरी, ब्राह्मी, अमलतास, सहजन, अर्जुन, सर्पगंधा, मैदा छाल, पलाश, पत्थरचट्टा आदि शामिल हैं. वे मोहल्ले के पार्क में भी सीजनल पौधों की पौध तैयार करते हैं और उसे सब जगह बंटवाते हैं ताकि वातावरण हरा भरा रहे. पार्क में जब कभी कोई पौधों को नुकसान पहुंचाता है तो वर्मा जी उससे लड़ने पर उतारू हो जाते हैं यह पौधों के प्रति उनका अंतस प्रेम है जिस पर कोई लाख बुरा मनाए उनकी बला से.

सच पूछिए तो ऐसे मानस पुत्रों की उपस्थिति से ही यह पृथ्वी हरियाली की चादर ओढ़े है. इन रूंख भायलों ने चुपचाप निर्विकार भाव से असंख्य पेड़ पौधों का संरक्षण किया है. उसी का परिणाम है कि हम खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं. गोपी राम जी वर्मा ! हम आपके ऋणी हैं.

Thursday, 7 May 2020

गोगे माण्डने में छिपा है सृजन का सुख


'गोगा मांडो हो के रे.... !' बालू रेत की धरती पर जब कोई राहगीर रेत का संसार रचते बच्चों से पूछता है तो वे मुस्कुरा देते हैं. थार में बारिश के दिनों में सोनल धोरों पर 'गोगे माण्डना' बाल संस्कारों के साथ-साथ प्राचीन रचनात्मक परम्परा मानी जाती है. गीली बालू रेत पर सृजन करता बाल मन जब अपने हाथों से रचे हुए घर को थपथपा कर आकार देता है तब लगता है साक्षात विश्वकर्मा धरती पर उतर आए हों. राजस्थानी लोक संस्कृति में गोगा शब्द ''थान' का भावार्थ देता है जो घर में बने देवस्थान का पर्यायवाची है. उत्तरी पश्चिमी राजस्थान में लोक देवता गोगा पीर के थान अधिकांश गांवों में देखे जा सकते हैं.

गोगे माण्डने की यह परंपरा थार में शुभ मानी जाती है क्योंकि यह वर्षा से उपजे आनंद और खुशहाली का प्रतीक है.

रेगिस्तान में शीतकाल की बारिश को मावठ के नाम से जाना जाता है. यह बारिश किसानों के लिए अत्यंत लाभदायक होती है. उनकी वर्षा आधारित फसलें इस समय पानी के रूप में अमृतपान करती हैं. ऐसी बारिश के बाद बच्चे घर के दालान में या फिर अपनी ढाणी के आसपास पसरे धोरों में रेत के घर बनाते हैं जिन्हें गोगा कहा जाता है. बात ही बात में घर और गली के बच्चों द्वारा रेत पर पूरा गांव बना दिया जाता है और उसे अनेक प्रकार की साज-सज्जा से संवारा जाता है. बच्चे अपने सधे हुए हाथों से गीली बालू रेत के अनेक घर, आंगन, मंदिर, कुएं बावड़ी और चौपाल तक बना देते हैं. वे अपने पैर के पंजे को गीली रेत से ढक देते हैं और फिर उसे थपथपा कर मंदिर के गुंबद का आकार दे देते हैं. कभी-कभी तो कोरी रेत का यह गुंबद तीन-साढ़े तीन फुट तक ऊंचा बना दिया जाता हैं. उसके बाद धीरे से पंजे को निकाल लिया जाता है. इस प्रकार बालू रेत के बनाए गए 'गोगे' में प्रवेश द्वार तैयार हो जाता है. इसी ढंग से बच्चों द्वारा कमरे और झोपड़ियां भी बनाई जाती हैं जिन्हें थार में उपलब्ध वनस्पति की पत्तियों और फूलों से सजा दिया जाता है. बबूल के पीले फूल इन गोगों की शोभा बढ़ा देते हैं. जब कई बच्चे मिलकर गोगो का बना देते हैं तो वह उसकी सुरक्षा के लिए चारों तरफ किले जैसी चारदीवारी भी खड़ी कर देते हैं. गोगे बनने के बाद बच्चों का उल्लास देखने लायक होता है. हो भी क्यों ना ! घंटों की कारीगरी के बाद वे अपने सपनों का गांव खड़ा करने में सफल होते हैं. इसी बीच आपसी बाल-विवाद के चलते कोई उच्चंखृल बालक अपने पैर से गोगों को गिरा देता है तो उसे बनाने वाले बच्चों, खासतौर से लड़कियों में रुलाई फूट पड़ती है. सपनों के बिखरने का एहसास रचनात्मकता से जुड़े इन बच्चों को समय से पहले ही हो जाता है जिससे उनकी संवेदनशीलता बढ़ती है. यही गोगे मांडने की सच्ची सीख है.

सूचना क्रांति के युग में रचाव की इन परंपराओं से बच्चे विमुख होते जा रहे हैं जबकि मिट्टी में सृजन का यह आनंद अपने आप में अनूठा है. गोगे माण्डने का सौभाग्य सिर्फ थार के बच्चों को ही मिला है. आप कहेंगे ऐसा क्यों ? तो जनाब, सोने जैसी चमकती रेत सिर्फ थार में ही नसीब है. लंदन, पेरिस, दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़ के बच्चे इस सृजन आनंद सिर्फ थार में आकर ही ले सकते हैं. यदि आपने गोगे मांडने का आनंद लिया है तो आप भाग्यशाली हैं. और यदि नहीं, तो फिर पधारिए ना थार में...!
-रूंख

Tuesday, 5 May 2020

विस्थापन का गीत (थार के 34 गांवों का दर्द)


पब्लिक ड्रिंक बनने की राह पर है शराब

कमज़र्फ को साकी जाम न दे, तौहीन होगी मय़खाने की
वो पी लेगा  फिर बहकेगा,  शामत  आएगी  पैमाने की. 

शराब ! मस्त और कभी-कभी अस्त-व्यस्त बना देने वाले इस पेय पदार्थ के बारे में वैदिक काल से लेकर आज तक इतना कुछ लिखा गया है कि यदि शब्द पानी का रूप धर लें तो पृथ्वी पर  विशाल मयसागर दिखाई देगा. देव, गंधर्व, किन्नर, नर, नाग, ऋषि-मुनि, कवि, साहित्यकार और वैज्ञानिकों ने अलग-अलग ढंग से मद्य की व्याख्या की है. त्रेता युग की वाल्मीकि रामायण में राक्षसों द्वारा मद्यपान कर ऋषियों को परेशान करने का जिक्र आता है तो देवलोक की राजसभाओं में सोमरस पान आवभगत की एक अनिवार्य परंपरा के रूप में देखने को मिलती है. महाभारत में भी दुर्योधन पांडवों के मामा मद्रराज शल्य का सुरा के साथ शानदार स्वागत कर उसे अपने पक्ष में युद्ध करने के लिए वचनबद्ध कर लेता है. कलयुग के तो कहने ही क्या ! व्यापारियों, उद्योगपतियों और राजनीतिज्ञों ने तो इस नशीले पानी से जाने कितने हित साधे हैं और आज भी उनके लिए व्यापारिक समझौतों और चुनावी जंग जीतने का यह अचूक हथियार है. भारत में तो इस दिव्यास्त्र के सम्मुख कांग्रेस, भाजपा सहित सभी राजनीतिक दल अपने-अपने घोषणापत्रों को बगल में दबाकर नतमस्तक हो जाते हैं और आशीर्वाद मांगते हैं.
इस मदमस्त पानी ने 'सुरा' से लेकर 'शराब' तक का सफर हर युग में बड़ी शान से तय किया है. सिर पर चढ़ कर बोलने की हिमाकत करने वाली यह मदिरा होठों के जरिए सीधे दिल में उतरती रही है. अमीर इसे 'वाइन' और 'हार्ड ड्रिंक' कहकर सम्मान देता है तो वहीं आम आदमी के लिए यह सिर्फ 'दारू' है. 'जिसमें मिला दो, उसी रंग जैसी...' का भाव रखने वाली यह मदिरा जब इतनी महत्वपूर्ण है तो फिर इस पर लगी बंदिशें सवाल खड़ा करती हैं.

लॉकडाउन-2 के बाद मिली थोड़ी सी राहत के माहौल में शराब के लिए पूरे देश में जिस कदर मारामारी दिखाई दी है उससे यह लगता है कि अब शराब पर नियंत्रण के लिए बनाए गए सारे कानूनों की समीक्षा होनी चाहिए. लंबी-लंबी कतारों में लगे लोग शराब पाने के लिए जिस हद तक जूझ रहे हैं वह संकेत है कि मदिरा अब 'पब्लिक ड्रिंक' बनने की दिशा में कदम बढ़ा चुकी है. जब देश में शराब पीने-पिलाने वालों की होड़ लगी हो और सत्ता अपने खजाने के लिए सोने की इस मुर्गी का हर अंडा समय से पहले निकालने की जुगत में हो, तब नियम कायदों को बदल लेना चाहिए. मैं तो यहां तक उदारवादी रवैया अपनाने की बात सोचता हूं कि सरकार शराब को आवश्यक वस्तु अधिनियम में शामिल करने की दिशा में कदम बढ़ाए. इस सोच के पीछे महत्वपूर्ण तर्क यह है कि जब मदिरापान में लोग इस कदर आदि हो चुके हों कि बिना शराब के उन्हें जीवन मौत से बदतर लगता हो तो सरकार का फर्ज बनता है कि अपनी प्रजा का ख्याल रखें. और यहां तो पीने वाली प्रजा अपने प्रिय पेय के लिए सरकार का खजाना भी मुंह मांगे दामों पर भरने के लिए आतुर है. विश्व संकट की घड़ी में भी शराब सारे जातिगत समीकरणों और बंधनों को तोड़ती हुई अपना वर्चस्व कायम रखे हुए है. तभी तो मधुशाला के द्वितीय भाग में हरिवंश राय बच्चन ने बहुत पहले लिख दिया था-

सब मिट जाएं, बना रहेगा सुंदर साकी, यम काला
सूखें सब रस, बने रहेंगे किंतु हलाहल औ' हाला
धूमधाम औ' चहल पहल के, स्थान सभी सुनसान बनें
जगा करेगा अविरत मरघट, जगा करेगी मधुशाला.

जब शराब की महत्ता इतनी अधिक है तो फिर क्या कारण हैं कि भारतीय समाज में इस मादक पेय पदार्थ को सामाजिक मान्यता प्राप्त नहीं है. संकट के दौर में भले ही सुरापान करने वाले लोग शर्म का चोगा उतार लाइन में जा लगे हो, लेकिन आज भी वे ठेके से खरीदी गई बोतल या थैली को छिपाकर ले जाने का जतन करते हैं. यह स्थिति बड़े और छोटे लोगों पर समान रूप से लागू होती है. ब्रांडेड शराब कंपनियों द्वारा अपने उत्पाद को बेहद शानदार बोतल और कार्टन में पैक किया जाता है जिसे दो घड़ी देखने का मन न पीने वाले का  भी  करता है.लेकिन वाइन शॉप से उसे भी पुराने अखबार में ढांपकर लाने की कोशिश रहती है कि कहीं कोई देख न ले. अमेरिकी और यूरोपीय देशों में ऐसी स्थिति नहीं है क्योंकि वहां शराब सेवन को सामाजिक मान्यता है. भारत में शराब ठेके से भले ही छिपाकर लाई जाती हो लेकिन पीने के बाद सब उसे उगाने की भरसक कोशिश करते हैं. क्या राजा क्या रंक ! दो घूंट अंदर जाने के बाद सबके चेहरों का रंग उतर जाता है. यह मनुष्य का विवेक हर लेती है और शायद यही कारण है कि भारतीय समाज में शराब और शराबी को हेय दृष्टि से देखा जाता है. इसके बावजूद शराब पीने वालों के मुंह चढ़कर बोलती है और उन्हें बस मधुशाला  में लिखा यह छंद याद रहता है -

पाप अगर पीना समदोषी, तो तीनों साकी- बाला
नित्य पिलाने वाला प्याला, पी जानेवाली हाला
साथ इन्हें भी ले चल मेरे, न्याय यही बतलाता है
कैद जहां मैं हूं की जाए, कैद वहीं पर मधुशाला.

अब, जबकि कोरोना संकट ने समूचे विश्व को आशंकाओं के घेरे में डाल दिया है. 'पता नहीं, क्या होने वाला है' के अज्ञात भय ने सुराप्रेमियों की लोकलाज का तो हरण कर ही लिया है साथ ही साथ सरकारों के पोत भी उघाड़ दिए हैं. शराब की बिक्री से अपने खजाने भरने वाली सरकारें शराबी से कम कहां है,जिसे पीने की इस कदर तलब रहती है कि पूछो मत ! लॉकडाउन खुलने की जितनी उत्कंठा शराबियों को नहीं होगी उससे कहीं अधिक प्रदेश की सरकारें बेताब थी कि शराब बिक्री जल्द से जल्द शुरू हो. कुछ विधायकों ने तो सरेआम बाकायदा सरकारों से शराब की बिक्री आवश्यक वस्तु की तरह करने की मांग भी कर दी थी. जब देश के विकास का आधार और गरीब की रोटी का निवाला शराब बिक्री पर टिका हो तो सरकार को  उदार मन से शराब के लिए नए कानून बनाने की ओर सोचना चाहिए. नए कानून में यदि शराब की बिक्री सुलभ कर दी जाए तो सुरापान करने वाले छोटे-बड़े सभी लोगों को भारी राहत मिलेगी. भले ही सूफी लोगों को थोड़ी बहुत परेशानी हो. पर बड़े एक बड़े वर्ग को राहत देने के लिए इतना तो चलता है.  और हां, सरकार का खजाना तो हर व्यवस्था में निरंतर बढ़ता ही रहेगा, क्योंकि देश में पीने पिलाने वालों की कमी कहां है !

                                                                 -रूंख

Thursday, 30 April 2020

बिमला अबार कठै होयसी ! (कहानी - जनकराज पारीक)

मूल कहानी-जनकराज पारीक
राजस्थानी अनुवाद- डाॅ. हरिमोहन सारस्वत ‘रूंख’ 

अबार ई सरला री मौत रो समचार पूग्यो है. म्हानै इंयां लागै जाणै रमेस पचैरी सूं बेस्सी म्हूं बींरी हत्या रो दोसी हूं. म्हूं जार्णूं इं हत्या नै दायजै रो मामलो बणा’र सरला रै सासरलां पर मुकदमो चलाइजसी. मन्नै दुनिया री कोई कोरट कचेड़ी हत्यारो बणा’र हथकड़ी नीं घाल सकै अर रमेस पचैरी अबै रयो कोनी. साची बात आ है कै सरला री हत्या होवण रै लारै म्है अर रमेस पचैरी दोनूं हां. म्हानै इंयां भी लागै जाणै सरला रा सासरला इण हत्या सारू इत्ता दोसी नीं है जित्तो म्हूं.

ईं बात नै सावळ समझणै सारू आपां नै आठ बरस लारै बीं सागी दिन तांई पूगणो पड़सी जद रमेस पचैरी मरयो अर बिंरी ल्हास सारै बैठ’र म्हूं,, सरला अर बिमला अेक लाम्बी सीक काळी रात रो अेक अेक छिण छुलतां-छुलतां काढ्यो हो. बगत रो चकरियो जिंया कै थमग्यो होवै. अनिश्चय अर संका रै गैरै अन्धारै रो दुशालो ओढयां म्है तीनूं रमेस पचैरी री ल्हास खन्नै बैठ्या हा, मूरत बण्या, डाफाचूक सा, सोचां मांय गम्योड़ा.

रमेस पचैरी मेरो कोई सगो-समधी नीं हो, लंगोटियो भायलो भी नीं. बीं रै साथै बस इत्ती मिलगत ही कै म्हे दोनूं रसद विभाग मांय साथै काम करया करता. बींरो ओर कठई बेलिपो नीं हो इण सारू फगत म्हूं ई बींरो भायलो हो. बो फक्कड़ अर आपो आप मांय मस्त रैवणियो जीव हो, अर आपई बो मरग्यो. म्हारी मिलगत बींरै साथै इंया भी फिट कोनी बैठी कै बो दारूड़ियो हो अर म्हनै दारू रै नांव सूं ई चिड़. दारू री बांस सूं ई  मेरै नास्यां मांय बळत लाग जांवती, अर रमेस तो लुगाई रै चल्यां पछै बेथाग पिवण लाग्यो. मैं घणोई केवंतो ‘अबै भौजाई नीं रई. सरला अर विमला रो भविख ना बिगाड़. इंया हर घड़ी नसै मांय टुल्ल रैसी तो आं रा हाथ पीळा कुण करसी ?’ बो सदांई लड़खड़ांवती जबान सूं केवंतो ‘थूं है नीं मेरो भाई, तेरै थकां म्हानै क्यांरी चिन्ता? तन्नै छोड़ अठै दूजो है कुण? अेक भैन ही, बा कैन्सर सूं मरी गई, निपुतरी, बनेई दूसरो ब्या कर लियो, काका -बाबा, भाई भतीजा है ई कोनी, लुगाई अधबिच्चाळै दगो देयगी, अबै पीळीभीत सूं हजारूं कोसां रै आंतरै तेरै खन्नै बैठ्यो हूं.’

बीं री बातां सुण‘र म्हूं अबोलो रैय जांवतो अर आपरी जिंया तियां ठरड़ीजती गिरस्ती मांय पाछो बावड़ जांवतो जठै म्हूं हो, म्हारा थुड़पणां हा, अबखायां ही अर भाडै़ सट्टै री लियोड़ी जूण ही.

फरवरी री अेक काळीसीक रात नै लगैटगै नौ बज्यां सरला घबरायोड़ी सी म्हारै घर रो आडो खुड़कायो अर डरयोड़ी सीक बोली ‘ अंकलजी, म्हारै पापा रै कांई ठाह कांई हुग्यो, लोई री उल्टी होई है अर बै बेचेत पड़या है’.

रात नै नौ बज्यां म्हूं रमेस पचैरी नै ले’र सरकारी अस्पताल गयो हो अर इग्यारा बज्यां बींरी लास ले’र बावड़यो, बीं घड़ी घर मांय फगत म्है तीन जणा हा. ते’रा बरसां री सरला, दस बरसां री बिमला अर उमर रै बरसां बिच्चाळै जूझतो म्हूं. म्हूं पैली बिरियां देख्यो कै चाळीस वाट रै लट्टू रै च्यानणै  मांय बाप री मौत सूं अनाथ होई बेट्यां किंयां धीरज सूं बैठै. सरला अर विमला री आंख्यां मांय आंसू कोनी, अेक अणजाण सो डर हो. चैरै पर रोणो नीं अेक जड़ता ही अर होठां पर कोई किरळाटो, कोई हेलो, कोई बात नीं, अेक गैरो मून पसरयोड़ो हो. 

अबै के होसी अंकल? मून मांय डूबी सरला आखी रात मांय फगत इत्ती बात बोली ही कै बींरा पापा बतांवता कै दूर रै रिस्तै रो म्हारो अेक मामो फर्रूखाबाद रैवै.

अर म्हे तीनूं रमेस पचैरी री ल्हास रै असवाड़ै पसवाडै बैठ्या हा, पूरी रात अबोला, मून मांय.

सुबै भेळा होया- थोड़ा घणा लोग दफ्तर रा, गळी बास रा अर ई अणजाण सै’र रा. बोल-बतळावण रै मांय सगळा आप आप रै हिसाब सूं लेखो करै.

‘भोत माड़ो होयो भई, मईनै पैली मां अर अबै बाप रो आसरो ई बापड़ै टाबरां सूं खुसग्यो.’

‘ईं आदमी रै तो कोई कडूम्बो ई न्याड़-नैडास कोनी, अबै आं टाबरां रो कांई होसी?’

‘इसी मौत तो भगवान बैरी दुसमण नै ई नीं देवै’
‘मौत नीं भई, इण नै तो आत्महत्या ई केवणो चाइजै, पीळीयो होयोड़ो हो पण पीवणो नीं छोड्यो.‘

‘बातां छोड़ो यार, खापण तो देवणो पड़सी, आओ कीं  इन्तजाम करां.’

‘ठीक बात है, आपां नै ई करणो पड़सी, रिस्तेदारां तो कोई आंवता दिस्या कोनी पछै किनै उडीकणो है.’

जिंयां तिंयां किरिया करम पूरा सूरा करता थकां रमेस पचैरी रो बारो होयो. बेई सागी लोग भेळा होया जिका दाग री घड़ी हा, हां  रमेस पचैरी रै दूर रै रिस्तै मांय लागतो साळो गणेसी फर्रूखाबाद सूं आयग्यो हो. गंठीजेड़ै ठींगणै डील रै गणेसी रा  दांत कोडी सूं पीळा पड़योड़ा हा, पक्कै रंग रो गणेसी देखण मांय रेल्वे रो पेटवान लागतो हो अर बो हो ई. जरदै खैणी अर तास रो चासकू. मून मांय मस्त.

गरूड़ पुराण रो पाठ पूरो होग्यो अबै सवाल उठ्यो रमेस पचैरी रै मकान रो कांई हुवै? सरला अर विमला रै भविस रो के बणसी?

लोग गणेसी रै मुण्डै साम्ही जोवै हा,  सरला अर विमला डरयोड़ी हिरणी ज्यूं मन्नै तकै ही, म्हूं बान्नै देेखतां थकां देख्यो. सारो तकती अेक अबोली,  टाबरपणै री स्याणप सूं आस लगायोड़ी दीठ. बां दोनां रै बाई सागण ड्रेस पैरण नै ही जिकी बीं काळी अन्धारी रात ही, जद म्है तीनूं रमेस पचैरी री लास सारै आठ घण्टा तांई साथै बैठ्या रया हा. आभै वरणी कुड़ती अर धोळी सलवार, बिन्ध्योड़ै कानां मांय पतळी सींक अर छोटी-छोटी चोट्यां मांय लाल रिबन, पगां मांय काळी चपलां अर बस.., ओई बांरो हार सिणगार अर आई सज धज.

‘अबै तो मामै रै साथै ई जावणो पड़सी, क्यूं भाईजी ? और चारो ई के है ?’ अेक जणो सीधो ई मन्नै बोल्यो.

‘और करां भी के ?’ म्हारै सुर मांय उदासी सूं बेस्सी अणबस्सी ही.

‘अर ईं मकान रो कांई होसी ?’ कुण ई पूछ्यो, जिण रो ऊथळो मामै दियो अर जरदै री पिचकारी सी छूटगी ही ‘ इन्नै तो मन्नै बेचणो ई पड़सी’.

चाणचकै ई कुण ई सीधो म्हारै साम्ही सवाल राख्यो ‘सुभास, भाड़ै रै मकान  नै छोड’र तूं आं’रै साथै क्यूं नीं रैवै ? जित्तो भाड़ौ बठै देवै बीत्तै सूं आं छोरयां रो गुजारो हो जिसी.’

‘नीं नीं भई....., ओ नीं हो सकै..., म्हूं किंया..... कद तांई साम्ह सूं.....? मेरी आपरी गिरस्ती है, दुख दरद है.’

‘रमेस पचैरी थारो भायलो हो यार, पछै बींरी छोरियां थारी छोरी हुई का नीं ?’

‘ अर बेटी बणा’र नीं राख सकै तो भगवान री मैर सूं थारै  बरस चऊदा रो छोरो भी है अर सरला थारी जाणी पिछाणी है’

‘ ओ किंया....... नीं यार, ओ किंया हो सकै ? अेे सनाढ्य ब्राह्मण अर म्हे सरयूपारीण गोस्वामी, ओ नीं हो सकै.’

‘अंकल, म्हे कठैई को जावां नी, म्हानै थै राख लो, थारै खन्नै.’ सरला री आवाज जाणै किणी आंधै कुवै सूं आई ही जिकी म्है सुणी अर बड़ी मुस्किल सूं अणसुणी करदी.

म्हारै मांयलो डरयोड़ो आदमी साम्ही दीसतै बोझ सूं छुटकारो पावणो चांवतो कै चाणचकै सरला बोली ‘ अंकल पापा केवंता......कै बांरी नौकरी म्हानै मिल जिसी.’

‘ ना बेटी, ईं रै मांय तो भोत लम्बो बगत लागसी, अबार थूं आठवीं मांय पढै अर थान्नै अठा’रा बरस आंवता अजै पांच बरस और लागसी अर म्हारै सारू ओ पाॅसिबल नीं है कै पांच बरस तांई म्है....... पांच साल ताणी थारी निगै......., अर फेरूं मामोजी किसा पराया है ? आपणा है, थान्नै साम्ह ई सी.’

आस रा सगळा आडा ढकीजतां देख सरला रै मुण्डै सूं निसरयो ‘ ठीक है अंकल, म्है उड़ जिस्यां, मामोजी साथै उड़ जिस्यां.’ अर घर रै ताळो लगा’र सरला चाबी मामै नै झलाय दी जाणै आपणो भवीस बींरै हाथ सूंप्यो हुवै. ते’रा बरसां री टाबर इत्ती स्याणी कियां हो जावै, ओ म्हानै आठ बरस पैली ठाह लाग्यो हो. गणेसी री मुळक अर सरला री उदासी म्हूं आज तांइ नीं बिसरा सक्यो हूं.

अर आज सरला री मौत रो समचार पूग्यो है, अर म्हैं सोचूं हूं कै बींरी हत्या कुण करी ? रमेस पचैरी, का गणेसी अर का पछै बींरै सासरलां ? दुनिया री कोई कचेड़ी म्हानै हत्यारो बता’र हथकड़ी नीं पैराय सकै पण म्है सरला रो हत्यारो, आज भोत गैराई सूं सोच रयो हूं कै विमला अबार कठै होयसी ? कठैई बींरी हत्या रो इल्जाम ई म्हारै माथै नीं आवण आळो है ?
                                                                   *****


Wednesday, 29 April 2020

शिक्षक का ख़त

....सर, हमें हमारे बच्चों से कविता नहीं करवानी है हम तो बस यही चाहते हैं वह अपने पैरों के ऊपर खड़े हो जाएं. आप तो उन्हें बस खींचकर पढ़ाइए. कक्षा में टॉप होने चाहिए हमारे बच्चे. जरूरत पड़े तो दो लगाने में भी संकोच न करें, हम कोई उलाहना नहीं देंगे.

‘... माफ कीजिए, आपके बच्चे कविता कर भी नहीं कर पाएंगे.’
‘क्यों सर... ?‘
‘सुनने का समय हो, तो बताता हूं.’
‘कविता करने के लिए एक स्वच्छ और निर्मल ह्रदय चाहिए जबकि आप बच्चों में ऐसा मन विकसित होने ही नहीं देना चाहते. आपको भले ही अटपटा लगे लेकिन आप अपने बच्चों को एक इन्वेस्टमेंट के रूप में देख रहे हैं. अधिकांश मां बाप यही चाहते हैं कि उनके बच्चे बड़े होकर उनका आर्थिक सहयोग करें यानी इन्वेस्टमेंट के बदले उन्हें पूरी रिटर्न मिले. आपने अपना पूरा ध्यान बच्चे के नैसर्गिक विकास की बजाय अर्थ से जोड़ लिया है.

आप की यही सोच बच्चों का बचपन खा रही है. सच पूछो तो आपकी उम्मीद ने बच्चों के चेहरों से हंसी, आंखों से सपने, और मन से विश्वास छीन लिया है. आपके सपनों को पूरा करने के लिए उसे एक ऐसी अंधी दौड़ में धकेल दिया गया है जिसका अंत क्या होगा कोई नहीं जानता. आपके द्वारा अनायास ही किए जा रहे ऐसे व्यवहार से बच्चों में कर्कशता, कठोरता, कुटिलता और छल, छंद के साथ द्वंद की वृत्ति पनप रही है. इस वृत्ति ने बच्चों से कोमलता, मित्रवत व्यवहार और संवेदनशीलता को छिनने का काम किया है. यदि स्पष्ट शब्दों में कहूं तो आपका बच्चा एक उत्पाद बनने की ओर अग्रसर है जिस पर आप येन केन प्रकेरेण तथाकथित सफलता का टैग लगा हुआ देखना चाहते हैं.

खिलखिलाते, मुस्कुराते बच्चे सबको अच्छे लगते हैं लेकिन जरा सोचिए क्या हम अपने बच्चों को खुलकर हंसने का वातावरण दे पा रहे हैं ? क्या हम बच्चों को उनके प्राकृतिक स्वरूप के साथ आगे बढ़ने के अवसर प्रदान कर रहे हैं ? क्या हम बच्चों के मन को टटोलने का प्रयास करते हैं ?

कहने को आप हां भर सकते हैं लेकिन आप भी जानते हैं यथार्थ कोसों दूर है. सच्चाई तो यह है कि आपके पास इतना समय ही नहीं है कि बच्चे से उसके मन की बात कर लें. आपने बच्चों को सिर्फ वे सपने देखने की आजादी दी है जो कभी आपने अपने मन में पाले थे. आप यह भूल जाते हैं कि आपके सपने यदि पूरे न हो सके तो इसमें बच्चे का कुसूर नहीं है. प्राकृतिक रूप से उसे भी सपने देखने और उन्हें पूरे करने के भरपूर अवसर मिलने चाहिए. आपको तो उसका सहयोग करना चाहिए ना कि अपनी सोच और अपने सपने उस पर थोपने चाहिए. कभी खुद को उस बच्चे के स्थान पर रख कर देखेंगे तो आपको शायद एहसास होगा कि बालमन कैसा होता है. लेकिन व्यवसायिक आपाधापी के दौर में आप में ऐसा करने की हिम्मत बची ही नहीं है.

श्रीमान जी, एक शिक्षक का काम यह नहीं होता कि वह अपने विद्यार्थियों को रटंत तोता बना दे और किसी भी ढंग से शैक्षिक परीक्षाओं में 90ः से अधिक अंक लाने की कुटिल कला सिखा दें. यदि आपका बच्चा किसी नौसिखिए के सानिध्य में ये दोनों कलाएं सीख जाता है तो यकीन जानिए कि वह आपके सपने तो पूरे कर देगा लेकिन जिंदगी में सफलता से कोसों दूर हो जभेजिए. परन्तु उत्पाद सरीखे बच्चे बड़े होकर आपकी उम्मीदों पर खरे उतरें, इस उम्मीद को तो त्यागना ही पड़ेगा.ाएगा. सफलता के मायने सिर्फ रुपया पैसा और भौतिक संपदा अर्जित करना नहीं होता बल्कि एक ऐसा जीवन जीना है जो अपनी व्यवहार कुशलता और सादगी से सबके लिए प्रेरणादायी बने. माना कि रुपया पैसा जिंदगी के लिए जरूरी है लेकिन खुशियों के लिए तो मन के भाव स्वतः ही उमड़ते हैं जो किसी रुपए पैसे के मोहताज नहीं होते.

एक शिक्षक का काम शैक्षिक विषयों के साथ अपने विद्यार्थियों को जीवन जीने की कला सिखाना होता है. कदम-कदम पर उसका हौसला बढ़ाना और उसे प्राकृतिक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना शिक्षक का नियमित कार्य होता है. इसमें भी सबसे बड़ा काम उसे अपने विद्यार्थियों को संवेदना से भर देने का होता है जो उन्हें पशुता से मनुष्यता की ओर ले जाता है. इसी संवेदना से कविता जन्मती है जिसे गुनगुनाता तो पूरा संसार हैं लेकिन उसके सृजन का सुख बिरलों को नसीब होता है.

इसलिए माफ कीजिए श्रीमान, आपके बच्चे आपकी व्यवसायिक सोच के रहते कविता नहीं कर पाएंगे. हां उन्हें बेहतर उत्पाद बनाने के लिए स्कूल अवश्य भेजिए !

 -रूंख

Tuesday, 28 April 2020

फेसबुकिया सब्जी मंडी में चलिए ना !

फेसबुक एक सब्जी मंडी है जहां कभी-कभी आलू-प्याज भी डेढ़ सौ रुपए किलो बिक जाते हैं और कभी सेव संतरे धरे रह जाते हैं. इस बाजार का नियम है सब्जी हो या फल, बड़ी जल्दी बासी हो जाते है. बासी सब्जी और सड़े हुए फल खाना कौन पसंद करता है भला !

चैबीसों घंटे खुली रहने वाली इस फेसबुकिया सब्जी मंडी में आवारा पशुओं का होना भी स्वाभाविक है जो सब्जी और फलों की टोकरियों के साथ बाजार की गंदगी में मुंह मारते नजर आते हैं. इनमें गाय, गोधे, कुत्ते, बिल्लों के साथ गधे और खच्चर भी शामिल है. इनसे दुकानदार और ग्राहक दोनों परेशान रहते हैं. इस बाजार में कोई म्युनिसिपालिटी इन आवारा पशुओं को नहीं पकड़ सकती, उन्हें झेलना ही बाजार की मजबूरी है. 


इस मण्डी की एक और खासियत है. जब आम, संतरा, केला, किन्नू या फिर गोभी और मटर का सीजन होता है तो यहां चारों और एक जैसी चीजें दिखाई देती हैं. केले बिक रहे हैं तो सिर्फ केले ही केले, बैंगन आए हैं तो सिर्फ बैंगन ही बैंगन. 


इस बाजार में घूमते हुए शर्मा जी की मुलाकात वर्मा जी से हो जाती है तो अरोड़ा आंटी बाजार में ही मिसेज जैन से अपने सुख-दुख बांट लेती है. सिद्धार्थ और राहुल जैसे नौजवान भी अक्सर सब्जियों के थैले लिए दिख जाते हैं परंतु ये युवा चेहरे सब्जी मंडी में आई रिंकी और पिंकी द्वारा खरीदी जा रही चीजों की ओर ज्यादा ध्यान देते हैं, भले ही वो बेमौसम की ककड़ियां खरीद रही हों. मां ने सिद्धार्थ से भले ही भिण्डियां मंगवाई हो लेकिन वो बाबू तो ककड़ियों को बेहतर बताने के लिए कमर कस चुके हैं. कसे भी क्यों ना, आखिर रिंकिया की पसंद का सवाल है !


यहां कुछ लोग रोज मण्डी जाते हैं तो कई महीनों तक दिखाई ही नहीं देते. कुछ ऐसे भी है जो बाजार की भीड़भाड़ के कारण दूर से ही हाथ हिला कर बड़ी जल्दी निकलने की कोशिश करते हैं तो कई पकड़ कर ही बैठ जाते हैं, लाख छुड़ाने पर भी हाथ नहीं छोड़ते. 

कई रेहडी वाले इस बाजार की व्यवस्था बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ते और शाम ढलने से पहले चिल्ला-चिल्लाकर अपना माल बेच ही जाते हैं. कई चतुर खिलाड़ी साधुवाली के किन्नुओं को नागपुर के संतरे बताकर बेच देते हैं तो कई अपने आमों को मलिहाबादी साबित करने के लिए ग्राहकों से झगड़ा कर बैठते हैं. 

कभी-कभी लड़ाई इस कदर बढ़ जाती है कि बरसों पुराना ग्राहक एक झटके में संबंध तोड़ लेता है और उसकी दुकान पर कभी न चढ़ने की कसम खा लेता है. इस बाजार के कुछ दुकानदार डंडी मार कर तोलने से नहीं चूकते तो कई ग्राहक सब्जी के साथ धनिया और मिर्च मुफ्त उठाना अपना अधिकार समझते हैं. 


कुल मिलाकर इस सब्जी मंडी के नजारे देखने लायक हैं. आप और मैं चाहें तो अपना चेहरा भी इस मंडी में घूम रहे मनुष्य और पशुओं के किरदारों में ढूंढ सकते हैं. कोशिश कीजिए ना !

 -रूंख


शहर के बीचों-बीच शाहरुख खान बांट रहा कैंसर

  - नशे के प्रचार में सहयोगी बना शहर का प्रशासन सूरतगढ़, 07 अक्टूबर। एक तरफ जहां जिले भर में पुलिस प्रशासन द्वारा नशामुक्ति अभियान चलाने की ...

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