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Sunday, 30 March 2025

एक था इंदिरा सर्किल !


 - विकास का पुल लील गया थार का प्रवेश द्वार

- 40 साल पहले हुआ था चौक का नामकरण 

इतिहास लिखने के लिए अलग कलम नहीं होती, उसे तो सिर्फ घटनाएं और तथ्य चाहिए। घटना अच्छी हों या बुरी, इतिहास के पन्नों पर कोई फर्क नहीं पड़ता। सूरतगढ़ स्थित थार के प्रवेश द्वार 'इंदिरा सर्किल' का जमींदोज़ होना भी ऐसा ही एक तथ्य है जो देखते-देखते ही इतिहास बनने जा रहा है।  आने वाली पीढ़ियां बमुश्किल से यकीन कर पाएंगी कि कभी यहां शहर का सबसे व्यस्त चौक हुआ करता था।

सूरतगढ़। शहर की दक्षिणी पूर्वी दिशा में स्थित इंदिरा सर्किल, जिसे थार का प्रवेश द्वार माना जाता था, अब गुजरे जमाने की दास्तां बनने जा रहा है। अपनी आखिरी सांसे गिनता यह सर्किल विकास के पुल तले दफ़न होने की तैयारी में है। हालांकि शहर के इतिहास में यह पहली बार नहीं है। इससे पहले लाइनपार स्थित किसान नेता चौधरी चरण सिंह की स्मृति में बने चौक का भी ऐसा ही हश्र हुआ था। 

'घूमचक्कर' के नाम से प्रसिद्ध 'इंदिरा सर्किल' के इतिहास की बात करें तो लगभग 40 वर्ष पूर्व स्व. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की स्मृति में युवा कांग्रेस के कुछ उत्साही कार्यकर्ताओं ने यहां एक झंडा और फोटो लगाकर इस स्थल को इंदिरा सर्किल का नाम  दिया था। उन दिनों चौतरफा कांग्रेस राज हुआ करता था ऐसे में आपत्ति भी कौन करता ! बस, देखते ही देखते सूरतगढ़ के इतिहास में इंदिरा सर्किल ने अपनी जगह बना ली जहां से बीकानेर और श्रीगंगानगर के लिए सड़कें निकलती थी। ठीक सामने की तरफ जाल वाले बाबा रामदेव का प्राचीन मंदिर स्थित था। उन दिनों आबादी से ठीक बाहर धोरों के बीच स्थित यह सर्किल शहर के लिए प्रवेश द्वार का भी काम करता था। बीकानेर और श्रीगंगानगर से आने वाली बसें यहां विश्राम लिया करती थी जिसके चलते कुछ होटल और रेस्टोरेंट भी यहां खुल गए थे। तथ्य तो यह भी है कि इस चौक के पश्चिम दिशा की सैकड़ों बीघा सरकारी भूमि पर भूमाफियाओं ने कब्जे कर खूब चांदी काटी। अवैध कब्जों के इस खेल में सत्ता और प्रशासन की भागीदारी भी बराबर बनी रही। 

इस चौक के दुर्दिन तो 2014-15 से ही शुरू हो गए थे जब सत्ता और प्रशासन की शह के चलते बांगड़ ग्रुप की कंपनी 'श्री सीमेंट' ने यहां अपना झंडा और 'लोगो' रोप दिया था। कंपनी के इस कृत्य पर विपक्ष और जन विरोध के सुर भी उठे थे लेकिन उनमें वह ताकत नहीं थी जो किसी कॉरपोरेट की मनमानी को रोक सके। उस समय श्री सीमेंट प्रबंधन ने इंदिरा सर्किल के सौंदर्यकरण को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की थी। दिखावटी तौर चौक की रेलिंग रिपेयर की गई और  कुछ पौधे भी लगाए गए  मगर सार-संभाल के अभाव में सब दम तोड़ गये। आलम यह बना कि सर्कल की साज़-सज्जा तो दूर, चौक के चारों तरफ घूमते टूटे हुए हाईवे से उड़ती धूल के गुबार चौतरफा छाने लगे। 

पिछले 7-8 साल से नेशनल हाईवे पर कमल  होटल से स्टेडियम तक फ्लाईऑवर का निर्माण जारी है। 'कानी के ब्याह में सौ कौतुक' जैसी कथा वाले इस ओवरब्रिज ने इंदिरा सर्किल के अस्तित्व को मिट्टी में मिला दिया है। जो थोड़े बहुत अवशेष बचे हुए हैं वह भी बड़ी जल्दी सूरतगढ़ के इतिहास में दफन होने वाले हैं। विकास की कुछ कीमत तो आखिर शहरवासियों को चुकानी ही पड़ेगी । ऐसे में गीतकार नीरज की पंक्तियां याद आती है- 

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,

लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,

और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे

कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे...! 

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Thursday, 13 March 2025

बीकानेर थियेटर फेस्टिवल : कला और संस्कृति का कुंभ

 

मुझे लगता है मैं महाकुंभ न सही, कुंभ  स्नान तो कर ही आया हूं। 'बीकानेर थियेटर फेस्टिवल' में भाग लेने की अनुभूति किसी भागवत कथा के श्रवण समान ही सुखदायी रही, मन संवेदना और भावनाओं के सागर में डुबकियां लगता रहा। मेरे जैसे ढोल के लिए तो यह कुंभ स्नान ही हुआ ना ! 


दरअसल, 'बीकानेर थिएटर फेस्टिवल' रंगमंच, साहित्य और कला का समुच्चय भर नहीं है बल्कि यह दुनियाभर की सांस्कृतिक विरासत, नाट्य शास्त्र की परंपराओं और कलाओं को समसामयिक संदर्भों में बांचने का अद्भुत आयोजन है। यह फेस्टिवल पिछले 9 सालों से प्रतिवर्ष आयोजित हो रहा है। इस बार 8 मार्च को शुरू हुए पांच दिवसीय उत्सव में 20 से अधिक नाटकों का मंचन हुआ, नुक्कड़ नाटक खेले गए, नाट्य प्रशिक्षण कार्यशाला और रंग संवाद आयोजित किये गए । इन नाटकों का मंचन बीकानेर के टाउन हॉल, रविंद्र रंगमंच, और टीएन ऑडिटोरियम में हुआ। मेट्रोपोलिटन शहरों में होने वाली नाटक प्रस्तुतियों में अक्सर दर्शकों का अकाल रहता है, वहीं एशिया के सबसे बड़े गांव कहे जाने वाले बीकानेर में सभी हॉल दर्शकों से खचाखच भरे रहे। 


इस फेस्टिवल में देश भर के नाट्य मंडलों ने अपनी शानदार प्रस्तुतियां दी। इन प्रस्तुतियों में लखनऊ ग्रुप के नाटक 'भगवद्ज्जुकीयम',  जोरहाट असम की प्रस्तुति 'द रिलेशन', राष्ट्रीय कला मंदिर श्रीगंगानगर का नाटक 'ये लोग ये चूहे' और मुंबई ग्रुप का 'गोल्डन बाजार' अभिनय और कल की दृष्टि से बेहद शानदार रहे। दिल्ली ग्रुप के नुक्कड़ नाटक भी अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहे। वरिष्ठ रंग कर्मी और साहित्यिकार मधु आचार्य मानते हैं कि नाटक का प्रस्तुतीकरण ऋषि कर्म है। उनकी बात से सहमत हुआ जा सकता है क्योंकि नाटक में साहित्य, संगीत, नृत्य, वेशभूषा, चित्रकला, वास्तु शास्त्र सहित नवरस विद्यमान रहते हैं। इन सब विधाओं का सामूहिक निर्वहन अत्यंत दुष्कर है, इसके लिए पूर्ण समर्पण, निष्ठा और अनुशासन आवश्यक तत्व हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की नाटक में रिटेक जैसा कुछ भी नहीं होता। अच्छा हो या बुरा, जो भी घटित होना है, दर्शकों के सामने होना है। शायद यही कारण है कि रंगमंच को समस्त कलाओं में सर्वोपरि माना जाता है। 

बीकानेर के इस उत्सव में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए विद्वजनों और समर्पित कलाकारों से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। नए विचार और गहन चिंतन भरे संवाद दिल दिमाग में अब भी गूंज रहे हैं। सच कहूं तो शब्द और कला के कुशल चितरे भायले हरीश बी. शर्मा के स्नेहिल निमंत्रण से यह कुंभ यात्रा अनूठी बन पड़ी है। कला संगम  की इस यात्रा में श्री राजूराम बिजारणिया और श्रीमती आशा शर्मा सहयात्री बने, उन्होंने भी इस उत्सव का भरपूर आनंद लिया। हम सबकी तरफ से बीकानेर थिएटर फेस्टिवल के आयोजकों को अलेखूं बधाइयां और उत्तरोत्तर प्रगति की मंगल कामनाएं। 

थियेटर संग पुस्तक दीर्घा : हरीश बी शर्मा का नवाचार 

बीकानेर थियेटर फेस्टिवल में बिखरे  रंगों के बीच हरीश बी. शर्मा द्वारा किया गया पुस्तकीय नवाचार एक सराहनीय कदम है । गायत्री प्रकाशन और पारायण फाउंडेशन की इस पुस्तक-दीर्घा योजना में लोगों का खासा उत्साह रहा। हंसा गेस्ट हाउस में इस बार दीर्घा के साथ किताबें बैठकर पढ़ने के लिए भी इंतजाम किए गए ताकि पाठक यहां बैठकर भी अपनी पसंद की किताबें पढ़ सकें। इस योजना के तहत देशभर के लेखकों की पुस्तकें समान भाव से रखी जाती है ताकि पाठक को प्रकाशक के बैरियर और मनोपोली का नुकसान नहीं हो। दीर्घा में प्रदर्शित पुस्तकें अगर किसी पाठक को खरीदनी हो तो वो संबंधित लेखक या प्रकाशक से संपर्क कर सकता है। लेखक और पाठक के बीच सेतु के रूप में यह कार्य पूरी तरह से अव्यवसायिक है जिसका एकमात्र उद्देश्य पुस्तकों के प्रति पाठकों में संवेदना जागृत करना है जिससे वे किताब पढ़ने के मार्ग पर पुन: लौट सकें। 

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

Tuesday, 5 November 2024

भाषायी लालित्य लिए मन को छूनेवाली कहानियां


- मनोहर सिंह राठौड़

(पांख्यां लिख्या ओळमा की समीक्षा) राजस्थानी और हिंदी भाषा के वरिष्ठ साहित्यकार मनोहर सिंह जी राठौड़ का कला और संस्कृति से गहरा नाता है। लेखक होने के साथ-साथ वे एक कुशल चित्रकार और प्रतिबद्ध समीक्षक भी हैं। शेखावाटी की ठसक और जोधपुर की मिठास को एक साथ संजोने वाले राठौड़ साहब पिछले कई दिनों से स्वास्थ्य लाभ पर थे। उन्होंने 'पांख्यां लिख्या ओळमा' की कहानियों पर सारगर्भित टिप्पणी की है। लखदाद राठौड़ साहब, आपका आशीर्वाद सिर माथे ! आप मित्र लोग भी उनकी समीक्षा को बांचिए-

कहानीकार - डा. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख'

पुस्तक - पांख्यां लिख्या ओळमा [राजस्थानी ]


पिछले साल छपा यह कहानी संग्रह नौ कहानियों को 80 पेज में समेटे हुए है। राजस्थानी भाषा की मान्यता के जुझारु सिपाही डा.सारस्वत मूल रूप से कवि हैं लेकिन उन्होंने राजस्थानी भाषा में बहुत सुंदर कहानियां भी लिखी हैं। 

इस संग्रह की टाइटल कहानी '' पांख्यां लिख्या ओळमा '' मानवीय भावना से ओतप्रोत है। खाड़ी देश में कमाने गए व्यक्ति को उस समय की मजबूरी के हिसाब से उसकी पत्नी अनेक बार में रिकार्ड किए गए मनोभावों की कैसेट किसी के साथ भेजती है।वह कस्बे से निकलते ही बस में रह जाती है। लेखक को कैसेट मिलती है। पेंतीस बरस बीत गए। इस बीच कथा नायक की पत्नी की मृत्यु हो जाती है।लेखक द्वारा फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर सूचना भेजने से कथा नायक आकर कैसेट प्राप्त करता है। मृत पत्नी की आवाज पैंतीस बरस बाद कैसेट से सुनकर भावुक हो जाता है।कहानी का अंत सुखांत परिस्थिति उत्पन्न कर मानवीय कोमलतम भावों को बड़ी मार्मिकता से उजागर करता है।


इसी प्रकार पहली कहानी, '' संकै री सींव '' में प्राचीन परंपरा से बंधे छोटे से गांव की मानसिकता का अंकन सुंदर ढंग से किया है।गांव में परिवार नियोजन के सुरक्षा कवच की फैक्ट्री लगने की बात पर बवाल मचता है। गांव की औरतों को फैक्ट्री में काम मिलने व आर्थिक विकास की बात समझाने पर भी सहमति न होना फिर नाटकीय ढंग से महिला सरपंच द्वारा आगे आकर स्वीकृति देना, मजबूत कदम साबित होता है। गांव की मानसिकता, महिला सशक्तिकरण, विकास की दौड़, देश की योजना में सहयोगी बनना आदि कई मुद्दे सामने आते हैं।


' प्रीत रो परचो ' कहानी में आज की प्रमुख समस्या पेपर लीक को बड़े सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया है। इसमें एक नवयुवक और नवयुवती के बीच पनपने वाले प्यार के कोमल तंतुओं को बहुत कोमलता, शालीनता से उजागर किया है।सारी यातनाएं झेलने के पश्चात उनका प्रेम विवाह नवयुवती के साहसिक कदम से आकार लेता है। संग्रह की सभी कहानियों को डा. सारस्वत ने राजस्थानी जन जीवन की गरिमा को बनाए रखते हुए पूरी संजीदगी, सावधानी से प्रस्तुत किया है।आज के कथानकों को बहुत खूबसूरती से आगे बढा कर मन को छूनेवाली कहानियां लिखी हैं।ये सभी कहानियां अपने आस-पास की लगती हैं।पात्रों का शानदार चयन, सटीक संवाद, सुंदर शैली और भाषा का लालित्य मन मोह लेता है। हनुमान गढ, श्री गंगानगर जिलों की भाषा का प्रभाव , कहावतों-मुहावरों के नगीने राजस्थानी भाषा के एक अनूठे तेवर को प्रस्तुत करते हैं। उस क्षेत्र की माटी की खुशबू सर्वत्र फैली हुई हे।


राजस्थान के सभी क्षेत्रों के पाठक इन कहानियों की भाषायी सरलता, शब्दों के चयन के कारण इनके मर्म तक आसानी से पहुंच सकते हैं। किसी भी कृति की पठनीयता उसे पाठकों के आकर्षण का केन्द्र बिंदु बनाती है। यह कथा संग्रह एक बार पढ़ना प्रारंभ करने पर पूरा पढे बिना हाथ से छूट नहीं सकेगी।

Wednesday, 30 October 2024

लोटे से टॉयलेट जैट तक का सफ़र

इस बात पर बेसाख्ता हंसी छूट गई, ख़्यालों में उन दिनों की परतें उघड़ने लगी जब शौचकर्म के लिए इतनी सुविधाएं विकसित नहीं हुई थी। वो पगडंडियों के दिन थे। सच पूछिए, लोटे से टॉयलेट जैट स्प्रे तक आने में हमें लगभग आधी सदी लगी है ! आज उसी यात्रा के कुछ पन्ने पलटते हैं जिसमें मध्यमवर्गीय परिवारों की विकास गाथा के चिन्ह बिखरे पड़े हैं।


पोतड़ियों का जमाना तो याद नहीं, हां, 1977-78 का वक्त रहा होगा। हनुमानगढ़ जंक्शन की लोको कॉलोनी में स्थित घर के बाहर बनी नाली पर बैठने की कुछ धुंधली सी यादें आज भी ज़ेहन में हैं। नाली के दोनों तरफ पैर रखकर बैठना, शर्ट को ऊंचा कर दोनों हाथों से पकड़ना, पास में एक डंडा रखना, मां का पूछना, 'जा लियो के !', जावूं......!! इसी बीच गली में घूमते आवारा सुअरों को देख भाग खड़े होना जैसी टुकड़ा-टुकड़ा स्मृतियां उभरती हैं। आवारा सुअर उन दिनों छोटे बच्चों के लिए जी का जंजाल हुआ करते थे। खास तौर पर नाली पर बैठते बच्चों के साथ तो मानो उनका वैर ही था। हुरड़-हुरड़ करते कब पास आ धमकें, कौन जाने ! पता नहीं सच था या झूठ, मां अक्सर डराया करती थी, आज सूअर ने फलां बच्चे के बटका भर लिया। यह सुनने के बाद बाल मन की कल्पनाओं में डर के साथ उत्सुकता भी जाग उठती थी।


फिर जब कुछ समझ पकड़ी तो नाली पर जाना छूट गया। यादों का अगला पन्ना पलटता हूं जहां मैं बचपन के दोस्त पवन के साथ लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर शौच के लिए जाया करता था। हनुमानगढ़ में आज जहां कलेक्ट्रेट और सिविल लाइंस का गुलज़ार इलाका है, उन दिनों वहां वीरानी पसरी थी। हास-परिहास में यूं कहा जा सकता है, 'आज जहां कलेक्टर बैठते हैं, वहां कभी देश की भावी पीढ़ी लोटा लिए बैठा करती थी !' पगडंडियों के उस जमाने में शौच के लिए हाथ में लोटा या लोहे का डिब्बा उठाए पवन और मैं घर से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर जाया करते थे। निक्कर के उस जमाने में सुख-दु:ख करते हुए दो छोटे दोस्त बिना किसी झिझक के पास-पास बैठकर ही फारिग हो लेते थे।


उन दिनों रेलवे क्वार्टर्स के शौचालयों में 'पॉट' की व्यवस्था होती थी जहां पानी के लिए पुराना मटका और एक डिब्बा रखा जाता था। लोहे का बना यह पॉट रेलवे का सेनेटरी डिपार्मेंट उपलब्ध करवाता था। हम लोग इसे पाट कहा करते थे। सुबह सवेरे रेलवे की एक महिला सफाईकर्मी, जो अपने मुंह और नाक को दुपट्टे से ढक कर रखती थी, आकर इस पाट में पड़े मल को झाड़ू से लोहे के एक पीपे में भर लेती थी। उसे सिर पर उठाए वह घर-घर पहुंचती और पीपा भरने के बाद दूर कहीं ले जाकर खाली करती थी। 


जीवन के इस मोड़ पर आज मैं मैला ढोने वाली उस जननी तुल्य दलित महिला की बड़ी शिद्दत के साथ चरण वंदना करना चाहता हूं। सोचता हूं, कितना घृणित कार्य करने को विवश थी वो महिलाएं, मानव समाज में ऐसी विद्रूप व्यवस्था का यह इतिहास अत्यंत घिनौना है । ओमप्रकाश वाल्मीकि की 'जूठन' और सूरजपाल चौहान की 'संतप्त' कृतियों में मैला ढोने की प्रथा का जो वर्णन किया गया है, वह पाठकों को झकझोर कर रख देता है। आज जो लोग दलित वर्ग के आरक्षण पर सवाल उठाते हैं, उन्हें पता ही नहीं है कि जीवन के निम्नतर स्तर को झेलने वाले इस वर्ग को कितनी प्रताड़ना मिली है, उन्होंने जो कुछ सहा है उसके मुकाबले आरक्षण तो कुछ भी नहीं है । लोकतंत्र की सराहना इस मायने में अवश्य की जानी चाहिए कि उन दलित लोगों को भी समाज की मुख्य धारा में जोड़ा गया है जो कभी उच्च वर्ग का मैला ढोने का काम करते थे।


दलित चेतना, जन विरोध और लोकतांत्रिक सुधारों के चलते रेलवे ने कुछ समय बाद क्वार्टर्स में पॉट परंपरा को समाप्त कर सेफ्टी टैंक का निर्माण प्रारंभ कर दिया था। शौचालय में सिरेमिक सीट लगाकर उनके कनेक्शन टैंक से जोड़ दिए गए थे। 'हमारे तो सीट लग गई, तुम्हारी क्यों नहीं लगी !' पंचायत वेब सीरीज से कहीं बहुत पहले यह डायलॉग हमारे मोहल्ले में हिट हो गया था। पहली बार उस चमचमाती सीट पर बैठने का अहसास किसी बड़ी उपलब्धि से कम न था।


उपलब्धि तो गांव और ननिहाल के पैतृक घरों में धमाका कुई का बनना भी कहा जा सकता है। जब कभी छुट्टियों में गांव जाना होता तो वहां शौच के लिए खुले में जाना पड़ता था। रेत के टीलों पर कहीं भी ओट देखी, बैठ गए। उन दिनों इंदिरा गांधी नहर के निर्माण का काम जोरों पर था, गांव में नहर की एक छोटी वितरिका बन चुकी थी। इस वितरिका में सप्ताह में तीन दिन पानी आया करता था। शौचादि के लिए लोग उसके आसपास ही जाया करते थे। खेतों में जब पानी लगने लगा तो लोगों ने खुले में जाना कम कर दिया। आर्थिक स्तर सुधरा तो घरों में कुइयों का निर्माण होने लगा। इससे घर की महिलाओं को बहुत सुविधा हो गई। हम जैसे फितरती बच्चों के लिए तो कुई भी मनोरंजन का साधन थी। धड़ाम की एक आवाज सुनने के लिए उसमें भरा हुआ लोटा, डिब्बा, कंकड़, पत्थर, न जानें क्या-क्या डाल देते थे ! 


दिन और मैं दोनों आगे बढ़ रहे थे। हां, विकास की इस यात्रा में अब हम चल नहीं रहे थे, बल्कि दौड़ रहे थे। इसी दौड़ में घरों के शौचालय भी खासा संवरने लगे थे। पानी के लिए ब्राश टोंटी, सिस्टन से लेकर पंखे तक के इंतजाम टॉयलेट में होने लगे। शुरू शुरू में जो सीट तेजाब से साफ होती थी, उसके लिए बाजार में टॉयलेट क्लीनर और ब्रश आ गए। टॉयलेट के लिए अलग से परफ्यूम और ओडोनिल जैसे उत्पाद बिकने लगे। फ्लोरिंग टाइल्स से लेकर वॉल टाइल्स तक में आधुनिकता झलकने लगी। बटन पुश करते ही गंदगी साफ, और भला क्या चाहिए ! इंडियन सीट को वेस्टर्न कमोड में तब्दील होते भी ज्यादा वक्त नहीं लगा। सुविधाजनक होने के कारण यह कमोड बीमार और बुजुर्गों की ही नहीं, बल्कि युवाओं की भी पहली पसंद बन गया। जैट स्प्रे के चलते हाथ का तो काम बचा ही नहीं, अब तो वहां आराम से बैठकर नेटफ्लिक्स पर अक्षय कुमार की मूवी 'टॉयलेट- एक प्रेमकथा' तक देखी जा सकती है। अब तो देहात में भी कमोड का चलन हो गया है।

लोटे से जेट स्प्रे तक की इस विकास गाथा में अल्ट्रा मॉडर्न जमाने ने टॉयलेट का नया नामकरण भी कर दिया है। संडास, कुई, शौचालय, लैट्रीन या टॉयलेट कहना तो गुजरे जमाने की बातें हो गई, अब तो अमेरिकन अंदाज में वॉशरूम कहने भर से ही आधुनिकता की फीलिंग आ जाती है। चमचमाता वॉशरूम, स्टाइलिश कमोड, सेंसिटिव जेट, वॉल माउंटेड सिस्टन और सेंसर यूरिनल्स जैसे शब्द अब घर की शान दर्शाते हैं। 'लोटे से टॉयलेट जैट तक का सफर' सही मायनों में मानवीय विकास की अनूठी कहानी है।

-डॉ. हरिमोहन सारस्वत 'रूंख


Wednesday, 16 October 2024

खेजड़ी मंदिर की अद्भुत छटा, शरद पूर्णिमा के दिन लाल रोशनी से जगमग है बालाजी का दरबार


 लाल देह लाली लसै, अरि धर लाल लंगूर

वज्र देह दानव दलन जय जय कपि सूर 

शरद पुर्णिमा ! सूरतगढ़ का श्रंगार कहे जाने वाले खेजड़ी दरबार की छटा आज विशेष दर्शनीय है। हो भी क्यों ना, आज शरद पूर्णिमा का खास आयोजन है। मंदिर परिसर में सजाई गई लाल लड़ियों के प्रकाश में ऐसा लगता है जैसे  सीता माता का स्नेह ‘लाली मेरे लाल की जित देखूं तित लाल..’ बरस रहा रहा है। सर्वविदित है कि हनुमानजी महाराज को लाल सिंदूर से लगाव है, इसी को ध्यान में रखकर इस बार मंदिर कमेटी द्वारा मंदिर की सजावट में लाल रंग की थीम से सजावट की गई है। इसके लिए समिति की पूरी टीम बधाई की पात्र है। इस बार धौलपुर पत्थरों से सुसज्जित मंदिर को सुनहरी लड़ियों से सजाया गया है। खास बात यह है कि तराशे गए पत्थरों पर सजी इन सुनहरी लड़ियों के प्रकाश की विपरीत दिशा में लाल रंग परावर्तित करने वाली खास लाइटें लगाई गई हैं जिससे सुनहरी रोशनी लाल रंग में बदल गयी है । इस लाइटिंग में मंदिर की शोभा बेहद आकर्षक बन पड़ी है। शरद पूर्णिमा की रात में आसमान में चमकता पूरा चांद है, मौसम भी सुहावना है, ऐसे में शहर भर के श्रृद्धालु आस्था और विश्वास लिए खेजड़ी दरबार में पहुंच रहे हैं। धोरों में बीच स्थित बालाजी के दरबार की यह शोभा अवर्णनीय है।


 गौरतलब है कि बालाजी महाराज की कृपा और मंदिर कमेटी के समर्पित प्रयासों से विगत कुछ ही वर्षों में खेजड़ी मंदिर का कायाकल्प हो गया है। कमेटी अध्यक्ष नरेन्द्र राठी ने अपनी टीम के साथ पूरे परिसर को भव्य रूप देने में कसर नहीं छोड़ी है। मंदिर में आज भव्य रात्रि जागरण भी है, यदि आस्था और मन हो तो आपको खेजड़ी दरबार में आज अवष्य हाजिर लगानी चाहिए। 


Friday, 4 October 2024

सफलता है मेहनत का प्रतिफल

 


राजकीय विद्यालय मकड़ासर में सम्पन्न हुआ 'गर्व अभिनंदन', विद्यार्थियों का हुआ सम्मान

लूनकरनसर, 4 अक्टूबर। कोई भी सफलता मेहनत का ही प्रतिफल है। विद्यार्थियों की नज़र हमेशा लक्ष्य पर रहनी चाहिए। यह बात वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.हरिमोहन सारस्वत ने कही वे शुक्रवार को उपखंड लूनकरनसर के मकड़ासर गांव के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में आयोजित 'गर्व अभिनंदन' कार्यक्रम में बोल रहे थे। कार्यक्रम में विद्यालय के 20 विद्यार्थियों का सम्मान किया गया जो 'अंतर्दृष्टि' परीक्षा में सफल रहे। इस अवसर पर उपस्थित साहित्यकार राजूराम बिजारणियां ने कहा कि लूनकरनसर क्षेत्र के प्रतिभाओं की कमी नहीं है, बशर्ते उन्हें सही दिशा दी जाए। इक्कीस कॉलेज, गोपल्याण से जुड़ी आशा शर्मा ने बताया कि गत दिनों संस्थान द्वारा इस परीक्षा का आयोजन किया गया। राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय मकड़ासर के प्रधानाचार्य नेतराम जाट, श्यामसुंदर शर्मा, मोहिनी चौधरी, कृष्णा ने विद्यार्थियों की उपलब्धि पर ख़ुशी जाहिर करते हुए उन्हें निरन्तर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। वहीं सुदेश बिश्नोई ने तकनीकी शिक्षा के महत्त्व पर प्रकाश डाला। सभी सफल विद्यार्थियों को सर्टिफिकेट देकर सम्मान किया गया। इक्कीस कॉलेज की तरफ से सरस्वती प्रतिमा विद्यालय को भेंट की गई।

चिकित्सालय प्रभारी और पुलिस की कार्यशैली के खिलाफ शहरवासी हुए लामबंद, झूठे मुकदमे के खिलाफ आंदोलन की तैयारी

 


सूरतगढ़, 15 सितम्बर। राजकीय चिकित्सालय प्रभारी द्वारा वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार डॉ. हरिमोहन सारस्वत, उमेश मुदगल और 30-40 अन्य रोगी वरिष्ठजनों के खिलाफ संगीन धाराओं में मामला दर्ज करवाने के विरोध आज प्रबुद्ध नागरिकों की बैठक आयोजित की गई। सैन मंदिर में आयोजित इस बैठक में बड़ी संख्या में भाजपा, कांग्रेस, माकपा, बसपा और आम आदमी पार्टी सहित सभी राजनीतिक पार्टियों के प्रमुख नेताओं सहित गणमान्य नागरिक मौजूद रहे। प्रेस क्लब सूरतगढ़ के आह्वान पर बुलाई गई इस बैठक में उपस्थित सभी लोगों ने एक सुर में घटना की निंदा की। वक्ताओं ने राजकीय चिकित्सालय की अव्यवस्थाओं और चिकित्सा प्रभारी के रवैया पर रोष व्यक्त किया।

भाजपा जिलाध्यक्ष शरणपाल सिंह मान ने कहा कि इस मुद्दे पर वे जल्द ही चिकित्सा विभाग के आला अधिकारियों से बात करेंगे और जो भी दोषी चिकित्सक है उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करेंगे। पूर्व विधायक अशोक नागपाल ने कहा कि डॉ. हरिमोहन सारस्वत अपने निजी काम के लिए प्रभारी के पास नहीं गए थे। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो को देखकर कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि सरकारी डॉक्टर के साथ किसी तरह की हिंसा या कोई और घटना हुई है। नागपाल ने कहा कि जो भी हुआ है वह गलत हुआ है हम उसकी निंदा करते हैं। कांग्रेस के ब्लॉक अध्यक्ष परसराम भाटिया ने घटना की निंदा करते हुए कहा कि राजकीय चिकित्सालय में अव्यवस्थाओं का मामला नया नहीं है। जरूरत पड़ी तो हम चिकित्सालय में भी धरना लगाएंगे। जनता मोर्चा के ओम पुरोहित ने कहा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर जिस तरह से प्रहार करने की कोशिश की गई है उसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अगर इस मामले को लेकर सड़कों पर भी उतरना पड़ा तो सबसे आगे खड़े मिलेंगे। उन्होंने पुलिस के कार्य प्रणाली पर भी सवाल उठाया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बलराम वर्मा ने कहा कि भाजपा नेताओं को पार्टी बाजी से हटकर अपने शीर्ष नेतृत्व से बात प्रभारी डॉक्टर को तुरंत हटाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस तरह से संगीन धाराऐं इस मामले में जोड़ी गई है अगर ऐसे मुकदमे होंगे तो फिर आमजन की लड़ाई कौन लड़ेगा। भाजपा महिला नेता रजनी मोदी ने कहा कि कोई भी आम आदमी अव्यवस्थाओं के खिलाफ बोलेगा और उस पर मुकदमा होता है तो जनता को लामबंद होना पड़ेगा। किसान नेता राकेश बिष्नोई ने कहा कि कहा कि इस सब का उद्देश्य है डर का माहौल पैदा करना ताकि लोग अव्यवस्था के खिलाफ बोलना बंद कर दे। उन्होंने कहा कि इस तरह के डॉक्टरों की सूरतगढ़ में जगह नहीं है।

बार संघ न्यायिक के अध्यक्ष एडवोकेट अनिल भार्गव ने कहा कि चिकित्सा प्रभारी डॉ सुखीजा हमेशा से ही विवादित रहे हैं तथा पूर्व में भी एपीओ हुए हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले में पुलिस भी बराबर की दोषी है। घटनाक्रम में राजकार्य में बाधा जैसा कुछ था ही नहीं, पुलिस को मुकदमा दर्ज करने से पहले पूरी जांच करनी चाहिए थी। इसके लिए जागरूक लोगों को एकत्रित होकर प्रभारी को सबक सिखाना होगा। कांग्रेस के युवा नेता गगन वींडिंग ने कहा कि प्रभारी को सूरतगढ़ का इतिहास देख लेना चाहिए कि यहां पर विवादित अधिकारियों को किस तरह से विदा किया गया है।

क्रांतिकारी महावीर भोजक ने कहा यह चिकित्सा प्रभारी की हठधर्मिता और घोर लापरवाही है कि वो अपने कक्ष में बैठे रहे और सीनियर सिटीजंस के लिए दवा वितरण की माकूल व्यवस्था नहीं करवा पाए। आप नेता और पूर्व ईओ पृथ्वीराज जाखड़ ने कहा कि चिकित्सा प्रभारी की बदतमीजी के वें खुद भुक्तभोगी हैं। उन्होंने कहा कि चिकित्सा प्रभारी को बोलने की तमीज भी नहीं है। जाखड़ ने कहा कि एक जूनियर डॉक्टर को प्रभारी बना दिया है जिसकी वजह से सीनियर डॉक्टरों को इसकी जी हजूरी करनी पड़ रही है। उन्होंने कहा कि अगर हरिमोहन जी बुजुर्गों को दवाई दिलाने के लिए प्रभारी के पास ले भी गए तो कौन सा गुनाह हो गया। लोग तो उनके पास जाएंगे ही। सामाजिक कार्यकर्ता और आंदोलनकारी महावीर तिवारी ने कहा कि राजकीय चिकित्सालय के डॉक्टर ड्यूटी पर नहीं जाते और घरों में मरीजों को देखते हैं। उन्होंने संगीन धाराओं में मामला दर्ज करने पर पुलिस पर भी सवाल उठाए। हनुमानगढ

बैठक में भाजपा में पूर्व नगरमंडल अध्यक्ष जयप्रकाष सरावगी, वर्तमान अध्यक्ष सुरेश मिश्रा, पूर्व महिला जिलाध्यक्ष रजनी मोदी, पूर्व नगर पालिकाध्यक्ष बनवारी लाल मेघवाल, कामरेड सखी मोहम्मद, बसपा नेता अमित कल्याना ने भी अपनी बात रखी और चिकित्सा प्रभारी के खिलाफ संघर्ष का बिगुल बजाने का आह्वान किया। बैठक में किरयाणा यूनियन के अध्यक्ष किशोर गाबा, पूर्व व्यापार मंडल अध्यक्ष दीपक भाटिया, भाजपा नेता अशोक आसेरी, समाजसेवी, विजय मुदगल, वली मोहम्मद, कॉटनसिटी प्रेस क्लब के अध्यक्ष नवल भोजक, पत्रकार रामप्रवेष डाबला, जितेन्द्र खालिया, वृक्ष मित्र राजेन्द्र सैनी, नरेन्द्र शर्मा, कांग्रेसी नेता जगदीष बिष्नोई, बिश्नोई समाज के सीताराम बिश्नोई, पूर्व पार्षद चरणजीत चन्नी, पार्षद हरीश दाधीच, सुरेन्द्र राठौड़, राजीव चौहान, कृष्ण छिम्पा, त्रिमूर्ति मार्केट एसोसिएशन के प्रमोद ज्याणी, गौरीषंकर निमीवाल, एडवोकेट राकेष नायक, एडवोकेट अविनाष महर्षि, डॉ. हर्ष भारती, अली कादरी, टैक्स बार संघ के श्रीकांत सारस्वत, युवा नेता गौरव बलाना, पवन छाबड़ा, अजय सिसोदिया, छात्र नेता रामू छिम्पा, एडवोकेट राजकुमार सेन, राहुल सहारण, सुमित चौधरी, शक्ति सिंह भाटी, अश्वनी भांभू, अनिल ठाकराणी, सिकंदर स्वामी, कृष्ण जालप, अमरनाथ लंगर सेवा समिति के किषन स्वामी, योगेष स्वामी, विकास सारस्वत, सरदूलसिंह भाटी, प्रो. आईएस चेतिवाल, बृजलाल पटवारी, डॉ. जगदीष कस्वा, भागीरथ मेघवाल, सुखदेव सरपंच खूबचंद नायक, वकील राजकुमार सेन, रतन पारीक, ललित शर्मा, एडवोकेट विमल सिंह परिहार, रमेश आसवानी, विकास मदान सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक मौजूद थे।

बैठक के बाद उपस्थित जनों ने पुलिस उपाधीक्षक कार्यालय पहुंचकर सीओ प्रतीक मील को इस मामले में अपना विरोध दर्ज करवाया। लोगों का कहना था कि पुलिस ने इस मामले में एकतरफा कार्यवाही करते हुए मामला दर्ज किया है जो नाकाबिले बर्दाष्त है। उन्होंने सीओ को सामुहिक रूप से मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में मांग की गई है कि व्रिष्ठजनों के प्रति असंवेदनशील और डयुटी निष्पादन में घोर लारपवाही के दोषी प्रभारी चिकित्सक को प्रभारी पद से तुरंत हटाया जाए तथा इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करवाएं।


उसूलों पर आंच आए तो टकराना जरुरी है !

 

(राजकीय चिकित्सालय और राजकाज में बाधा का मुकदमा)


13 सितंबर । आज की घटना और मुद्दे की जानकारी उन सब लोगों के लिए जरूरी है, जो अपने शहर से प्यार करते हैं, यहां फैली अव्यवस्थाओं के खिलाफ आवाज उठाते हैं। उन्हें जान लेना चाहिए कि यदि वे मुंह खोलेंगे तो उनके खिलाफ राज कार्य में बाधा के मुकदमें दर्ज होंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या मुकदमा दर्ज करने से चिकित्सालय की व्यवस्थाएं सुधर जाएगी ? क्या मुकदमे के भय से लोग संघर्ष करना छोड़ देंगे ?

घटना के तथ्य जानिए

आज सुबह करीब 10 बजे राजकीय चिकित्सालय, सूरतगढ़ में डॉ. लोकेश अनुपाणी से मां की दवाई लिखवाने के लिए पहुंचा था तो सोचा, चिकित्सालय की व्यवस्थाओं का जायजा भी लिया जाए। दरअसल 2-3 दिन पहले दैनिक भास्कर में इसी चिकित्सालय के दवा वितरण की अनियमितताओं को लेकर एक बड़ा समाचार प्रकाशित किया गया था, पत्रकार होने के नाते उसकी पड़ताल करनी चाहिए।

इस चिकित्सालय भवन के पिछले हिस्से में सीनियर सिटीजन के लिए दवा वितरण के दो काउंटर बने हुए है। वहां लगभग 40-50 बुजुर्ग पुरुष और महिलाएं हाथ में पर्चियां लेकर खड़े थे। उन मरीजों से पूछताछ की तो पता चला कि दोनों काउंटर की खिड़कियां सुबह से ही बंद हैं। दूर दराज के गांव से आए हुए बड़े बुजुर्ग परेशान हो रहे हैं, लिहाजा चिकित्सालय के प्रभारी डॉ. नीरज सुखीजा को फोन किया। डॉक्टर साहब ने जवाब दिया कि आज स्टेट हॉलीडे है, कर्मचारी छुट्टी पर हैं। बड़ा अचरज हुआ, कम से कम इन बेचारे बुजुर्गों को बता तो दिया जाता या कोई सूचना लगा दी जाती की आज यहां दवाई नहीं मिलेगी। इस पर डॉक्टर साहब से चेंबर में जाकर मुलाकात की तो उन्होंने स्पष्ट जवाब दिया, आप फालतू की पत्रकारिता कर रहे हो, खिड़कियां खुली है, दवाई मिल रही है, मरीज से कह दो दूसरे काउंटर से दवाई ले लें। वहां उपस्थित नर्सिंग स्टाफ सुरेंद्र पारीक ने उल्टे शालीनता से का कहा, 'भाई साहब, अभी कोई व्यवस्था करवाते हैं।' कोई बात नहीं, समस्या का समाधान हो तो अपने कहां दिक्कत है। इस विषय पर प्रभारी चिकित्सा की छोटी सी बाइट लेकर बाहर आ गया।

लाइन में लगे बुजुर्गों को मैंने जाकर बताया कि आज स्टाफ छुट्टी पर है आप दूसरे काउंटर से दवाई ले लें। बुजुर्गों का टोला दूसरे काउंटर पर गया तो वहां स्पष्ट मना कर दिया गया कि आपको यहां से दवाई नहीं मिलेगी। इस पर वे मरीज प्रभारी के चेंबर में पहुंच गए और दवा देने की मांग करने लगे। प्रभारी चिकित्सक व्यवस्था को सुधारने की बजाय उल्टे मुझे धमकाने लगे कि आप इनको ''प्रोवोक'' (उकसाकर) करके लेकर आए हो, और वहां से उठ कर चले गए। बेचारे मरीज अपना सा मुंह लेकर बाहर निकल आए। श्री भगवान, अनिल ठाकरानी सहित वहां उपस्थित लोग डॉक्टर के इस व्यवहार से बड़े खफा हुए। हम सब परिसर में लगे नीम के पेड़ की छाया में खड़े होकर बात करने लगे।

थोड़ी देर में डॉ. दीपेश सोनी और और नर्सिंगकर्मी सुरेंद्र पारीक मेरे पास आए, बोले भाई साहब, असुविधा तो हुई है लेकिन कोई बात ही नहीं है, अपने समाधान के लिए प्रभारी के चेंबर में चलकर बात करते हैं। बातचीत से समाधान निकाले, उससे बेहतर कोई रास्ता नहीं ! यही मेरी सोच है लिहाजा उनके साथ चेंबर में पहुंचे। डॉक्टर साहब ने तब तक वहां पुलिस को बुला लिया था। दो-तीन अन्य चिकित्सक भी रहे होंगे। मैंने और अन्य लोगों ने प्रभारी चिकित्सक को चिकित्सालय में व्यवस्थाएं सुधारने के लिए कहा था क्योंकि बुजुर्ग लोग घंटों से परेशान थे। प्रभारी का कहना था कि डॉ. विजय भादू के समय आप में से कोई पत्रकार नहीं आता था, हमें परेशान करते हो। डॉ. रिद्धकरण नामक चिकित्सक ने तो सलाह देने डाली, कि आपको इंदिरा सर्किल या एसडीम ऑफिस जाकर पत्रकारिता करनी चाहिए लेकिन आप यहां आकर हमें परेशान करते हैं। खैर थोड़ी देर बाद इस बहस बाजी का अंत यह हुआ था कि डॉक्टर साहब चिकित्सालय की व्यवस्था सुधारेंगे और प्रेस उनका सहयोग करेगी। चिकित्सकों की तरफ से आग्रह किया गया कि इस घटनाक्रम को खबरों का तूल न दिया जाए, जिसे मान भी लिया गया।

आगे की कहानी इतनी सी है कि डॉक्टर नीरज सुखीजा अपने तीन-चार चिकित्सकों के साथ पुलिस स्टेशन पहुंचे और मेरे खिलाफ राज कार्य में बाधा का मुकदमा दर्ज करवा दिया है। मजे की बात यह है कि उमेश मुद्गल जिसे शायद डॉ. नीरज सुखीजा जानते ही नहीं उसका नाम भी लिखवा दिया गया है जबकि वह तो वहां किसी निजी काम से हुआ था।

मुझे इस झूठे मुकदमे से कोई परेशानी नहीं है। प्रभारी चिकित्सक द्वारा किए गए दुर्व्यवहार को लेकर मुकदमे से पहले ही एक परिवाद हमारे द्वारा पुलिस को सोंप दिया गया था, उस पर भी पुलिस कार्यवाही करेगी, ऐसा मेरा मानना है।

लेकिन इतना तय है कि साधारण दबी कुचली जनता के हितों के लिए मैं ताउम्र संघर्ष करता रहूंगा। मुझे पूरा भरोसा है, इस संघर्ष में सूरतगढ़ क्षेत्र से प्रेस के समर्पित साथियों के साथ विवेकवान और जागरूक लोग मेरे साथ खड़े होंगे।

- डॉ. हरिमोहन सारस्वत


एक था इंदिरा सर्किल !

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